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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१७ मन्त्रसंकेतमुपसंहरति— एवमेतत्प्रदं^१ ज्ञानं विद्यार्णगमगोचरम् । देवि गुह्यं प्रियेणैव व्याख्यातं दुर्गि^२ षड्विधम् ॥ सद्यो यस्य प्रबोधेन वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥८५॥ एवम् उक्तप्रकारेण, एतत्प्रदं^३ परिपूर्णबोधलक्षण^४परशिवतत्त्व^५प्रदं ज्ञानम् । ^६विद्यार्णगमगोचरम्, विद्याया अर्णाः^७ पञ्चदश वर्णाः, त एवागमा महार्थबोध- कत्वात्, तद्गोचरं तदर्थतया व्याख्यातम्, "यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत्" (२।१) इत्यारभ्य "एवमेतत्प्रदम्" (२।८५) इत्यन्तश्लोकजालेन । षड्विधं "भावार्थः सम्प्रदायार्थः" (२।१५) इत्यादिना प्रतिपादितषट्प्रकारम् । देवि प्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपे परे । दुर्गि दुर्गे देशिकेन्द्रकटाक्षपातविहीनैर्नाप्यस्वरूपे । सद्यो यस्य प्रबोधेन षड्विधार्थस्य प्रबोधेन । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । इदन्तरिपोरहमि अब मन्त्रसंकेत प्रकरण का उपसंहार करते हैं— इस तरह से परिपूर्ण बोधस्वरूपता को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णों में जिस तरह से प्रतिष्ठित है, हे दुर्गि, हे देवि ! उसकी षड्विध व्याख्या तुम्हारे प्रेम के वशीभूत हो मैंने यहाँ प्रस्तुत की है । इस विषय को ठीक तरह से जान लेने पर साधक वीरों के समूह का स्वामी बन जाता है ॥८५॥ ऊपर बताई गई विधि से परिपूर्ण बोधस्वरूप परम शिव पद को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णरूपी शास्त्र से प्राप्त होता है, क्योंकि श्रीविद्या के अन्तर्गत विद्यमान वर्ण बहुत बड़े रहस्य का ज्ञान कराते हैं। इनकी यहाँ सम्प्रदाय-प्राप्त परम्परा के अनुसार व्याख्या की गई है । इस विषय को इस ग्रन्थ के पूरे द्वितीय मन्त्र- संकेत प्रकरण के प्रथम श्लोक से लेकर अन्तिम श्लोक पर्यन्त देखा जा सकता है। यह अर्थ भावार्थ, सम्प्रदायार्थ आदि के भेद से छः प्रकार का है, इसका निरूपण विस्तार से ऊपर किया जा चुका है। 'देवि' यह प्रकाशविमर्शसामरस्यमयी परा भगवती का संबोधन है। 'दुर्गि' यह उस देवी के संबोधन का विशेषण है। 'दुर्गे' के स्थान पर 'दुर्गि' पद का प्रयोग वैदिक आर्ष पद्धति से किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि बिना गुरुकृपा के इसके स्वरूप को पहचानना कठिन है । इस षड्विध अर्थ का सम्यग् ज्ञान हो जाने पर साधक वीरचक्र का स्वामी हो जाता है। इस आध्यात्मिक युद्ध-क्षेत्र में इदन्ता १. परं-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. तन्वि-ङ., तव-उ. । ३. परं-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लक्षणं-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'तत्त्व' नास्ति-क. । ६. 'विद्यार्णगम- गोचरं' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ७. वर्णाः-सार्वत्रिकः पाठः ।

२१८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः 'समराङ्गणे प्रलयप्रतिपादनपरा वीराः, तेषां चक्रं समूहः, तस्येश्वरः परशिवः। पूर्वोक्तषड्विधार्थविज्ञानसमय एव परशिवो भवेदित्यर्थः ॥८५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीपुण्यानन्दशिष्या- मृतानन्दयोगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदय- दीपिकायां मन्त्रसंकेतो नाम द्वितीयः ॥ रूपी शत्रु का अहन्ता में प्रविलय करने वाले वीर कहलाते हैं। द्वैतदृष्टि को हटाकर अद्वैत में प्रतिष्ठित होने वाले वीरों के समूह का वह स्वामी हो जाता है, स्वयं परम शिव बन जाता है। पूर्वोक्त छः प्रकार के अर्थों को जान लेने पर साधक तत्काल ही अपने परम शिव स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥८५॥ इस तरह श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री पुण्यानन्द के शिष्य अमृतानन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का दूसरा मन्त्रसंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥२॥

पूजासंकेतस्तृतीयः अथ क्रमप्राप्तं पूजासंकेतं वक्तुं प्रतिजानीते— पूजासंकेतमधुना कथयामि तवानघे। स्पष्टम्¹ ॥ श्रोतृजनप्रवृत्तये फलमाह— यस्य प्रबोधमात्रेण जीवन्मुक्तः प्रमोदते ॥१॥ यस्य पूजासंकेतस्य। प्रबोधमात्रेण ²वक्ष्यमाणपरादित्रिविधभेदवतः केवलपरि- ज्ञानेनैव। जीवन्मुक्तः जीवन्नेव मुक्तः सन् शिवोऽहमस्मीति मतिमान्³। प्रमोदते परशिवाहन्तामतिरेव प्रमोदहेतुः ॥१॥ पूजासंकेतमारभते— तव नित्योदिता पूजा त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता। अब क्रमप्राप्त पूजासंकेत प्रकरण का उपक्रम करते हैं— हे अनघे ! अब मैं पूजासंकेत का तुम्हें उपदेश कर रहा हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥ श्रोताओं को प्रवृत्त करने के लिये इस प्रकरण के ज्ञान का क्या फल है ? अब यह बताते हैं— जिसके जानने मात्र से साधक जीवन्मुक्त होकर सदा आनन्द में मग्न रहता है ॥१॥ जिस पूजासंकेत के जानने मात्र से, आगे बताई गई विधि से पर, अपर आदि तीन भेदों वाली पूजाविधि के केवल जान लेने मात्र से, साधक इसी जीवन में मुक्त होकर, 'मैं शिव हूँ' यह भलीभाँति जान कर, सदा आनन्द में लीन रहता है। मैं ही शिव हूँ, इस ज्ञान के उत्पन्न हो जाने से वह सदा आनन्द में डूबा रहता है ॥१॥ अब पूजासंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है— प्रतिदिन जो तुम्हारी पूजा की जाती है, वह तीन प्रकार की होती है ॥ १. स्पष्टमेतत्–ज.। २. 'वक्ष्यमाण'–नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'मतिमान्' नास्ति–क. ख. ग. घ. ङ.

