भारतकोश
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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०७ रक्षितः। सद्यः प्रत्ययकारकः एतदाकर्णनेन शिवोऽहमस्मीति प्रत्ययः सद्य एव समुदेतीत्यर्थः ॥७६-७७॥ नन्वयमर्थः कुत्र स्थितः ? कुत्र वा दृष्टस्त्वया ? किं वा तस्य फलम् ? इत्यत आह— महाज्ञानार्णवे दृष्टः शङ्का तत्र न पार्वति ॥७७॥ विद्यापीठनिबन्धेषु संस्थितो दिव्यसिद्धिदः। विद्यैव पीठं विद्यापीठम्, शिवयोर्विश्रान्तिस्थान¹त्वात्। तन्निबद्ध्यते येषु तानि तदवयवभूतानि वाग्भवकामराजशक्त्याख्यानि बीजानि, तेषु विद्यापीठनिब- न्धेषु, "अकुले विषसंज्ञे च" (१।२५) इत्यत्रोक्तरीत्या बीजत्रयशिखरवर्तिबिन्द्वर्ध- चन्द्ररोधनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनाक्रमेणानुसन्धीयमानेषु उन्मन्यन्त- देशकालानवच्छिन्न²वस्तुपरचिदात्मकमहातत्त्वार्थः संस्थित इत्यर्थः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— नहीं है, बड़े जतन के साथ छिपाये रखा है। इसको सुन लेने मात्र से मैं शिव हूँ, इस तरह का ज्ञान तत्काल उत्पन्न हो जाता है ॥ ७६-७७॥ फिर प्रश्न होता है कि यह अर्थ अब तक कहाँ छिपा हुआ था ? आपने उसे कहाँ देखा और इसका फल क्या है ? अब इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देते हैं— इस अर्थ को मैंने महाज्ञानार्णव में देखा है। हे पार्वति ! इस विषय में किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि विद्यापीठ के निबन्धों में भी दिव्य सिद्धि के देने वाले इस अर्थ का निरूपण है ॥७७-७८॥ विद्या स्वयं ही तब पीठ बन जाती है, जब शिव और शक्ति उस पर विश्राम करते हैं। इस ¹विद्यापीठ की जहाँ व्याख्या की जाती है, वे उसी के अवयवभूत वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक बीज हैं। पूर्वोपदिष्ट (१।२५) पद्धति से इन तीनों बीजों के शीर्ष स्थान में स्थित बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना के क्रम से जब हम परम तत्त्व के अनुसन्धान में लगते हैं, तो उन्मना से परे देश, काल, आकार आदि से अपरिच्छिन्न परचिदात्मक स्थिति का ज्ञान होता है। यही महा- तत्त्वार्थ है। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— १. स्थानं तन्निबन्धनानि-ख. ने. ज. उ. । २. 'वस्तु' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. मुद्रा, मण्डल, मन्त्र और विद्या नामक चार पीठों में विभक्त तन्त्रों की चर्चा हमने नि० बो० (उपोद्घात, पृ० ५६-५७) में की है। उसी विभाग की चर्चा यहां हुई है, किन्तु अमृतानन्द और भास्करराय ने उस परम्परा की उपेक्षा कर यहाँ कल्पना के सहारे विद्यापीठ लिया है।

२०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः या १चेयं समनाशक्तिस्तदूर्ध्वे उन्मना २स्मृता। नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता ॥ सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिवशक्तिरिति ख्यातं३ निर्विकल्पं निरञ्जनम् ॥ तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोतीतगोचरम् । अनिष्कलं चासकलं नीरूपं निर्विकल्पकम् ॥ निर्द्वन्द्वं परमं ४तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् । इति । दिव्यसिद्धिदः । दिवि ५उन्मन्यन्ते निरस्तनिखिलप्रपञ्चमहाशून्ये भवतीति दिव्यः ६परमशिवः पूर्वोक्तः (२।७६), तस्य सिद्धिः स्वाभेदेन परिज्ञानम्, तल्लक्षणं परमप्रयोजनं ददातीति दिव्यसिद्धिदः । महाज्ञानार्णवे दृष्टः । तादृशपरमशिव- सामरस्यसमाधिरेव महाज्ञानम्, तदेवार्णवः७, निस्तरङ्गपारावारभूतपरमामृत- परिपूर्णत्वात्, तस्मिन् दृष्टः ८स्वात्माहंभावभावनया भावितः। कोऽर्थः ? अयं परमः यह जो समना शक्ति है, उसके ऊपर उन्मना शक्ति की स्थिति सुनी जाती है । यह काल की कला, तत्त्व, देवता आदि की प्रतीति नहीं होती । परम शुद्ध स्वच्छ निर्वाण पद यही है । शिव के स्वरूप की प्रतीति का १द्वार यही है । यह शिव और शक्ति का समरस स्वरूप है । हे वरारोहे ! यह निर्विकार, निरंजन, तत्त्वातीत पद मन और वाणी का विषय नहीं बन सकता । यही अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है, यही शिव नामक परम पद है ॥ यह महातत्त्वार्थ दिव्य सिद्धि को देने वाला है । उन्मना के अन्त में समस्त जागतिक प्रपंचों से ऊपर विद्यमान महाशून्य ही परम आकाश है । उस परम आकाश में ही परम शिव विद्यमान हैं । इस दिव्य परम शिव की सिद्धि, उसके साथ अपना अभेद ज्ञान इस महातत्त्वार्थ की सहायता से ही मिल सकता है, अतः यह दिव्य सिद्धि को देने वाला है । यह ज्ञान २महाज्ञानार्णव में दृष्ट है । परम शिव की समरसता रूप समाधि को ही यहाँ महाज्ञान कहा गया है । यह निस्तरंग शान्त समुद्र के समान परमामृत से परिपूर्ण है । इस महाज्ञानरूपी समुद्र में इस अर्थ को देखा गया है, अपनी आत्मा का ही यह स्वरूप १. चोक्ता-ज. झ., शक्तिः का०णत्वेन पूर्वतनः पाठः । २. स्थिता-ने. ज. । ३. ता**** कारा''''ञ्जना-ख. ने. ज. झ. । ४. शान्तं-क. ग. । ५. 