योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः भूतिर्भूमिः सती रम्या मानुषी मकरध्वजा । विकर्णा भुकुटी लज्जा दीर्घघोणा धनुर्धरा ॥ तथैव यामिनी रात्रिेश्चन्द्रकान्ता शशिप्रभा । लोलाक्षी चपला ऋद्धिर्दुर्भगा सुभगा शिवा ॥ दुर्गा गुहप्रिया काली ललज्जिह्वा च शक्तयः¹ ।] 'नामान्येतानि नात्र व्याख्येयानीति ॥१४-१९॥ तेषां ध्यानमाह— तरुणारुणसंकाशान् गजवक्त्रान् त्रिलोचनान् । पाशाङ्कुशवराभीतिहस्तांन् शक्तिसमन्वितान् ॥२०॥ तरुणारुणसंकाशान् तरुणारुणसवर्णान् । गजस्य वक्त्रमिव वक्त्रं येषां ते गजवक्त्रास्तान् । ऊर्ध्वकरयोः पाशाङ्कुशौ, अधःकरयोर्वराभये दधानान् । पुष्ट्यादिभिः समन्वितान् । अत्र सूचितानां नाम्नामागमान्तरपद्धतिषु चोक्तत्वान्न वदामः ॥२०॥ नन्दा, सुरसा, कामरूपिणी, उग्रा, जयिनी, सत्या, विघ्नेशानी, सुरूपिणी, कामदा, मद- जिह्वा, विकटा, घूर्णितानना, भूति, भूमि, सती, रम्या, मानुषी, मकरध्वजा, विकर्णा, भ्रुकुटी, लज्जा, दीर्घघोणा, धनुर्धरा, यामिनी, रात्रि, चन्द्रकान्ता, शशिप्रभा, लोलाक्षी, चपला, ऋद्धि, दुर्भगा, सुभगा, शिवा, दुर्गा, गुहप्रिया, काली और ललज्जिह्वा ।] इन नामों की व्याख्या यहाँ नहीं करनी है ॥१४-१९॥ इनका ध्यान बताते हैं— ये सभी गणेश तरुण अरुण के समान कान्तिवाले, हाथी के समान मुँह वाले और तीन नेत्रों वाले हैं। इनके चार हाथों में क्रमशः पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्रा है तथा सभी अपनी-अपनी शक्तियों के साथ रहते हैं ॥२०॥ सभी गणेशों का वर्ण तरुण अरुण के समान लाल है। इनका मुँह हाथी का जैसा है। ऊपर के दोनों हाथों में पाश और अंकुश तथा नीचे के हाथों से वर और अभय मुद्राओं को धारण किये हुए हैं और ये पुष्टि आदि शक्तियों के साथ हैं। इनके नामों की चर्चा अन्य आगमों की पद्धतियों में आ चुकी है, अतः हम यहाँ उनका विवरण नहीं दे रहे हैं ॥२०॥ १. तान्येतानि तावद् व्याख्येयानीति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. दित्य-ने. उ. । ३. करात्-च. ज. ।
- इन शक्तियों के नाम गणेशों के साथ ज्ञानार्णव तन्त्र (१४।६१-७५) में मिलते हैं। कुछ स्थलों पर पाठान्तर हैं।