२२० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रकाशात्मनो मम विमर्शशक्तेर्विमर्शरूपिण्यास्तव । नित्योदिता पूजा नित्यं प्रत्यहम् उदिता विहिता १पूजा, त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता ॥ पूजानामान्याह— परा चाप्यरा गौरि तृतीया च परापरा ॥२॥ प्रथमा पूजा परा उत्तमोच्यते । परमशिवाद्वैतप्रथाप्रापकत्वादि२तरपूजाभ्या- मुत्तमत्वम् । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या ३विहिताऽनिशम् । स्वे ४महत्यद्वये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ॥ इति । अपरा द्वितीया पूजा भेदप्रथामात्रसारा बाह्यचक्रावरणार्चनरूपाऽधमा, “न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या ३विहिताऽनिशम्” इति ५पूर्वोक्तवचनात् । तृतीया पूजा परापरा बाह्यस्यान्तरे धाम्न्यद्वये चिल्लयभावनामयी मध्यमा, परापरात्मक- त्वात् ॥२॥ मुझ प्रकाशात्मक शिव की विमर्शरूपिणी शक्ति तुम हो । इस प्रकाशविमर्शात्मक स्वरूप की प्रतिदिन की जाने वाली पूजा तीन तरह से सम्पन्न होती है ॥ इनके नाम ये हैं— हे गौरि ! परा, अपरा इन दो भेदों के अतिरिक्त इसका परापरा नामक तीसरा भेद है ॥२॥ प्रथम पूजा का नाम १परा है । यह सर्वश्रेष्ठ है । परम शिव के साथ अद्वय बोध को जगाने वाली यह पूजा अन्य दो पूजाओं की अपेक्षा उत्कृष्ट है । संकेतपद्धति का कहना है— बाह्य पुष्प आदि द्रव्यों की सहायता से जो दिन-रात पूजा की जाती है, वह वास्तविक पूजा नहीं है । असली पूजा तो वह है, जिससे साधक अपने महान् अद्वय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय ॥ अपरा नाम की दूसरी पूजा केवल भेददृष्टि को बढ़ावा देने वाली है । इसमें केवल बाह्यचक्र की और तदन्तर्गत आवरण देवताओं की पूजा की जाती है । यह अधम कोटि की पूजा है । इसीलिये संकेतपद्धति के अभी उद्धृत वचन में इसको वास्तविक पूजा नहीं माना गया है । तीसरी पूजा परापरा नाम की है । इसमें बाह्य वस्तुओं का आन्तर अद्वय धाम में विलय किया जाता है, आन्तर चितिशक्ति से स्फुरित इस विश्व के १. 'पूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'इतरपूजाभ्यामुत्तमत्वम्' नास्ति-ख. ने. ज. झ उ. । ३. प्रथिता-क. ने. झ. उ. । ४. महिम्रन्य-क. ग. । ५. 'पूर्वोक्त' नास्ति- ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. परा, परापरा और अपरा पूजा की व्याख्या हम शांभव, शाक्त और आणव उपायों के रूप में कर सकते हैं ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२१ तासां लक्षणानि क्रमेणाह— प्रथमाऽद्वैतभावस्था सर्वप्रसरगोचरा । “आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन” (न्या० भा० १।१।४) इति पूर्वोक्त(२।२-४)परिपाट्या सर्वेषामिन्द्रियाणां ये ^२प्रसरा व्यापारास्तेषां गोचरीभूता । कोऽर्थः ? यत्र यत्र मनो याति बाह्ये वाऽभ्यन्तरे प्रिये । तत्र तत्र ^३परावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति ।। (श्लो० ११३) ^४यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते ^५प्रभोः । तस्य तन्मात्र^६धर्मित्वाच्चिल्लयाद् भरिता मतिः ॥ (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या बाह्यस्य चिल्लयलक्षणाऽद्वैतप्रथा परा पूजे- त्यर्थः ॥ समस्त बाह्य पदार्थों का पुनः उस शुद्ध चितिशक्ति में विलय हो रहा है, ऐसी भावना की जाती है। यह पूजा मध्यम है, क्योंकि परा और अपरा दोनों के बीच में है ॥२॥ अब क्रम से इनके लक्षण बताते हैं— इन्द्रियों के समस्त व्यापारों में एकमात्र अद्वय शिवतत्त्व को ही देखना, यह पहली परा पूजा है ॥ “आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय अर्थ से संयुक्त होती हैं” न्यायभाष्य (१।१।४) की इस पूर्व (२।२-४) प्रतिपादित पद्धति के अनुसार सभी इन्द्रियों के व्यापारों में अनुस्यूत रहने वाली अद्वैत प्रथा का ही नाम परा पूजा है। विज्ञानभैरव में बताया गया है— हे प्रिये ! बाह्य अथवा आन्तर विषय में जहाँ जहाँ मन जाता है, सब जगह व्यापक पराशक्ति ही विद्यमान है। उस परावस्था को छोड़ कर मन कहाँ जा सकता है ? उस उस बाह्य अथवा आन्तर विषय के रूप में इन्द्रियों के मार्ग से भगवान् का चिन्मय स्वरूप ही प्रकट होता है, क्योंकि यह सारा विश्व चिन्मात्रसार है। साधक सारे विश्व को जब अपने चिन्मय स्वरूप में विलीन कर लेता है, तो वह परिपूर्ण स्वभाव का हो जाता है ॥ इसका अभिप्राय यह है कि स्वयं आत्मा ही अन्ततः विषयों का स्वरूप धारण करता है, इस विषय को भलीभाँति समझ कर साधक जब सभी बाह्य अथवा आन्तर विषयों में अपने चिन्मय स्वरूप को अभिन्न रूप से देखता है, तो अन्ततः उसकी दृष्टि में ये सभी पदार्थ चित्स्वरूप में विलीन हो जाते हैं, सर्वत्र उसको एकमात्र चिन्मयता का ही बोध होता है। यह अद्वय प्रथा ही इस शास्त्र में परा पूजा कही गई है ॥ १. प्रचर-ख. ग. ने. च. छ. झ. । २. 'प्रसराः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. शिवा-मु. । ४. तत्र तत्र इति सार्वत्रिको दीपिकापा. । ५. विभोः-मु. । ६. रूपत्वा- ख. ग. झ. उ. ।