'उन्मन्यन्ते' नास्ति-क. ग. । ६. परमेश्वरः-ख. ने. झ. उ. । ७. र्णवो विस्तारः, तरणपराणां परा-ख. ने. ज. उ. । ८. शिवाहं-ज. झ. । १. पृ० ४९ की टिप्पणी देखिये । २. महाज्ञानार्णव एक तन्त्र का नाम है । भास्करराय ने भी इसको माना है । अमृतानन्द ने इस ग्रन्थ के नाम पर ही अपने ग्रन्थ का नामकरण किया है ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०९ शिवपरप्राप्तिलक्षणो महातत्त्वार्थः सौभाग्यविद्याबीजत्रयशिखरवर्तिन्युन्मन्यवसान- भूमाववस्थितस्तथाविधफलदो मया नित्यं समाधिदशायां निरीक्ष्यत¹ इत्यर्थः । शङ्का तत्र न पार्वति । शङ्का तत्र त्वया न कार्या । यथार्थदर्शी यथादृष्टार्थवादी तवाहमाप्तः, तेन मदुक्तेऽर्थेऽपि विश्वासः कार्य इत्यर्थः ॥७७-७८॥ नन्वयं महातत्त्वार्थो ²महागुप्त इत्युक्तम्, तर्हि कीदृशैर्लभ्यत इत्यत आह— कौलाचारपरैर्देवि पादुकाभावनापरैः ॥७८॥ योगिनीमेलनोधुक्तैः प्राप्तदिव्याभिषेचनैः । शङ्काकलङ्कविगतैः सदा मुदितमानसैः ॥७९॥ पारम्पर्येण विज्ञातरहस्यार्थविशारदैः । लभ्यते कुलं शरीरं महाप्रयोजनहेतुतया ज्ञेयं येषां ते कौलाः । तदुक्तं स्वच्छन्द- संग्रहे— है, इस तरह से पहचाना गया है। इसका भाव यह है कि परम शिव की भलीभाँति प्राप्ति कराने वाला यह महातत्त्वार्थ सौभाग्यविद्या के तीन बीजों के शिखर स्थान में विद्यमान उन्मना पर्यन्त नाद की जहाँ समाप्ति होती है, वहाँ विराजमान है। यह तत्काल फल देने वाला है। इसीलिये मैं प्रतिदिन समाधि दशा में इसका निरीक्षण करता हूँ। हे पार्वति ! इस विषय में तुमको किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये। सभी पदार्थों के रहस्य को यथार्थ रूप में देखने वाला और यथार्थ रूप में देखे गये उन विषयों को तुमको समझाने वाला मैं तुम्हारे लिये परम प्रमाणभूत हूँ। इसलिये मेरी कही बात पर तुमको विश्वास करना चाहिये ॥७७-७८॥ भगवान् शिव ने बताया है कि यह महातत्त्वार्थ परम गोपनीय है, तब कैसे व्यक्ति इसे प्राप्त कर सकते हैं, इसीका अब वर्णन किया जा रहा है— हे देवि ! कौलाचार का अनुसरण करने वाले, गुरुपादुका की सेवा में लगे हुए, योगिनीमेलन में निरत, सभी प्रकार की शंकाओं से उन्मुक्त, सदा प्रसन्न- चित्त रहने वाले लोग ही इस महातत्त्वार्थ को ठीक तरह से समझ सकते हैं, जो कि गुरु-क्रम से दीक्षित और अभिषिक्त होकर परम्परा से सारे रहस्य को जानते हैं ॥७७-८०॥ कुल शब्द यहाँ शरीर का वाचक है। यह मानव शरीर ही महाप्रयोजन मोक्ष की सिद्धि कराने वाला है, ऐसा मानने वाले कौल कहलाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इनका वर्णन है— १. क्ष्यते । अस्मत्कल्पितोऽयं पाठः ख., ग., घ., ङ.। २. महा गुप्तः ख., ङ.। १४

२१० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः कुलज्ञानमथो वक्ष्ये कौलिकानां हिताय वै। यस्य विज्ञानमात्रेण योगोपायाश्च योगिनाम् ॥ १सुगुप्ताः सिद्धयः सर्वा भवन्ति सुलभाः प्रिये। शरीरं कुलमित्युक्तम् .... .... .... ॥ तेषामाचारः, सर्वेषामेव शिष्याणां दीक्षितानां२ कुलान्वये। सर्वावस्थागतानां च साधारणमतं३ शृणु ॥ गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च पूजा श्रद्धा क्षमा धृतिः। इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या समयाचारपरैः। पादुकाभावनापरैः, स्वप्रकाशशिवमूर्त्तिरेकिका तद्विमर्शतनुरेकिंका तयोः। सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः॥ (चि० १) अब मैं कौलिकों के हित के लिये कुल ज्ञान का उपदेश करता हूँ। हे प्रिये ! इसको जानने मात्र से योगियों को योग के उपायों की और नाना प्रकार की अत्यन्त गुप्त सिद्धियों की प्राप्ति अनायास हो जाती है। यह शरीर ही कुल कहलाता है ॥ इन कौलिकों का आचार ही कौलिकाचार है। इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में है— कुलान्वय में दीक्षित सभी शिष्यों के लिये, चाहे वे किसी भी अवस्था में पहुँच गये हों, साधारण नियम (समय) सुनो, जिनका पालन करना सबके लिये आवश्यक है। ये हैं—गुरुभक्ति, शान्ति, पूजा, श्रद्धा और धृति ॥ इस तरह से समयाचार का, समयों (नियमों) का पालन करना ही कौलिकाचार है। इनका सदा पालन करने वाला हुआ कौलिकाचारतत्पर। पादुकाभावनापर का अर्थ है गुरु की पादुका की भावना में सदा लगा हुआ। गुरुपादुका का स्वयं व्याख्याकार ने अपने स्तोत्र चिद्विलास में इस तरह से वर्णन किया है— स्वयंप्रकाशस्वरूप शिव की एक मूर्ति है और उसका विमर्शशक्तिमय दूसरा शरीर है। इन दोनों के सामरस्यमय शरीर से परा पादुका बनती है, जो परमशिव स्वरूप गुरु का देह है। इसका अभिप्राय यह है कि गुरु की पादुका की भावना करने वाला शिष्य अपने गुरु के प्रसाद से शिव और शक्ति के सामरस्य को भलीभाँति समझ सकता है, क्योंकि गुरु की पादुका में यह स्वरूप स्वाभाविक रूप से छिपा हुआ है ॥ १. योगोक्तविधयः सर्वे—क. ग. । २. तानामपि प्रिये—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गतं—क. ग. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २११ इत्यस्मदुक्तरीत्या प्रकाशविमर्शतत्समष्टितया श्रीगुरुपादुकात्रयभावनापरैः। योगिनीमेलनोध्द्युक्तैः, यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते। तत्सतां हि नियमावलम्बनं १ध्यानपूजनकथा विडम्बना॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या मातृमानमेयसंविदो योगिन्यः, तासां मेलनम् अन्तर्मुखीभावेन परप्रमातृविश्रान्तिः३, अथवा ब्राह्म्याद्यष्टकार्चनार्थं सामयिक- शक्तिचक्रमेलनं योगिनीमेलनम्, तत्रोद्युक्तैः४। प्राप्तदिव्याभिषेचनैः लब्धपरमशिव- इस तरह से यहाँ प्रकाश, विमर्श और इनकी समष्टिस्वरूपिणी तीन पादुकाओं की भावना करनेवालों का बोध होता है। अब योगिनीमेलनोध्द्युक्त पद का अर्थ किया जा रहा है— जहाँ जहाँ मरीचियाँ मिलती हैं, सब जगह उस परम शिव का व्यापक स्वरूप ही दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में नाना प्रकार के नियमों का पालन करना, ध्यान करना, पूजा करना—ये सब विडम्बना मात्र हैं॥ इस १प्रामाणिक वचन के अनुसार यहाँ माता, मान और मेय रूप संवित्त्तियाँ ही योगिनियाँ कहलाती हैं। उनके मेलन का अर्थ है उनको अन्तर्मुख बना कर परप्रमाता स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देना। अथवा ब्राह्मी प्रभृति के २अष्टाष्टक स्वरूपों की उपासना के लिये सामयिक शक्तिचक्र के मेलन को भी योगिनीमेलन कह सकते हैं। इस उभय- विध योगिनीमेलन के लिये जो तत्पर हैं, उनको कहते हैं योगिनीमेलनोध्द्युक्त। इसी- १. लम्बिनां-क. ग.। २. प्रमाणवच-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'रत्रोद्युक्तैः' इत्य- धिकम्-झ.। ४. 'तत्रोद्युक्तैः' नास्ति-झ.।

  1. अमृतानन्द ने आगे (३।१४३) इसी वचन को स्तोत्रावली के नाम से उद्धृत किया है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रवर्तक भट्ट उत्पल की शिवस्तोत्रावली में उक्त श्लोक नहीं मिलता। भट्ट उत्पल के नाम से उद्धृत कुछ अन्य श्लोक भी वहाँ नहीं मिलते। क्षेम- राज ने शिवस्तोत्रावली के उसी स्वरूप की व्याख्या की है, जो श्रीराम, आदित्यराज और विश्वावर्त के द्वारा निर्धारित किया गया था। प्राप्त सभी हस्तलेखों के आधार पर मूल शिवस्तोत्रावली का नया संस्करण होना चाहिये।
  2. अष्टाष्टक शब्द का अर्थ भास्करराय की सेतुबन्ध टीका (३।२००-२०२) में देखिये। वैरोचन कृत प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय (६।३२७-४००) में ब्रह्मयामल के प्रमाण से आठ दिशाओं में विद्यमान योगिनियों के अष्टाष्टक स्वरूपों (६४ योगिनियों) की नामावली तथा ध्यान विस्तार से वर्णित हैं। भेड़ाघाट जैसे स्थानों में विद्यमान ६४ योगिनियों की मूर्तियों का इनसे मिलान करके नया पाठ निर्धारित होना चाहिये।

२१२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः प्रायगुरुवराभिमन्त्रितचिद्रसमयकलशसलिलसेकैस्ततः प्रक्षालितमलमयपाशैः। अत एव शङ्काकलङ्कविगतैः। इदमित्थं भवेन्न भवेदित्यनवधारणज्ञानं शङ्का, सैव कलङ्कः, मालिन्यहेतुत्वात्, तस्माद्विगतैः। अत एव सदा मुदितमानसैः, मेघावरण- विगमाद् यथा रखेः स्वरूपं स्फुरति, तथा मलपाशविगमात् सदा येषां मनसि प्रमोद- लक्षणं परशिवस्वरूपं प्रकाशते, तैरित्यर्थः। पारम्पर्येण विज्ञातरहस्यार्थविशारदै- र्लभ्यते शिवादिस्वगुरुपर्यन्तं १गुरुपारम्पर्यक्रमसमासादितसकलरहस्यार्थपर्यालोचन- पटुतरमतिभिरयं२ महातत्त्वार्थो लभ्यत इत्यर्थः ॥७८-८०॥ कौलाचारपरैरित्याद्युक्तगुणविहीनैरयमर्थो न लभ्यत इति शपथपूर्वकमाह— नान्यथा देवि त्वां शपे कुलसुन्दरि ॥८०॥ स्पष्टम् ॥८०॥ तरह से प्राप्तदिव्याभिषेचन का अर्थ है जो प्रायः परमशिव स्वरूप गुरुप्रवर के द्वारा अभिमन्त्रित चिद्रसमय ज्ञानामृत से परिपूर्ण कलश के जल से अभिषिक्त हो चुके हैं और इसके कारण मलमय पाश जिनके घुल चुके हैं। इसीलिये ऐसे योगी शंकारूपी कलंक से मुक्त हो जाते हैं। यह ऐसा होगा या नहीं, इस तरह की अनिश्चयात्मक स्थिति को शंका कहते हैं। यह १शंका मलिनता का कारण बनती है, अतः कलंक के समान है। इस शंका- रूपी कलंक से योगी मुक्त रहते हैं। इसीलिये ये सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। बादलों के हट जाने से जैसे निरावरण सूर्य निर्मल रूप से प्रकाशित होता है, उसी तरह से मलमय पाशों के हट जाने से इनके हृदय में आनन्दमय परशिव का स्वरूप प्रकाशित होता रहता है। शिव से लेकर अपने गुरु पर्यन्त चली आई गुरु-परम्परा के क्रम से जिन्होंने समस्त रहस्यों को समझ लिया है और बड़ी सावधानी से जो इसका पर्यालोचन करते रहते हैं, ऐसे निपुण मति वाले साधक ही इस महातत्त्वार्थ को प्राप्त कर सकते हैं ॥७८-८०॥ कौलाचारपर इत्यादि विशेषताओं से रहित व्यक्ति इसको कभी नहीं प्राप्त कर सकता, इसी बात को अब शपथपूर्वक कहते हैं— हे देवि ! इसके अतिरिक्त अन्य किसी उपाय से इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती। हे कुलसुन्दरि ! यह बात मैं तुमको शपथपूर्वक कहता हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥८०॥ १. पर्यन्तपरम्परया विदितसकल—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'अयं' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । १. आठ पाशों की चर्चा दीपिकाकार (१।