२२२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः द्वितीया चक्रपूजा च सदा निष्पाद्यते मया ॥३॥ द्वितीया १चक्रपूजा अपरा पूजा, चतुरस्रादिबैन्दवान्तश्रीचक्र२सदनावरणदेवता- र्चनमपरा पूजेत्यर्थः । सदा निष्पाद्यते मया । सदा प्रत्यहम्, मया सर्वज्ञेनापि, निष्पाद्यते क्रियते, ३अभेदप्रतीतिबोधकत्वात् । अभेदप्रतीत्यर्थमपरा पूजा सर्वैरपि ज्ञानिभिः कार्येत्यर्थः । अन्यथाऽद्वैतमित्यप्रसक्तप्रतिषेधः स्यात्, न च तथा युक्तम् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे— लब्धरूपं४ क्वचित् किञ्चित् तादृगेव निषिध्यते । विधानमन्तरेणातो न निषेधस्य संभवः ॥ इति ॥३॥ (ब्र० सि० २।२) चक्रपूजा दूसरी, अपरा नाम की पूजा है। मैं प्रतिदिन इसका अनुष्ठान करता हूँ ॥३॥ दूसरी चक्रपूजा अपरा पूजा कहलाती है। यहाँ चतुरस्र से बैन्दव चक्र पर्यन्त श्रीचक्र रूपी गृह में निवास करने वाले आवरण देवताओं की बाह्य पूजा संपन्न होती है। मेरा जैसा सर्वज्ञ भी इस पूजा का प्रतिदिन अनुष्ठान करता है, क्योंकि इससे साधक धीरे- धीरे अद्वयबोध की तरफ बढ़ता है। सर्वत्र अभेद बुद्धि को जगाने के लिये ज्ञानी जनों को भी सदा इस अपरा पूजा का सहारा लेना चाहिये। अन्यथा 'अद्वैत' पद में निषेधार्थक नञ् शब्द का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा। ऐसा होना नहीं चाहिये, क्योंकि ब्रह्मसिद्धि (२।२) में मण्डन मिश्र कहते हैं— कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में विद्यमान वस्तु का ही निषेध किया जा सकता है। अतः बिना विधि के उसका निषेध नहीं हो सकता ॥ कहने का भाव यह है कि 'अद्वैत' पद में द्वैत का निषेध किया गया है, किन्तु शास्त्र का कहना है कि एकमात्र अद्वय तत्त्व ही वास्तविक है। ऐसी स्थिति में जब अद्वय के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, तब इस पद में विद्यमान नञ् किसका निषेध करेगा ? प्रसक्त का ही प्रतिषेध किया जाता है। जब अद्वय के अतिरिक्त कोई वस्तु उपस्थित ही नहीं है, तो यह तो अप्रसक्त (अनुपस्थित) का प्रतिषेध हुआ, जो शास्त्रकारों की दृष्टि में सही नहीं है। अतः अद्वय तत्त्व के प्रतियोगी द्वैत तत्त्व की प्रतीति कराने के अभिप्राय से ही मानों इस अपरा पूजा का विधान है। अपरा पूजा का अनुष्ठान करने वाला साधक भक्त अपने इष्टदेव की भगवान् के रूप में उपासना करता है। इस तरह से यहाँ उपास्य और उपासक के रूप में भेद दृष्टि ही प्रधान रूप से रहती है और 'अद्वय' शब्द का प्रयोग करने वाला शास्त्र अप्रसक्त प्रतिषेध दोष से मुक्त हो जाता है ॥३॥ १. 'चक्रपूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ड. । २. चक्रपदनिवासावरणदेवतानाम्, अतोऽपरा-ख. ने. ज. झ. ड. । ३. प्रबोधकत्वात्-ख. ज. झ. । ४. रूपे-मु.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२३ परापरापूजामाह— एवं ज्ञानमये देवि तृतीया १स्वप्रथामयी । एवं ज्ञानमये पूर्वोक्ताद्वैतभावनामये धाम्नि स्वप्रथामयी बाह्यस्य पृथगा²त्म- कावरणार्चनरूपस्य कर्मणो ज्ञानमयताविश्रान्तिस्तृतीया परापरा पूजा । तदुक्त- मभियुक्तैः— प्रकाशैकघने धाम्नि विकल्प³प्रसरादिकान् । निक्षिपाम्यर्चनद्वारा वह्नाविव घृताहुतीः ॥ इति ॥ (सु० वा० ३७) पूजाविधानमाह— उत्तमा सा परा ज्ञेया विधानं शृणु साम्प्रतम् ॥४॥ ४उत्तमा सा परा पूजा । परापूजाया उत्तमत्वकथनादितरयोरपरापरापर- पूजयोरधमत्वं मध्यमत्वं ५चोपलक्षयति । सा ज्ञेया ६यथाज्ञानं कार्या । अपरा पूजा अब परापरा पूजा का स्वरूप बताते हैं— प्रकाशमय स्वरूप में अपने बाह्य स्वरूप को समर्पित कर देना ही तीसरी परापरा पूजा है ॥ इस तरह से ज्ञानमय, अर्थात् सर्वत्र अद्वैत भावना का प्रसार करने वाले प्रकाशमय स्वरूप में बाह्य भेदप्रधान, अपने से पृथक् रूप में भासित हो रही, आवरण पूजा रूपी कर्मकाण्ड का ज्ञानकाण्ड में विश्रान्तिलाभ कराने वाली तीसरी पूजा परापरा नाम की है । सुभगोदयवासनाकार मुनि शिवानन्द ने निम्न श्लोक में इसी पूजा का वर्णन किया है— अपने एकमात्र प्रकाशमय स्वरूप में मैं इन जागतिक विषयों के सारे प्रपंच को उसी तरह से डाल दे रहा हूँ, जैसे पवित्र अग्नि में घृत की आहुति दी जाती है ॥ इसका भाव यह है कि परापरा पूजा का उपासक अपने सारे अशुद्ध विकल्पों को अपनी ज्ञानाग्नि की सहायता से निर्मल बोधस्वरूप बना लेता है ॥ अब पूजा की विधि बताते हैं— इन तीनों में परा पूजा उत्तम है । अब तुम उसकी विधि सुनो ॥४॥ परा पूजा को यहाँ उत्तम बताया गया है । इससे अन्य दो अपरा और परापरा पूजा की अधमता और मध्यमता लक्षित होती है । अर्थात् परा पूजा उत्तम, अपरा पूजा १. तु परापरा-क. ग. । २. गावरणा-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. ल्पान् प्रसवादि- ख. ज. झ. उ., ल्पान् पाशवादि-मु. । ४. 'उत्तमा सा परा पूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. च लक्ष्यते-ने. ज. । ६. ज्ञानगम्या परा-क. ग. ने. ज. झ. उ. ।