७२) ने की है । तन्त्रालोककार (१५। ५९५-५९६) ने इनको ग्रह अथवा आग्रह कहा है । इनमें शंका भी एक है । इसका संक्षिप्त स्वरूप लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० २१२-२१३) में देखिये ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१३ ननु मास्तु गुरुपारम्पर्यक्रमः, पुस्तकपाठादिना व्युत्पत्तिबलेनापि किञ्चिन्मात्र- परिज्ञानं सम्पादयितुं शक्यत इत्याह— पारम्पर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः । तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥८१॥ अन्यथा कौलाचारव्यतिरेकेण ज्ञानमात्रेण पुस्तकपाठोत्पन्नज्ञानमात्रेण तस्य साधकस्य सिद्धिर्न भवतीति ये पारम्पर्यविहीनाः शब्दव्युत्पत्तिबलेन किञ्चिन्मात्रपरि- ज्ञानेन गर्विताः१, तेषां समयलोपेन, “मादनं तदधः शक्तिः” (नि० षो० १।१११) इत्याद्यागमशास्त्रविहितसकलमन्त्राक्षरसंकेतपरिज्ञानाद्युच्चारणादिक्रमलोपेन विकु- र्वन्ति मरीचयः सर्वपीठनिवासिन्यः सर्वगाश्चिन्मरीचयः । भैरव्यो २भरिताकारा रक्षन्तु कुलमातरः ॥ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ब्राह्म्याद्या डाकिन्याद्यास्त्वगादिधातुदेवताः, विकुर्वन्ति विकारं जनयन्ति, स्वस्वधातूद्रैकरूपविकारजननेन तेषां देहं नाश- यन्तीत्यर्थः ॥८१॥ शंका होती है कि गुरु-परम्परा के बिना भी पुस्तक को पढ़कर शब्दों की व्युत्पत्ति के आधार पर कुछ न कुछ जानकारी मिल ही सकती हैं, अब इसका समाधान देते हैं— जो व्यक्ति गुरु-परम्परा से विहीन हैं और जिनको अपने ज्ञान पर गर्व है, परम्परा का लोप करनेवाले ऐसे व्यक्तियों को योगिनियां विद्रूप बना देती हैं ॥८१॥ जिनको गुरु-परम्परा से कौलाचार का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, तो पुस्तक को पढ़ने से उपजे ज्ञान से उनको किसी प्रकार की सिद्धि नहीं मिल सकती। जो परम्परा से विहीन (रहित) हैं, शब्दों की व्युत्पत्ति के सहारे थोड़ा बहुत जान कर जो अहंकारी बन गये हैं, ऐसे व्यक्ति समय का लोप करने वाले हैं। नित्याषोडशिकार्णव आदि शास्त्रों में निर्दिष्ट मूलविद्या के अक्षर-संकेत और उच्चारण आदि की गुरु-परम्परा से प्राप्त होने वाली पद्धति को न जानने के कारण ये प्रत्यवाय के भागी होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को मरीचियाँ कष्ट पहुँचाती हैं। इसीलिये किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इन मरीचियों की इस तरह से स्तुति की है— सभी पीठों में निवास करने वाली, सर्वत्र यथेच्छ विचरण करने वाली, चिच्छक्ति की मरीचियाँ (किरणें) ही, परिपूर्ण स्वभाववाली भैरवियाँ हैं, कुलदेवियाँ हैं। ये हमारी रक्षा करें ॥ तदनुसार ब्राह्मी आदि और त्वचा आदि धातुओं की अधिपति देवता डाकिनी आदि, जो मरीचियों के नाम से जानी जाती हैं, अपने अपने नियन्त्रण में विद्यमान १. ताः समयः संकेत:, मादनं—ख. ने. ज. उ. । २. भाविताकाराः—ख. ने. ज,

२१४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु कस्मिन् दिने कस्मिन्नक्षत्रे कस्मिन् १वासरे कौलाचारक्रमेण योगिनी- मेलनं कार्यमित्यत आह— यस्तु दिव्यरसास्वादमोदमानविमर्शनः । देवतातिथिनक्षत्रे२ वारेऽपि च विवस्वतः ॥८२॥ मरीचीन् प्रीणयत्येव मंदिरानन्दँघूर्णितः । सर्वदा च विशेषेण यस्तु कौलाचारपरो योगी दिव्यरसास्वादमोदमानविमर्शनः, दिवि परव्योम्नि भवतीति दिव्यः परशिवः, तेन रसः सामरस्यम्, तस्यास्वादोऽनुभवः, तेन मोदमानं विमर्शनं मनोवृत्तिर्यस्य सः। प्रथमं परशिवैक्यपरामर्शपरिस्फुरदकृत्रिमा- नन्दकेवलः पश्चान्मदिरानन्दघूर्णितो वक्ष्यमाणा(३।९८-१०३)र्घ्यशुद्धिं विधाय ५परामृतभूतया मदिरया सम्पादितानन्दो योगी। देवतातिथिनक्षत्रे, चतुर्दश्यष्टम्यौ देवतातिथी, पुष्यनक्षत्रं देवतानक्षत्रम् । अत्रैव वक्ष्यति— धातुओं में विषमता पैदा करके ऐसे समयलोप करनेवाले व्यक्तियों के शरीर को रुग्ण बना कर नष्ट कर देती हैं ॥८१॥ किस दिन, किस नक्षत्र और किस वार में कौलाचार के क्रम से योगिनीमेलन करना चाहिये, इसी विषय को अब बताते हैं— कौलाचार का पालन करने वाले योगी का मन जब परम शिव के सामरस्य का आस्वादन कर आनन्दित हो उठता है, तब वह मदिरा का सेवन कर इस आनन्द को और भी उभारता है। इस अवस्था में योगी देवतातिथि और नक्षत्र में रविवार के दिन तो मरीचियों (योगिनियों) को विशेष रूप से अवश्य ही तृप्त करता है ॥८२-८३॥ जो कौलाचारपरायण योगी परम शिव के सामरस्य से उत्पन्न आनन्द का अनुभव कर प्रसन्नता से भर जाता है, वह पहले परम शिव के साथ एकता का अनुभव कर अकृ- त्रिम (स्वाभाविक) आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। बाद में यह योगी आगे (३।९८- १०३) बताई गई विधि से अर्घ्य की शुद्धि करके परम अमृतमय उस सुधा का सेवन कर कृत्रिम आनन्द से भी अपने को परिपूर्ण कर लेता है। ऐसी अवस्था में वह योगी देवता- तिथि (चतुर्दशी और अष्टमी) तथा देवतानक्षत्र (पुष्य) में मरीचियों को अवश्य ही तृप्त करता है। देवतानक्षत्र से पुष्य नक्षत्र का ग्रहण इसी ग्रन्थ में आगे (३।१९१- १९२) किया गया है। वहाँ बताया गया है— १. वारे-ख. ग. घ. उ., योगे-ने. । २. श्रवारे-छ. ज. झ. उ. । ३. कारणा-ज. झ., सुधया-छ. । ४. मद-ने. ड. च. छ. । ५. परामृतरूपया तया-ख. ग. घ.

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१५ 'पुष्यभेन तु वारे च सौरे च परमेश्वरि ॥ गुरोर्दिने स्वनक्षत्रे चतुर्दश्यष्टमीषु च । चक्रपूजां विशेषेण योगिनीनां समाचरेत् ॥ (३।१९१-१९२) इति । मरीचीन् प्रीणयत्येव²। एवकारोऽयोगव्यवच्छेदपरः। उक्तकालेषु सर्वदा योगिनी- प्रीणनं कुर्यात्, अन्यथा प्रत्यवायो भवेदित्यर्थः । कालविशेषकथनं नैमित्तिकविशेष³- पूजाद्योतनार्थम् । सर्वदा प्रत्यहं च मरीचीप्रीणनं कुर्यादेव, एवकारेणाप्यन्वयः । नित्यार्चनाकरणे प्रत्यवायोऽस्तीति तात्पर्यम्, “नित्यार्चनायां लुप्तायां सासनां सावृति क्रमात्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोकरीत्या प्रायश्चित्तस्य कर्तव्य⁴त्वात् ॥८२-८३॥ अकरणे प्रत्यवाय एव भवति, करणे तु फलमस्तीत्याह— लभते पूर्णबोधैताम् ॥८३॥ हे परमेश्वरि ! पुष्य नक्षत्र से युक्त रविवार के दिन, गुरु की जन्म और मृत्यु तिथि पर, अपने जन्म दिन पर, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि पर योगिनियों की प्रसन्नता के लिये चक्रपूजा अवश्य करे ॥ एव शब्द का अभिप्राय यह है कि ऐसा अवश्य करे, ऊपर बताये गये तिथि, नक्षत्र, वार आदि के उपस्थित होने पर सदा योगिनियों को तृप्त करे । ऐसा न करने पर साधक प्रायश्चित्त का भागी होगा । यहाँ विशेष काल की सूचना नैमित्तिक पूजा की द्योतक है । सामान्य रूप से नित्य क्रिया के रूप में तो योगिनियों की तृप्ति सदा करनी है । एव (ही) शब्द यहाँ अपि (भी) के अर्थ में मानना चाहिये । नित्य पूजा न करने पर व्यक्ति प्रायश्चित्त का भागी होता है। स्वच्छन्दसंग्रह के अनुसार “नित्यार्चन का लोप होने पर आसन देवताओं और आवरण देवताओं के साथ परा भगवती की क्रमशः अर्चा (पूजन) होनी चाहिये”। नित्यार्चन के न करने पर इस तरह से उसको प्रायश्चित्त करना पड़ता है । इससे यह अभिप्राय निकलता है कि नित्यार्चन तो प्रतिदिन करना ही है, उक्त विशेष तिथियों में नैमित्तिक पूजा भी साधक को अवश्य करनी चाहिये ॥८२-८३॥ यह बता दिया गया है कि न करने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है और अब करने से फल की प्राप्ति होती है, इस विषय को बताते हैं— नित्य और नैमित्तिक पूजा करने वाला साधक पूर्णबोधता को प्राप्त कर लेता है ॥८३॥ १. नित्यं पुष्यदिने वारे सौरे च-ख. ज. झ. ड. । २. इतः परम्-‘मरीचीनुबतरूपां- श्चिन्मरीचीन् प्रीणयत्येव तर्पयत्येव’ इत्याधिकः पाठः-झ. ३. ‘विशेष’ नास्ति-ख. नै. ४. व्यवच्छिन्नात्-ख. नै. ज. झ. ड. । ५. ष्टनम्-ख. नै. च. छ. ज. झ. ।

२१६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः “यत्र निर्विषयबोधलक्षणः स्वात्मशम्भुरवतिष्ठतेऽनिशम्” (चि० १०) इत्यस्मदुक्तरीत्या निरावरणचिद्रूपस्वात्मशम्भुत्वं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥८३॥ ननु पूर्णबोधभावः केन वा कियता कालेन कैर्वा सम्प्राप्यत इत्यत आह— एवंभावस्तु देवेशि देशिकेन्द्रप्रसादतः । महाज्ञानमयो देवि सद्यः सम्प्राप्यते नरैः ॥८४॥ एवंभावः पूर्णबोधत्वम् । देशिकेन्द्रप्रसादतः, यस्य करुणाकटाक्षपातमात्रेण पाशजालं छिद्यते, स परमशिवः केवलो देशिकेन्द्रः, तत्प्रसादतः स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति १भावुकः ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या तत्पादग्रहणेन, महाज्ञानमयो निरावरणचिन्मयः । नरैः२ “कौलाचारपरैः” (१७८) इत्यादिपूर्वोक्तविशेषणविशेषितैः । सद्यः देशिकेन्द्र- प्रसादसमवाप्तिसमय एव सम्प्राप्यते ॥८४॥ व्याख्याकार ने अपने चिद्विलास स्तव में पूर्णबोधता की व्याख्या इस तरह से की है—“इस स्थिति में बिना किसी विषय की सहायता के स्वप्रकाशमय बोध(ज्ञान)- मय स्वात्मस्वरूप शिव निरन्तर स्फुरित होता रहता है”। इस उक्ति के अनुसार नित्य और नैमित्तिक पूजा करने वाला साधक निरावरण चित्स्वरूप स्वात्मा की परम शिव से अभिन्नता को, उसकी पूर्णबोधस्वरूपता को पहचान लेता है ॥६३॥ अब प्रश्न होता है कि यह पूर्णता का बोध कौन, कितने समय में, किनकी सहायता से प्राप्त कर सकता है ? इसका उत्तर देते हैं— हे देवेशि ! इस पूर्ण बोधभाव की प्रतीति गुरुकृपा से होती है। हे देवि ! इस चिन्मय बोध की प्रतीति सद्गुरु की आराधना करने वालों को तत्काल हो जाती है ॥८४॥ एवंभाव का अर्थ है मैं परिपूर्ण बोधस्वरूप हूं । जिसकी कृपादृष्टि के पड़ने मात्र से सारे पाशजाल भिन्न-भिन्न हो जाते हैं, वह परम शिव ही केवल देशिकेन्द्र (सबका गुरु) कहलाता है । उसके प्रसाद (प्रसन्नता) का वर्णन स्वयं व्याख्याकार ने अपने चिद्विलास स्तव के एक श्लोक में किया है, जिसकी व्याख्या हम पहले (२।६८) कर चुके हैं। इस परम गुरु के प्रसाद को ग्रहण कर साधक महाज्ञानमय निर्मल चिन्मय स्वात्मस्वरूप को पहचान लेता है। यह साधक पूर्व निर्दिष्ट (२।७७) 'कौलाचारपर' इत्यादि विशेषताओं से संपन्न होकर तत्काल ही, परम गुरु की कृपादृष्टि के प्रसाद को पाने के साथ ही, उक्त महाज्ञान से सम्पन्न हो जाता है, अपने पूर्ण बोधमय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥८४॥ १. भावकः-ग. ने. उ. भावतः-ज. । २. ‘नरैः’ नास्ति-ख. ने. ज. ङ. उ.