२७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पश्चाद् वक्ष्यते। अस्या ज्ञेयत्वात् परत्वमत एवोत्तमत्वं चेत्यर्थः। साम्प्रतं ज्ञेयायाः¹ पूजाया विधानं शृणु ॥४॥ विधानमेव विवृणोति— महापद्मवनान्तस्थे वाग्भवे गुरुपादुकाम्। आप्यायितजगद्रूपां परमामृतवर्षिणीम् ॥५,॥ संचिन्त्य महापद्मवनं ब्रह्मरन्ध्राधोमुखसितसहस्रदला²कुलकमलं पद्मदलेराकुलत्वाद् ³वनमिव वनम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अधम और परापरा पूजा मध्यम मानी गई है। परा पूजा¹ का अनुष्ठान अपने ज्ञान के अनुसार किया जाता है। अपरा पूजा का वर्णन आगे करेंगे। परा पूजा का अनुष्ठान उत्कृष्ट कोटि का ज्ञानी ही कर सकता है। इसीलिये इसको उत्कृष्ट माना गया है। अब तुम पहले परा पूजा का विधान सुनो ॥४॥ उस विधि का ही विवरण देते हैं— महापद्मवन के अन्दर विद्यमान वाग्भव (त्रिकोण) में सारे जगत् का विस्तार करने वाली परम उत्कृष्ट अमृत की वर्षा करने वाली गुरुपादुका का ध्यान करना चाहिये ॥५-६॥ ब्रह्मरन्ध्र में अधोमुख श्वेत सहस्रदल अकुल कमल स्थित है। अनेक दलों से आवृत्त होने से यह कमलों के वन (जंगल) जैसा मालूम पड़ता है। स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से यह वर्णित है— १. द्वितीयायाः-ज., अपरायाः-उ.। २. दलं कुल-ख. उ.। ३. वनमिति। तदु-ख. ने. ज. झ. उ.। १. अमृतानन्द ने यहाँ ज्ञेया पद की व्याख्या परा पूजा के विशेषण के रूप में की है, जब कि भास्करराय इसको क्रिया पद मानते हैं। यही पक्ष उचित लगता है। इसी- लिये मूल का हिन्दी अनुवाद हमने तदनुसार ही किया है। दीपिका की पूर्व प्रकाशित पुस्तक तथा उसके अनेक हस्तलेखों में उपलब्ध पाठ का अर्थ यह होता है कि परा पूजा की विधि बाद में बताई जायगी। वस्तुस्थिति यह है कि भास्करराय ही नहीं, स्वयं दीपिकाकार भी आगे आठवें श्लोक की पातनिका में कहते हैं कि यहाँ परा पूजा का स्वरूप बता दिया गया है, अब अपरा पूजा का विधान करते हैं। इसीलिये हमने यहाँ ख. और झ. मातृका के पाठ को मूल में स्थान दिया है और तदनुसार ही ग्रन्थ का अनु- वाद किया है। अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर प्रायः इन्हीं दो हस्तलेखों की सहायता से पूर्व मुद्रित पाठ में संशोधन किया गया है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२५ १यावदूर्ध्वकुलं पद्मं सहस्रारमधोमुखम् । श्वेतं च निष्कला२शक्तिमध्यं चासंख्यशक्तिकम् ॥ व्यापिनी केवला शश्वदमृतौघप्रवर्षिणी । महापद्मवनं चैव समना तस्य चोपरि ॥ तस्यान्तः कर्णिकामध्ये तत्स्थे वाग्भवरूपिणि । इति । पूर्वोक्त (२।६९) रीत्या वाचः परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यो भवन्त्यस्मादिति वाग्भवं त्रिकोणम् । तत्र गुरुपादुकाम्, गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या विश्वगुरोः परमशिवस्य ३पादुकाम्, स्वप्रकाशशिवमूर्त्तिरेकिका तद्विमर्शतनुरेकिका तयोः । सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः ॥ (चि० १) इत्यस्मदुक्तरीत्या त्रिभेदवतीम् । आप्यायितजगद्रूपां शिशिरतरनिजरश्मि- ४निफालनात् प्रसारणादाप्यायितचराचराम् । परामृतवर्षिणीं निरन्तरनिबिड- चिद्रसासारवर्षिणीम् । संचिन्त्य स्वात्मतया ५विमृश्य ॥५-६॥ सबसे ऊपर अकुल पद्म स्थित है । यह अधोमुख सहस्रदल कमल है । यह श्वेत वर्ण का है। इसमें असंख्य शक्तियों का निवास है। इन सबके बीच में निष्कला शक्ति विराजमान है। व्यापिनी कला यहाँ निरन्तर अमृत की वर्षा करती रहती है। यही महापद्मवन ऊर्ध्व सहस्रार कमल है। इसके ऊपर समना स्थित है। इसके ऊपर कर्णिका के मध्य में वाग्भव (त्रिकोण) की स्थिति मानी गई है ॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक वाणियां त्रिकोण से ही उत्पन्न होती हैं, यह पहले (१।३६-४०) बताया जा चुका है। १वाणियों की उत्पत्ति इससे होती है, अतः इसे वाग्भव कहा जाता है । इस त्रिकोण में गुरु की पादुका की भावना करनी चाहिये । ऊपर अनेक स्थलों पर उद्धृत वचन के आधार पर विश्वगुरु परम शिव की पादुका यहाँ अभिप्रेत है । व्याख्याकार के गुरुपादुका के सूचक चिद्विलास स्तव के श्लोक की व्याख्या भी पहले (२।७८) की जा चुकी है। तदनुसार यह पादुका तीन (प्रकाश, विमर्श और इनका सामरस्य) भेदों वाली है । गुरु की कृपादृष्टि की अत्यन्त शीतल रश्मियों से यह सारा चराचर जगत् आप्यायित हो उठता है । इससे निरन्तर ज्ञानामृत की वर्षा १. यावदूर्ध्वं कुलं-ख. ने. ज. झ. उ. । २. सक्त-ख. ने. झ. । ३. 'पादुकाम्' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. 'निफालनात्' नास्ति-ने. ज. । ५. विचिन्त्य-ख. ने. । १. पृ० १९९ की टिप्पणी देखिये । १५

२२६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः गुरुपादुकापरामर्शानन्तरमेव१ प्रसादस्वीकारमाह— परमाद्वैतभावनामदघूर्णितः । परमः परमशिवः, तेनाद्वैतभावना स२ एवाहमस्मीति समावेशरूपा, सैव मद इत्युच्यते, मदहेतुत्वात् । तत्कृतेन मदेन घूर्णितो मुदितः । स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति भावुकः३ ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या परमशिवाद्वैतभावनालक्षणगुरुप्रसादस्वीकार४समुल्लसत्पर- मानन्दपरवश इत्यर्थः ॥६॥ प्रसादस्वीकारानन्तरमान्तरजपमेवाह— दहरान्तरसंसर्पन्नादालोकनतत्परः ॥६॥ विकल्परूपसंजल्पविमुखः होती रहती है। इस पूजा का अनुष्ठान करते समय साधक को सबसे पहले इस गुरु- पादुका का ही ध्यान करना चाहिये ॥५-६॥ गुरुपादुका का स्मरण करने के उपरान्त पूजक को प्रसाद लेना चाहिये— इसके बाद साधक को चाहिये कि वह परम अद्वैतभावना के मद से परिपूर्ण हो जाय ॥ परम शब्द का अर्थ यहाँ परमशिव किया जाता है। परमशिव के साथ अद्वैत भावना का अर्थ है 'वह शिव मैं ही हूँ' इस तरह की शिवमय दृष्टि। यह अद्वैत भावना एक अनोखे मद (नशा) को जन्म देती है। साधक को चाहिये कि वह अपने में अद्वैत भावना को जगाकर इस अनूठे नशे में मस्त हो जाय। इस प्रसाद के ग्रहण की विधि व्याख्याकार के चिद्विलास स्तव में वर्णित है। उसकी व्याख्या हम पहले (२।६८) कर चुके हैं। इस तरह से गुरुपादुका का स्मरण करने के उपरान्त साधक को परमशिव के साथ अद्वैत भावना को स्थिर करने वाले गुरु के प्रसाद को स्वीकार करना चाहिये, जिससे कि उसमें परम आनन्दमय अवस्था का उल्लास भर जाय ॥ गुरु के प्रसाद को स्वीकार करने के उपरान्त साधक को जप करना चाहिये— साधक को चाहिये कि वह दहराकाश के अन्दर ध्वनित हो रहे नाद का सावधानी से श्रवण करे और सारे जागतिक विकल्प जाल से, नाना प्रकार के बाह्य वैखरी वर्णों के उच्चारण से विमुख हो जाय ॥६-७॥ १. नन्तरमान्तरमेव-ख. झ. उ. । २. सोऽहम-झ. । ३. भावकः-ने., ४. समुल्लसत्-ने., क., ख., झ., उ. ।

तृतीयः ] दीपिकानुवादसहितम् २२७ "दहरं विपाप्मं परवेश्मभूतं हृत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्" (म० ना० ८।१६) इति, "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः" (छा० उ० ८।१।१) इति च श्रुत्या हृदयाब्जमध्य- गतमाकाशं दहरमित्युच्यते । दहरमिव दहरम् । तदन्तरे संसर्पन्नादो दहरान्तर- संसर्पनादः, तस्यावलोकनं विभावनम्, तत्परः । तदुक्तमभियुक्तैः— आनन्दलक्षणमनाहतनाम्नि देशे नादात्मना परिणतं तव रूपमीशे । प्रत्यङ्मुखेन मनसा परिचीयमानं शंसन्ति नेत्रसलिलैः पुलकैश्च धन्याः ।। इति । संयम्येन्द्रियसंचारं प्रोच्चरेन्नादमन्तरम् । एष² एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ।। इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या³ऽऽन्तरं नादानुसन्धानलक्षणं जपं कुर्यात्, न तु नानाविधोच्चारलक्षणं बाह्यजपं कुर्यात् । विकल्परूपसंजल्पविमुखः । विकल्परूपाणां