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१७ मन्त्रसंकेतमुपसंहरति— एवमेतत्प्रदं^१ ज्ञानं विद्यार्णगमगोचरम् । देवि गुह्यं प्रियेणैव व्याख्यातं दुर्गि^२ षड्विधम् ॥ सद्यो यस्य प्रबोधेन वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥८५॥ एवम् उक्तप्रकारेण, एतत्प्रदं^३ परिपूर्णबोधलक्षण^४परशिवतत्त्व^५प्रदं ज्ञानम् । ^६विद्यार्णगमगोचरम्, विद्याया अर्णाः^७ पञ्चदश वर्णाः, त एवागमा महार्थबोध- कत्वात्, तद्गोचरं तदर्थतया व्याख्यातम्, "यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत्" (२।१) इत्यारभ्य "एवमेतत्प्रदम्" (२।८५) इत्यन्तश्लोकजालेन । षड्विधं "भावार्थः सम्प्रदायार्थः" (२।१५) इत्यादिना प्रतिपादितषट्प्रकारम् । देवि प्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपे परे । दुर्गि दुर्गे देशिकेन्द्रकटाक्षपातविहीनैर्नाप्यस्वरूपे । सद्यो यस्य प्रबोधेन षड्विधार्थस्य प्रबोधेन । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । इदन्तरिपोरहमि अब मन्त्रसंकेत प्रकरण का उपसंहार करते हैं— इस तरह से परिपूर्ण बोधस्वरूपता को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णों में जिस तरह से प्रतिष्ठित है, हे दुर्गि, हे देवि ! उसकी षड्विध व्याख्या तुम्हारे प्रेम के वशीभूत हो मैंने यहाँ प्रस्तुत की है । इस विषय को ठीक तरह से जान लेने पर साधक वीरों के समूह का स्वामी बन जाता है ॥८५॥ ऊपर बताई गई विधि से परिपूर्ण बोधस्वरूप परम शिव पद को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णरूपी शास्त्र से प्राप्त होता है, क्योंकि श्रीविद्या के अन्तर्गत विद्यमान वर्ण बहुत बड़े रहस्य का ज्ञान कराते हैं। इनकी यहाँ सम्प्रदाय-प्राप्त परम्परा के अनुसार व्याख्या की गई है । इस विषय को इस ग्रन्थ के पूरे द्वितीय मन्त्र- संकेत प्रकरण के प्रथम श्लोक से लेकर अन्तिम श्लोक पर्यन्त देखा जा सकता है। यह अर्थ भावार्थ, सम्प्रदायार्थ आदि के भेद से छः प्रकार का है, इसका निरूपण विस्तार से ऊपर किया जा चुका है। 'देवि' यह प्रकाशविमर्शसामरस्यमयी परा भगवती का संबोधन है। 'दुर्गि' यह उस देवी के संबोधन का विशेषण है। 'दुर्गे' के स्थान पर 'दुर्गि' पद का प्रयोग वैदिक आर्ष पद्धति से किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि बिना गुरुकृपा के इसके स्वरूप को पहचानना कठिन है । इस षड्विध अर्थ का सम्यग् ज्ञान हो जाने पर साधक वीरचक्र का स्वामी हो जाता है। इस आध्यात्मिक युद्ध-क्षेत्र में इदन्ता १. परं-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. तन्वि-ङ., तव-उ. । ३. परं-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लक्षणं-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'तत्त्व' नास्ति-क. । ६. 'विद्यार्णगम- गोचरं' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ७. वर्णाः-सार्वत्रिकः पाठः ।

२१८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः 'समराङ्गणे प्रलयप्रतिपादनपरा वीराः, तेषां चक्रं समूहः, तस्येश्वरः परशिवः। पूर्वोक्तषड्विधार्थविज्ञानसमय एव परशिवो भवेदित्यर्थः ॥८५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीपुण्यानन्दशिष्या- मृतानन्दयोगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदय- दीपिकायां मन्त्रसंकेतो नाम द्वितीयः ॥ रूपी शत्रु का अहन्ता में प्रविलय करने वाले वीर कहलाते हैं। द्वैतदृष्टि को हटाकर अद्वैत में प्रतिष्ठित होने वाले वीरों के समूह का वह स्वामी हो जाता है, स्वयं परम शिव बन जाता है। पूर्वोक्त छः प्रकार के अर्थों को जान लेने पर साधक तत्काल ही अपने परम शिव स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥८५॥ इस तरह श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री पुण्यानन्द के शिष्य अमृतानन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का दूसरा मन्त्रसंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥२॥

पूजासंकेतस्तृतीयः अथ क्रमप्राप्तं पूजासंकेतं वक्तुं प्रतिजानीते— पूजासंकेतमधुना कथयामि तवानघे। स्पष्टम्¹ ॥ श्रोतृजनप्रवृत्तये फलमाह— यस्य प्रबोधमात्रेण जीवन्मुक्तः प्रमोदते ॥१॥ यस्य पूजासंकेतस्य। प्रबोधमात्रेण ²वक्ष्यमाणपरादित्रिविधभेदवतः केवलपरि- ज्ञानेनैव। जीवन्मुक्तः जीवन्नेव मुक्तः सन् शिवोऽहमस्मीति मतिमान्³। प्रमोदते परशिवाहन्तामतिरेव प्रमोदहेतुः ॥१॥ पूजासंकेतमारभते— तव नित्योदिता पूजा त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता। अब क्रमप्राप्त पूजासंकेत प्रकरण का उपक्रम करते हैं— हे अनघे ! अब मैं पूजासंकेत का तुम्हें उपदेश कर रहा हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥ श्रोताओं को प्रवृत्त करने के लिये इस प्रकरण के ज्ञान का क्या फल है ? अब यह बताते हैं— जिसके जानने मात्र से साधक जीवन्मुक्त होकर सदा आनन्द में मग्न रहता है ॥१॥ जिस पूजासंकेत के जानने मात्र से, आगे बताई गई विधि से पर, अपर आदि तीन भेदों वाली पूजाविधि के केवल जान लेने मात्र से, साधक इसी जीवन में मुक्त होकर, 'मैं शिव हूँ' यह भलीभाँति जान कर, सदा आनन्द में लीन रहता है। मैं ही शिव हूँ, इस ज्ञान के उत्पन्न हो जाने से वह सदा आनन्द में डूबा रहता है ॥१॥ अब पूजासंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है— प्रतिदिन जो तुम्हारी पूजा की जाती है, वह तीन प्रकार की होती है ॥ १. स्पष्टमेतत्–ज.। २. 'वक्ष्यमाण'–नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'मतिमान्' नास्ति–क. ख. ग. घ. ङ.