महानारायणोपनिषत् में जीव के शरीर के मध्य में स्थित हृदय कमल में विद्यमान परदेवता के निवासस्थान निर्मल आकाश को दहर कहा गया है । छान्दोग्य उपनिषद् में भी हृदय-पुण्डरीक में दहर नामक आन्तर आकाश की स्थिति बताई गई है । तदनुसार हृदय कमल के बीच में विद्यमान आकाश दहर¹ कहा जाता है । इस दहर के भीतर उठने वाले नाद को सुनने में साधक को अत्यन्त सावधानी से लग जाना चाहिये । अम्बास्तव में इस विषय का वर्णन मिलता है— हे ईशे ! अनाहत नामक देश में, दहराकाश में, आनन्दमय तुम्हारा स्वरूप ही नाद के रूप में परिणत होता है । अपने मन को अन्तर्मुख बनाकर कुछ विरले योगी ही इस स्वरूप को पहचान पाते हैं । अन्य व्यक्तियों को इसका अनुमान उनके रोमांच और आनन्द से निकले आँसुओं को देखकर ही हो सकता है ॥ इन्द्रियों की बाहरी प्रवृत्ति को रोककर आन्तर नाद का उच्चारण करे । इस आन्तर नाद का उच्चारण ही वास्तविक जप है । बाह्य जप वास्तविक नहीं है ॥ किसी अभियुक्त² के इस वचन के अनुसार आन्तर नाद के अनुसन्धानात्मक जप का अनुष्ठान करे । नाना प्रकार के उच्चारण वाले बाह्य जप की यहाँ आवश्यकता नहीं है । ऐसा साधक नाना प्रकार के वैखरी वर्णों के उच्चारण से, वैखरी वाणी से प्रसूत मन्त्रों के १. पथि-झ. । २. एवमेव-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. रीत्याऽऽत्मनादा-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. ब्रह्मसूत्र के दहराधिकरण (१।३।५, सू० १४-२१) में दहर शब्द की भूताका- शता और विज्ञानात्मकता का खण्डन कर ब्रह्मपरकता स्थापित की गई है । आन्तर आकाश दहर ब्रह्म का निवास स्थान होने से उससे अभिन्न माना जाता है ।
  2. भास्करराय इस श्लोक की नित्याषोडशिकार्णव (५।३९) के श्लोक के रूप में व्याख्या करते हैं, जब कि अमृतानन्द इसको अभियुक्त वचन मानते हैं । पृ० ६९ की टिप्पणी देखिये ।

२२८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः नानाविधरूपाणामक्षराणाम्, संजल्प उच्चारः, तल्लक्षण १बाह्यजपविमुखः । तदुक्तं २विज्ञानभैरवभट्टारकैः— भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या । ३जपतोऽन्तः स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप ईदृशः४ ॥ (श्लो० १५२) ॥६-७॥ तादृशमेव ध्यानमपि कुर्यादित्याह— अन्तर्मुखः सदा । चित्कलोल्लासदलितसंकोचस्त्वतिसुन्दरः ॥७॥ "तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्" (३।२) इति योगशास्त्रोक्तरीत्या विजातीय- प्रत्ययानन्तरितसजातीयप्रत्ययप्रवाहलक्षणध्यानेन सदाऽन्तःशब्दसूचितेनान्तर्मुखः परमशिवाद्वैतभावनापरो भूयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— नाना प्रकार के उच्चारण रूप जप से विमुख रहे । विज्ञानभैरव भट्टारक¹ ने भी कहा है— परभाव में, इस विश्व को भर देने वाले अपने स्वरूप में, जो बार-बार भावना की जाती है, उसी को जप कहा जाता है । स्वयं मन्त्रस्वरूप नादात्मक ब्रह्म ही इस जप का विषय होता है । अर्थात् नादात्मक ब्रह्म की ही मन्त्र में भावना की जाती है ॥६-७॥ जप के समान ही वह ध्यान भी करे— वह सदा अन्तर्मुख रहे । अपने में चित्कला का उल्लास भर कर संकोच बुद्धि को दूर भगा कर परम सुन्दर बन जाय, मैं भगवती त्रिपुरसुन्दरी से अभिन्न हूँ, ऐसी भावना करे ॥७॥ योगशास्त्र (पातंजल योगसूत्र) में बताया गया है—"ध्येय में प्रत्यय (चित्तवृत्ति) की एकतानता, निरन्तरता का ही नाम ध्यान है" । अतः विजातीय चित्तवृत्ति को हटाकर सजातीय प्रत्यय की निरन्तर एकरसता का ही नाम ध्यान है । इसकी स्थिति सदा अन्दर ही रहती है । साधक को चाहिये कि वह इसी पद्धति से सदा अन्तर्मुख बना रहे, सर्वत्र परमशिव के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु को न देखे । विज्ञानभैरव का कहना है— १. 'बाह्य' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'विज्ञान.... हि या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. व. उ. । ३. जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य-मु. । ४. ईरितः-ख. ने. ज. झ. ।

  1. अमृतानन्द ने विज्ञानभैरवभट्टारक पद का तृतीयान्त प्रयोग किया है, सप्तम्यन्त नहीं । इससे ऐसा लगता है कि उनकी दृष्टि में विज्ञानभैरवभट्टारक ही इस नाम के ग्रन्थ के रचयिता हैं । 'भट्टारक' एक आदरसूचक शब्द है । ग्रन्थ और ग्रन्थकार दोनों के साथ इस पद का प्रयोग मिलता है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२९ ध्यानं या निष्कला चिन्ता ^१निराकारा निराश्रया। न तु ध्यानं शरीरस्य मुखहस्तादिकल्पना ॥ (श्लो० १४३) इति। चित्कल्लोल्लासदलितसंकोचस्त्वतिसुन्दर इति। "चिदम्बुधिमहाभङ्गभिन्न- संकोचसंकटः" इत्यस्मदुक्तरीत्या परि^२कल्पितपरिपूर्णांहम्भावः, अत एवाति- सुन्दरः। महात्रिपुरसुन्दरीनामधेयपरचित्कलोल्लासास्पदपरमसुन्दरपरमप्रेमास्पद- परमशिवाभिन्न इत्यर्थः ॥७॥ पूजामप्येतादृशीमेव कुर्यादित्याह— इन्द्रियप्रीणनैर्द्रव्यैर्विहितस्वात्मपूजनः । इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि, तेषां प्रीणनानि द्रव्याणि विशिष्टशब्दस्पर्शरूपरसगन्ध-^३ वन्ति, तैर्विहितं स्वात्मदेवतायाः पूजनं येन स तथाविधः। तदुक्तं मुख्याम्नाय- रहस्यविधौ— निष्कल, निराकार, निराश्रय स्वरूप की चिन्ता का ही नाम ध्यान है। सकल स्वरूप की, हाथ-मुंह आदि से संयुक्त साकार इष्टदेव के स्वरूप की कल्पना को यहाँ ध्यान नहीं माना जाता ॥ स्वयं व्याख्याकार ने अपने किसी^१ ग्रन्थ में कहा है—"साधक को चाहिये कि वह चिन्मय ज्ञानसमुद्र की लहर में विलीन हो जाय और इस तरह से वर्तमान सांसारिक संकुचित स्वरूप के संकट से अपने को बचा ले"। ऐसा करने से उसकी परिपूर्ण अहन्ता का विकास हो जायगा और वह परम सुन्दर बन जायगा, महात्रिपुरसुन्दरी नामक परम चित्कला के उल्लास से प्राप्त परम सुन्दर परमप्रेमास्पद परमशिव स्वरूप में अपने को प्रतिष्ठित कर लेगा, मैं शिव ही हूँ, इस प्रत्यभिज्ञा के जाग जाने से वह साधक अपने को परम सुन्दर परमशिव स्वरूप में ही देखने लगेगा ॥७॥ ऐसा साधक इसी कोटि की पूजा का भी अनुष्ठान करे— इन्द्रियों को तृप्त करने वाले द्रव्यों से वह साधक स्वात्मा रूपी इष्टदेव की पूजा करे। आँख, नाक, कान आदि इन्द्रियाँ हैं। इनको प्रसन्न करने वाले द्रव्य विशिष्ट शब्द, १. निर्विकारा-ख. ने., निर्विकल्पा-ज. । मु. पुस्तके श्लोकेऽस्मिन् भूयान् पाठभेदो दृश्यते। २. कल्पितपूर्णभावः-ने. ज. झ. उ.। ३. गन्धाः-क. ग. । १. अमृतानन्द ने अपने तत्त्वविमर्शिनी नामक ग्रन्थ को यहीं (३।७८) उद्धृत किया लगता है, यह वक्तव्य तथा इसी तरह के अन्य वचन भी उसी ग्रन्थ के होंगे।

२३० योगिनीहृदयम् [पूजासंकेतः इन्द्रियद्वारसंग्राह्यैर्गन्धाद्यैः स्वात्मदेवता। स्वभावेन समाराध्या ज्ञातुः सोऽयं महामखः॥ इति। जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात्। भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत्॥ (श्लो० ७१) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या श्रोत्रादीन्द्रियविषय शब्दाद्यनुभवजनितान- न्दानां महानन्देन समरसीकरणं परा पूजेत्यर्थः॥ अथापरां पूजां वक्तुं तदङ्गभूतं बाह्यन्यासमाह— न्यासं निर्वर्तयेद् देहे षोढान्यासपुरःसरम्॥८॥ षोढान्यासो१ "गणेश" (नि० षो० १।१) इत्याद्यसूत्रे सूचितः। देहे, स्वस्येति शेषः। षोढा षट्प्रकारको न्यासः॥८॥ स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं। इनसे साधक को अपने आत्मारूपी इष्टदेव की विधि- पूर्वक पूजा करनी चाहिये। मुख्याम्नायरहस्यविधि१ में बताया गया है— इन्द्रियों के द्वार से, उनकी सहायता से गन्ध आदि विषयों का ही पूजासामग्री के रूप में संग्रह कर अपनी आत्मारूपी इष्टदेवता की स्वाभाविक उपासना करनी चाहिये। ज्ञानी साधक के लिये यही सबसे बड़ी पूजा है, महायज्ञ है॥ जग्धि और पान के कारण उल्लास, रस और आनन्द दशा की अभिव्यक्ति होने पर साधक उसमें परिपूर्ण भैरव स्वरूप को देखे, ऐसा करने से वह महानन्द से परिपूर्ण हो जाता है॥ विज्ञानभैरवभट्टारक की इस उक्ति के अनुसार श्रोत्र (कान) आदि इन्द्रियों के साथ शब्द आदि विषयों का सम्पर्क होने से जो आनन्द उत्पन्न होता है, उसकी महानन्द के साथ समरसता (एकात्मकता) की भावना का ही नाम परा पूजा है॥ परा पूजा का स्वरूप बताने के बाद अब अपरा पूजा का निरूपण किया जा रहा है। सबसे पहले अपरा पूजा के अंगभूत बाह्य न्यास का स्वरूप बताया जा रहा है— अपने देह में षोढा न्यास के साथ अन्य न्यासों का भी विन्यास करे॥८॥ नित्याषोडशिकार्णव के प्रथम श्लोक में षोढा न्यास की सूचना दी गई है। साधक अपने शरीर में इनका विन्यास करे। षोढा शब्द का अर्थ छः प्रकार का न्यास है॥८॥ १. न्यासपुरःसरमित्यत्र सूचितो न्यासो निगद्यत इति शेषः—ख. ज. झ., न्यासो गणेशेत्यत्र सूचितः—ने. उ.। १. मुख्याम्नायरहस्यविधि का यह श्लोक आगे (३।११२) मुख्याम्नायरहस्य के नाम से तथा भास्करराय के सेतुबन्ध (पृ० १९८) में आम्नायरहस्य के नाम से स्मृत है। महोत्सवविधि (पृ० ६४) इसको अभियुक्तवचन कहते हैं।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३१ १तत्प्रकाराणां गणनामाह— गणेशैः प्रथमो न्यासो द्वितीयस्तु ग्रहैर्मतः । नक्षत्रैश्च तृतीयः स्याद् योगिनीभिश्चतुर्थकः ॥९॥ राशिभिः पञ्चमो न्यासः षष्ठः पीठैर्निगद्यते । सुगमम् । न्यासं न्यासजातम्, जातावेकवचनम् । निर्वर्तयेदिति शेषः ॥९-१०॥ षोढा षट्प्रकारन्यास एकएव, तत्प्रकारं षोढान्यासमाहात्म्यं फलं चाह— षोढान्यासस्त्वयं प्रोक्तः सर्वत्रैवापराजितः ॥१०॥ एवं यो न्यस्तगात्रस्तु स पूज्यः सर्वयोगिभिः । नास्त्यस्य पूज्यो लोकेषु पितृमातृमुखो जनः ॥११॥ स एव पूज्यः सर्वेषां स स्वयं परमेश्वरः । षोढान्यासविहीनं यं प्रणमेदेष पार्वति ॥१२॥ सोऽचिरान्मृत्युमाप्नोति नरकं च प्रपद्यते । छः प्रकार के न्यास की ही अब गणना करते हैं— गणेशों से पहला न्यास, ग्रहों से दूसरा, नक्षत्रों से तीसरा, योगिनियों से चौथा, राशियों से पाचवाँ और पीठों से छठा न्यास किया जाता है ॥९-१०॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । न्यास शब्द में एकवचन जाति का वाचक है । इससे इन छः न्यासों को करे, ऐसा अर्थ होगा । इस श्लोक में 'निर्वर्तयेत्' क्रिया का अध्याहार आठवें श्लोक से कर लिया जाता है ॥९-१०॥ षोढा न्यास की एक जाति है, अर्थात् इन सबको निर्दिष्ट क्रम के अनुसार एक साथ किया जाता है । अब इनकी पद्धति, माहात्म्य और फल का निरूपण किया जा रहा है— यह षोढा न्यास सर्वत्र अपराजेय माना गया है । आगे बताई गई विधि से जो इसका अनुष्ठान करता है, वह सभी योगियों का भी पूज्य बन जाता है । लोक में माता-पिता जैसे पूजनीय जन भी इसके लिये पूज्य नहीं रह जाते । वही सबका पूज्य हो जाता है । वह स्वयं परमेश्वर बन जाता है । हे पार्वति ! ऐसा योगी षोढा न्यास से हीन व्यक्ति को यदि प्रणाम कर दे, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है और वह नरक में जाता है ॥१०-१३॥ १. तत्प्रकारमाह—ख. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