२२० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रकाशात्मनो मम विमर्शशक्तेर्विमर्शरूपिण्यास्तव । नित्योदिता पूजा नित्यं प्रत्यहम् उदिता विहिता १पूजा, त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता ॥ पूजानामान्याह— परा चाप्यरा गौरि तृतीया च परापरा ॥२॥ प्रथमा पूजा परा उत्तमोच्यते । परमशिवाद्वैतप्रथाप्रापकत्वादि२तरपूजाभ्या- मुत्तमत्वम् । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या ३विहिताऽनिशम् । स्वे ४महत्यद्वये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ॥ इति । अपरा द्वितीया पूजा भेदप्रथामात्रसारा बाह्यचक्रावरणार्चनरूपाऽधमा, “न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या ३विहिताऽनिशम्” इति ५पूर्वोक्तवचनात् । तृतीया पूजा परापरा बाह्यस्यान्तरे धाम्न्यद्वये चिल्लयभावनामयी मध्यमा, परापरात्मक- त्वात् ॥२॥ मुझ प्रकाशात्मक शिव की विमर्शरूपिणी शक्ति तुम हो । इस प्रकाशविमर्शात्मक स्वरूप की प्रतिदिन की जाने वाली पूजा तीन तरह से सम्पन्न होती है ॥ इनके नाम ये हैं— हे गौरि ! परा, अपरा इन दो भेदों के अतिरिक्त इसका परापरा नामक तीसरा भेद है ॥२॥ प्रथम पूजा का नाम १परा है । यह सर्वश्रेष्ठ है । परम शिव के साथ अद्वय बोध को जगाने वाली यह पूजा अन्य दो पूजाओं की अपेक्षा उत्कृष्ट है । संकेतपद्धति का कहना है— बाह्य पुष्प आदि द्रव्यों की सहायता से जो दिन-रात पूजा की जाती है, वह वास्तविक पूजा नहीं है । असली पूजा तो वह है, जिससे साधक अपने महान् अद्वय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय ॥ अपरा नाम की दूसरी पूजा केवल भेददृष्टि को बढ़ावा देने वाली है । इसमें केवल बाह्यचक्र की और तदन्तर्गत आवरण देवताओं की पूजा की जाती है । यह अधम कोटि की पूजा है । इसीलिये संकेतपद्धति के अभी उद्धृत वचन में इसको वास्तविक पूजा नहीं माना गया है । तीसरी पूजा परापरा नाम की है । इसमें बाह्य वस्तुओं का आन्तर अद्वय धाम में विलय किया जाता है, आन्तर चितिशक्ति से स्फुरित इस विश्व के १. 'पूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'इतरपूजाभ्यामुत्तमत्वम्' नास्ति-ख. ने. ज. झ उ. । ३. प्रथिता-क. ने. झ. उ. । ४. महिम्रन्य-क. ग. । ५. 'पूर्वोक्त' नास्ति- ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. परा, परापरा और अपरा पूजा की व्याख्या हम शांभव, शाक्त और आणव उपायों के रूप में कर सकते हैं ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२१ तासां लक्षणानि क्रमेणाह— प्रथमाऽद्वैतभावस्था सर्वप्रसरगोचरा । “आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन” (न्या० भा० १।१।४) इति पूर्वोक्त(२।२-४)परिपाट्या सर्वेषामिन्द्रियाणां ये ^२प्रसरा व्यापारास्तेषां गोचरीभूता । कोऽर्थः ? यत्र यत्र मनो याति बाह्ये वाऽभ्यन्तरे प्रिये । तत्र तत्र ^३परावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति ।। (श्लो० ११३) ^४यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते ^५प्रभोः । तस्य तन्मात्र^६धर्मित्वाच्चिल्लयाद् भरिता मतिः ॥ (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या बाह्यस्य चिल्लयलक्षणाऽद्वैतप्रथा परा पूजे- त्यर्थः ॥ समस्त बाह्य पदार्थों का पुनः उस शुद्ध चितिशक्ति में विलय हो रहा है, ऐसी भावना की जाती है। यह पूजा मध्यम है, क्योंकि परा और अपरा दोनों के बीच में है ॥२॥ अब क्रम से इनके लक्षण बताते हैं— इन्द्रियों के समस्त व्यापारों में एकमात्र अद्वय शिवतत्त्व को ही देखना, यह पहली परा पूजा है ॥ “आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय अर्थ से संयुक्त होती हैं” न्यायभाष्य (१।१।४) की इस पूर्व (२।२-४) प्रतिपादित पद्धति के अनुसार सभी इन्द्रियों के व्यापारों में अनुस्यूत रहने वाली अद्वैत प्रथा का ही नाम परा पूजा है। विज्ञानभैरव में बताया गया है— हे प्रिये ! बाह्य अथवा आन्तर विषय में जहाँ जहाँ मन जाता है, सब जगह व्यापक पराशक्ति ही विद्यमान है। उस परावस्था को छोड़ कर मन कहाँ जा सकता है ? उस उस बाह्य अथवा आन्तर विषय के रूप में इन्द्रियों के मार्ग से भगवान् का चिन्मय स्वरूप ही प्रकट होता है, क्योंकि यह सारा विश्व चिन्मात्रसार है। साधक सारे विश्व को जब अपने चिन्मय स्वरूप में विलीन कर लेता है, तो वह परिपूर्ण स्वभाव का हो जाता है ॥ इसका अभिप्राय यह है कि स्वयं आत्मा ही अन्ततः विषयों का स्वरूप धारण करता है, इस विषय को भलीभाँति समझ कर साधक जब सभी बाह्य अथवा आन्तर विषयों में अपने चिन्मय स्वरूप को अभिन्न रूप से देखता है, तो अन्ततः उसकी दृष्टि में ये सभी पदार्थ चित्स्वरूप में विलीन हो जाते हैं, सर्वत्र उसको एकमात्र चिन्मयता का ही बोध होता है। यह अद्वय प्रथा ही इस शास्त्र में परा पूजा कही गई है ॥ १. प्रचर-ख. ग. ने. च. छ. झ. । २. 'प्रसराः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. शिवा-मु. । ४. तत्र तत्र इति सार्वत्रिको दीपिकापा. । ५. विभोः-मु. । ६. रूपत्वा- ख. ग. झ. उ. ।