२३२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रोक्तोऽयं षोढा न्यासः, सर्वत्र सर्वलोकेष्वपि, अपराजितः अप्रतिहतसाम- [र्थ्यः१, एवं वक्ष्यमाणक्रमेण यो न्यस्तगात्रः षोढान्याससाम] र्थ्यश्छिन्नपाशत्वात् स्वय- मेव परमेश्वरः । अत एव लोकेषु जनेषु स एव योगिभिः पूज्यः । किं बहुना, सर्वेषा- मपि पूज्यः, नास्त्यस्य पूज्यः कोऽपि लोके। २यद्येष बलादन्यस्मै ३प्रणमति, स मृतो भवेत्, नरकं च प्रयातीत्यर्थः ॥१०-१३॥ षोढान्यासप्रकारं वक्तुं प्रतिजानीते— षोढान्यासप्रकारं च कथयामि तवानघे ॥१३॥ ४स्पष्टम् ॥१३॥ तत्प्रकारमाह— विघ्नेशो विघ्नराजश्च विनायकशिवोत्तमौ । ५विघ्नकृद् विघ्नहर्ता च ६गणराड् गणनायकः ॥१४॥ एकदन्तो द्विदन्तश्च गजवक्त्रो निरञ्जनः । ७कपर्दवान् दीर्घमुखः शङ्कुकर्णो वृषध्वजः ॥१५॥ ऊपर बताया गया यह षोढा न्यास सभी लोकों में एक समान अपराजेय सामर्थ्य वाला है । आगे बताई गई विधि से जो साधक इसको अपने शरीर में विन्यस्त कर लेता है, वह इन न्यासों की सहायता से सारे पाश-जालों से मुक्त हो स्वयं परमेश्वर बन जाता है । संसार में वह योगियों का भी पूज्य हो जाता है। योगियों का ही नहीं, वह सबका पूज्य बन जाता है। लोक में उसके लिये कोई भी पूजनीय नहीं रह जाता । यदि वह जबरदस्ती से किसी को प्रणाम करता है, तो वह जबरदस्ती प्रणाम कराने वाला व्यक्ति तत्काल मर जाता है और उसको नरक भी भोगना पड़ता है ॥१०-१३॥ अब षोढा न्यास की विधि को बताने की प्रतिज्ञा करते हैं— हे अनघे ! अब मैं तुम्हें षोढा न्यास की विधि बताने जा रहा हूँ ॥१३॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥१३॥ उस विधि को ही अब बताते हैं— विघ्नेश, विघ्नराज, विनायक, शिवोत्तम, विघ्नकृत्, विघ्नहर्ता, गणराट्, गणनायक, एकदन्त, द्विदन्त, गजवक्त्र, निरञ्जन, कपर्दवान्, दीर्घमुख, शङ्कुकर्ण, १. 'र्थ्यं••••साम' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. यदि चेदेष बाल्याद्यस्मै प्रण- क. ग. । ३. प्रणमयति-झ. उ. । ४. स्पष्टमेतत्-ज. । ५. विघ्नहृद् विघ्नकर्ता-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ६. गणनायक एव च-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । ७. कन्दर्प- ने...

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३३ गणनाथो गजेन्द्रश्च शूर्पकर्णस्त्रिलोचनः । लम्बोदरो महानादश्चतुर्मूर्तिः सदाशिवः ॥१६॥ आमोदो दुर्मुखश्चैव सुमुखश्च प्रमोदकः² । एकपादो द्विजिव्हश्च शूरो वीरश्च षण्मुखः ॥१७॥ वरदो वामदेव³श्च वक्रतुण्डो द्वितुण्डक⁴ः । सेनानीर्ग्रामणीर्मत्तो विमत्तो मत्तवाहनः ॥१८॥ जटी मुण्डी तथा खड्गी वरेण्यो वृषकेतनः । भक्ष्य⁵प्रियो गणेशश्च मेघनादो गणेश्वरः ॥१९॥ ⁶[ग्रन्थान्तरे— ए(ते ? ता) गणेशवर्णानामेकपञ्चाशतः क्रमात् । श्रीश्च ह्रीश्चैव तुष्टिश्च शान्तिः पुष्टिः सरस्वती ॥ रमा मेधा तथा कान्तिः कामिनी मोहिनी बला । तीव्रा च ज्वालिनी नन्दा सुरसा कामरूपिणी ॥ उग्रा च जयिनी सत्या विघ्नेशानी सुरूपिणी । कामदा मदजिव्हा च विकटा घूर्णितानना ॥ वृषध्वज, गणनाथ, गजेन्द्र, शूर्पकर्ण, त्रिलोचन, लम्बोदर, महानाद, चतुर्मूर्ति, सदाशिव, आमोद, दुर्मुख, सुमुख, प्रमोदक, एकपाद, द्विजिव्ह, शूर, वीर, षण्मुख, वरद, वामदेव, वक्रतुण्ड, द्वितुण्डक, सेनानी, ग्रामणी, मत्त, विमत्त, मत्त- वाहन, जटी, मुण्डी, खड्गी, वरेण्य, वृषकेतन, भक्ष्यप्रिय, गणेश, मेघनाद और गणेश्वर ये ५१ गणेश हैं ॥१४-१९॥ [किसी दूसरे¹ ग्रन्थ में बताया गया है— इन ५१ संख्या के गणेशों की क्रम से ये ५१ शक्तियाँ हैं—श्री, ह्री, तुष्टि, शान्ति, पुष्टि, सरस्वती, रमा, मेधा, कान्ति, कामिनी, मोहिनी, बला, तीव्रा, ज्वालिनी, १. नन्दः-छ. ज. उ. । २. प्रबोधकः-झ. । ३. वामनश्चैव-उ. । ४. द्विरण्डकः-क. । ५. भक्त-झ. । ६. 'ग्रन्थान्तरे····शक्तयः' नास्ति-ख. ग. ज. ब. उ. ।

  1. आगे २० वें श्लोक की व्याख्या में अमृतानन्द ने गणेशों की शक्तियों में पहला नाम पुष्टि का दिया है और वहाँ कहा है कि इनके नामों की चर्चा अन्य आगमों की पद्धतियों में आ चुकी है, अतः हम यहाँ उनका विवरण नहीं दे रहे हैं । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तुत उद्धरण दीपिका का अंग नहीं बन सकता । इस उद्धरण में पहला नाम पुष्टि का नहीं है । अनेक हस्तलेखों में यह पाठ मिलता भी नहीं है ।

२३४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः भूतिर्भूमिः सती रम्या मानुषी मकरध्वजा । विकर्णा भुकुटी लज्जा दीर्घघोणा धनुर्धरा ॥ तथैव यामिनी रात्रिेश्चन्द्रकान्ता शशिप्रभा । लोलाक्षी चपला ऋद्धिर्दुर्भगा सुभगा शिवा ॥ दुर्गा गुहप्रिया काली ललज्जिह्वा च शक्तयः¹ ।] 'नामान्येतानि नात्र व्याख्येयानीति ॥१४-१९॥ तेषां ध्यानमाह— तरुणारुणसंकाशान् गजवक्त्रान् त्रिलोचनान् । पाशाङ्कुशवराभीतिहस्तांन् शक्तिसमन्वितान् ॥२०॥ तरुणारुणसंकाशान् तरुणारुणसवर्णान् । गजस्य वक्त्रमिव वक्त्रं येषां ते गजवक्त्रास्तान् । ऊर्ध्वकरयोः पाशाङ्कुशौ, अधःकरयोर्वराभये दधानान् । पुष्ट्यादिभिः समन्वितान् । अत्र सूचितानां नाम्नामागमान्तरपद्धतिषु चोक्तत्वान्न वदामः ॥२०॥ नन्दा, सुरसा, कामरूपिणी, उग्रा, जयिनी, सत्या, विघ्नेशानी, सुरूपिणी, कामदा, मद- जिह्वा, विकटा, घूर्णितानना, भूति, भूमि, सती, रम्या, मानुषी, मकरध्वजा, विकर्णा, भ्रुकुटी, लज्जा, दीर्घघोणा, धनुर्धरा, यामिनी, रात्रि, चन्द्रकान्ता, शशिप्रभा, लोलाक्षी, चपला, ऋद्धि, दुर्भगा, सुभगा, शिवा, दुर्गा, गुहप्रिया, काली और ललज्जिह्वा ।] इन नामों की व्याख्या यहाँ नहीं करनी है ॥१४-१९॥ इनका ध्यान बताते हैं— ये सभी गणेश तरुण अरुण के समान कान्तिवाले, हाथी के समान मुँह वाले और तीन नेत्रों वाले हैं। इनके चार हाथों में क्रमशः पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्रा है तथा सभी अपनी-अपनी शक्तियों के साथ रहते हैं ॥२०॥ सभी गणेशों का वर्ण तरुण अरुण के समान लाल है। इनका मुँह हाथी का जैसा है। ऊपर के दोनों हाथों में पाश और अंकुश तथा नीचे के हाथों से वर और अभय मुद्राओं को धारण किये हुए हैं और ये पुष्टि आदि शक्तियों के साथ हैं। इनके नामों की चर्चा अन्य आगमों की पद्धतियों में आ चुकी है, अतः हम यहाँ उनका विवरण नहीं दे रहे हैं ॥२०॥ १. तान्येतानि तावद् व्याख्येयानीति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. दित्य-ने. उ. । ३. करात्-च. ज. ।

  1. इन शक्तियों के नाम गणेशों के साथ ज्ञानार्णव तन्त्र (१४।६१-७५) में मिलते हैं। कुछ स्थलों पर पाठान्तर हैं।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३५ न्यासस्थानान्याह— एतांस्तु विन्यसेद् देहे¹ मातृकान्या²सवत् प्रिये । एतान् गणेशान् । मातृका³न्यासवत् मातृकावैखरीन्यासस्थानेषु न्यसे- दित्यर्थः ॥२१॥ ग्रहन्यासमाह— स्वरैस्तु सहितं सूर्यं हृद्यधः प्रविन्यसेत् ॥२१॥ बिन्दुस्थाने सुधासूतिं यादिवर्णचतुष्टयैः । भूपुत्रं लोचनद्वन्द्वे कवर्गाधिपतिं प्रिये ॥२२॥ हृदये विन्यसेच्छुक्रं चवर्गाधिपतिं पुनः⁴ । हृदयोपरि विन्यस्येत् टवर्गाधिपतिं बुधम् ॥२३॥ बृहस्पतिं कण्ठदेशे तवर्गाधिपतिं प्रिये । नाभौ शनैश्चरं चैव⁵ पवर्गेशं सुरेश्वरि ॥२४॥ वक्त्रे शादिचतुर्वर्णैः सहितं राहुमेव च । क्षँकारसहितं केतुं पायौ देवेशि विन्यसेत् ॥२५॥ अब उन स्थानों का उल्लेख कर रहे हैं, जहाँ कि इनका विन्यास किया जाता है— हे प्रिये ! अपने शरीर में मातृका न्यास की पद्धति से इनका विन्यास करना चाहिये ॥ इन गणेशों को मातृका के वैखरी वर्णों का जहाँ जहाँ न्यास किया जाता है, उन्हीं स्थानों में विन्यस्त करना चाहिये ॥ अब ग्रहन्यास की विधि बताते हैं— स्वरों के साथ सूर्य को हृदय के नीचे और यकार आदि चार वर्णों के साथ चन्द्र को बिन्दुस्थान में विन्यस्त करना चाहिये । हे प्रिये ! कवर्ग के स्वामी मङ्गल को दोनों नेत्रों में, चवर्ग के अधिपति शुक्र को हृदय में, टवर्ग के अधिपति बुध को हृदय के ऊपर और हे प्रिये ! तवर्ग के अधिपति बृहस्पति को कण्ठ में विन्यस्त करना चाहिये । हे सुरेश्वरि ! पवर्ग के स्वामी शनैश्चर को नाभि में और शकार आदि चार वर्णों के अधिपति राहु को मुँह में विन्यस्त करे । हे देवेशि ! क्षकार के साथ केतु को पायु देश में विन्यस्त करे ॥२१-२५॥ १. देवि-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । २. स्थान-ख. च. ज. झ., स्थानके पुनः-ने. उ. । ३. स्थान-ने. ज. झ. उ. । ४. बुधः-ख. । ५. विन्यस्य-घ. ज. झ. उ. । ६. देवि-क. ग. । ७. लक्षाभ्यां-उ. ।

२३६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः स्वरैः अकारादिविसर्गान्तैः षोडशभिः सहितम्, 'नाम्न आदौ, सूर्यं हृदयाधो विन्यसेत्²। बिन्दुस्थाने ललाटे। अत्रैवोक्तम् - "दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते" (१।२८) इत्यादिना। सुधासूतिं चन्द्रमसम्। यादिवर्णचतुष्टयैः यरलवै³श्चतुर्भिर्विन्यसेदित्यर्थः। भूपुत्रम् अङ्गारकम्। लोचनद्वन्द्वे कवर्गस्योपरि स्थितमधिपतिं विन्यसेत्। हृदये वक्षसि। स्पष्टमन्यत् पायौ देवेशि विन्यसेदि- त्यन्तम् ॥२१-२५॥ नक्षत्राणां स्थानानि न्यासं चाह- ललाटे दक्षनेत्रे च वामे कर्णद्वये पुनः । पुटयोर्नासिकायाश्च कण्ठे स्कन्धद्वये पुनः ॥२६॥ पश्चात् कूर्पर४युग्मे च मणिबन्धद्वये ५तथा । स्त⁶नयोर्नाभिदेशे च कटिबन्धे ततः परम् ॥२७॥ ऊरुयुग्मे तथा जान्वोर्जङ्घयोश्च पदद्वये । ज्वलत्कालानलप्रख्या वरदाभयपाणयः ॥२८॥ अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वरों के साथ सूर्य को हृदय के नीचे विन्यस्त करे। बिन्दुस्थान, अर्थात् ललाट में सुधासूति चन्द्रमा को य र ल व इन चार वर्णों के साथ विन्यस्त करे। ललाट में बिन्दु का स्थान है, यह विषय यहीं (१।२८) वर्णित हो चुका है। भूपुत्र (अंगारक) मंगल को कवर्ग के अधिपति के रूप में दोनों नेत्रों में विन्यस्त करे। हृदय का अर्थ वक्षस्थल है। 'पायौ देवेशि विन्यसेत्' पर्यन्त अन्य पदों का अर्थ स्पष्ट है ॥२१-२५॥¹ स्थाननिर्देश पूर्वक नक्षत्रों का न्यास बताया जा रहा है- हे देवताओं के द्वारा पूजित देवि ! ललाट, दक्ष और वाम नेत्र, दोनों कान, दोनों नासापुट, कण्ठ, दोनों कन्धे, दोनों कूर्पर (कोहनियाँ), दोनों मणिबन्ध (कलाईयाँ), दोनों स्तन, नाभिदेश, दोनों कटिबन्ध, दोनों जांघे, दोनों घुटने, दोनों पिण्डलियाँ, दोनों पैर-इन सत्ताईस स्थानों में सत्ताईस नक्षत्रों का विन्यास १. आदौ नाम्ना-क. ख. ग.। २. विन्यस्य-ख. ने. झ. उ.। ३. 'चतुर्भिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. कूर्परयोर्युग्मे-क. उ.। ५. पुनः-क. ग., ऽपि च-ज.। ६. हस्तयोः-च. छ. ज. झ.। ७. द्वन्द्वे-च. उ.।

  1. कुछ पुस्तकों में प्रस्तुत प्रकरण में ग्रह आदि के ध्यान के श्लोक भी मिलते हैं।- दीपिका में इनकी व्याख्या नहीं मिलती। आगे (३।३०-३१) दीपिकाकार कहते हैं कि ध्यान आगमान्तर से जानना चाहिये। इससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि योगिनी- हृदय में ग्रह, नक्षत्र आदि का ध्यान वर्णित नहीं है।