२२२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः द्वितीया चक्रपूजा च सदा निष्पाद्यते मया ॥३॥ द्वितीया १चक्रपूजा अपरा पूजा, चतुरस्रादिबैन्दवान्तश्रीचक्र२सदनावरणदेवता- र्चनमपरा पूजेत्यर्थः । सदा निष्पाद्यते मया । सदा प्रत्यहम्, मया सर्वज्ञेनापि, निष्पाद्यते क्रियते, ३अभेदप्रतीतिबोधकत्वात् । अभेदप्रतीत्यर्थमपरा पूजा सर्वैरपि ज्ञानिभिः कार्येत्यर्थः । अन्यथाऽद्वैतमित्यप्रसक्तप्रतिषेधः स्यात्, न च तथा युक्तम् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे— लब्धरूपं४ क्वचित् किञ्चित् तादृगेव निषिध्यते । विधानमन्तरेणातो न निषेधस्य संभवः ॥ इति ॥३॥ (ब्र० सि० २।२) चक्रपूजा दूसरी, अपरा नाम की पूजा है। मैं प्रतिदिन इसका अनुष्ठान करता हूँ ॥३॥ दूसरी चक्रपूजा अपरा पूजा कहलाती है। यहाँ चतुरस्र से बैन्दव चक्र पर्यन्त श्रीचक्र रूपी गृह में निवास करने वाले आवरण देवताओं की बाह्य पूजा संपन्न होती है। मेरा जैसा सर्वज्ञ भी इस पूजा का प्रतिदिन अनुष्ठान करता है, क्योंकि इससे साधक धीरे- धीरे अद्वयबोध की तरफ बढ़ता है। सर्वत्र अभेद बुद्धि को जगाने के लिये ज्ञानी जनों को भी सदा इस अपरा पूजा का सहारा लेना चाहिये। अन्यथा 'अद्वैत' पद में निषेधार्थक नञ् शब्द का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा। ऐसा होना नहीं चाहिये, क्योंकि ब्रह्मसिद्धि (२।२) में मण्डन मिश्र कहते हैं— कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में विद्यमान वस्तु का ही निषेध किया जा सकता है। अतः बिना विधि के उसका निषेध नहीं हो सकता ॥ कहने का भाव यह है कि 'अद्वैत' पद में द्वैत का निषेध किया गया है, किन्तु शास्त्र का कहना है कि एकमात्र अद्वय तत्त्व ही वास्तविक है। ऐसी स्थिति में जब अद्वय के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, तब इस पद में विद्यमान नञ् किसका निषेध करेगा ? प्रसक्त का ही प्रतिषेध किया जाता है। जब अद्वय के अतिरिक्त कोई वस्तु उपस्थित ही नहीं है, तो यह तो अप्रसक्त (अनुपस्थित) का प्रतिषेध हुआ, जो शास्त्रकारों की दृष्टि में सही नहीं है। अतः अद्वय तत्त्व के प्रतियोगी द्वैत तत्त्व की प्रतीति कराने के अभिप्राय से ही मानों इस अपरा पूजा का विधान है। अपरा पूजा का अनुष्ठान करने वाला साधक भक्त अपने इष्टदेव की भगवान् के रूप में उपासना करता है। इस तरह से यहाँ उपास्य और उपासक के रूप में भेद दृष्टि ही प्रधान रूप से रहती है और 'अद्वय' शब्द का प्रयोग करने वाला शास्त्र अप्रसक्त प्रतिषेध दोष से मुक्त हो जाता है ॥३॥ १. 'चक्रपूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ड. । २. चक्रपदनिवासावरणदेवतानाम्, अतोऽपरा-ख. ने. ज. झ. ड. । ३. प्रबोधकत्वात्-ख. ज. झ. । ४. रूपे-मु.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२३ परापरापूजामाह— एवं ज्ञानमये देवि तृतीया १स्वप्रथामयी । एवं ज्ञानमये पूर्वोक्ताद्वैतभावनामये धाम्नि स्वप्रथामयी बाह्यस्य पृथगा²त्म- कावरणार्चनरूपस्य कर्मणो ज्ञानमयताविश्रान्तिस्तृतीया परापरा पूजा । तदुक्त- मभियुक्तैः— प्रकाशैकघने धाम्नि विकल्प³प्रसरादिकान् । निक्षिपाम्यर्चनद्वारा वह्नाविव घृताहुतीः ॥ इति ॥ (सु० वा० ३७) पूजाविधानमाह— उत्तमा सा परा ज्ञेया विधानं शृणु साम्प्रतम् ॥४॥ ४उत्तमा सा परा पूजा । परापूजाया उत्तमत्वकथनादितरयोरपरापरापर- पूजयोरधमत्वं मध्यमत्वं ५चोपलक्षयति । सा ज्ञेया ६यथाज्ञानं कार्या । अपरा पूजा अब परापरा पूजा का स्वरूप बताते हैं— प्रकाशमय स्वरूप में अपने बाह्य स्वरूप को समर्पित कर देना ही तीसरी परापरा पूजा है ॥ इस तरह से ज्ञानमय, अर्थात् सर्वत्र अद्वैत भावना का प्रसार करने वाले प्रकाशमय स्वरूप में बाह्य भेदप्रधान, अपने से पृथक् रूप में भासित हो रही, आवरण पूजा रूपी कर्मकाण्ड का ज्ञानकाण्ड में विश्रान्तिलाभ कराने वाली तीसरी पूजा परापरा नाम की है । सुभगोदयवासनाकार मुनि शिवानन्द ने निम्न श्लोक में इसी पूजा का वर्णन किया है— अपने एकमात्र प्रकाशमय स्वरूप में मैं इन जागतिक विषयों के सारे प्रपंच को उसी तरह से डाल दे रहा हूँ, जैसे पवित्र अग्नि में घृत की आहुति दी जाती है ॥ इसका भाव यह है कि परापरा पूजा का उपासक अपने सारे अशुद्ध विकल्पों को अपनी ज्ञानाग्नि की सहायता से निर्मल बोधस्वरूप बना लेता है ॥ अब पूजा की विधि बताते हैं— इन तीनों में परा पूजा उत्तम है । अब तुम उसकी विधि सुनो ॥४॥ परा पूजा को यहाँ उत्तम बताया गया है । इससे अन्य दो अपरा और परापरा पूजा की अधमता और मध्यमता लक्षित होती है । अर्थात् परा पूजा उत्तम, अपरा पूजा १. तु परापरा-क. ग. । २. गावरणा-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. ल्पान् प्रसवादि- ख. ज. झ. उ., ल्पान् पाशवादि-मु. । ४. 'उत्तमा सा परा पूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. च लक्ष्यते-ने. ज. । ६. ज्ञानगम्या परा-क. ग. ने. ज. झ. उ. ।

२७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पश्चाद् वक्ष्यते। अस्या ज्ञेयत्वात् परत्वमत एवोत्तमत्वं चेत्यर्थः। साम्प्रतं ज्ञेयायाः¹ पूजाया विधानं शृणु ॥४॥ विधानमेव विवृणोति— महापद्मवनान्तस्थे वाग्भवे गुरुपादुकाम्। आप्यायितजगद्रूपां परमामृतवर्षिणीम् ॥५,॥ संचिन्त्य महापद्मवनं ब्रह्मरन्ध्राधोमुखसितसहस्रदला²कुलकमलं पद्मदलेराकुलत्वाद् ³वनमिव वनम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अधम और परापरा पूजा मध्यम मानी गई है। परा पूजा¹ का अनुष्ठान अपने ज्ञान के अनुसार किया जाता है। अपरा पूजा का वर्णन आगे करेंगे। परा पूजा का अनुष्ठान उत्कृष्ट कोटि का ज्ञानी ही कर सकता है। इसीलिये इसको उत्कृष्ट माना गया है। अब तुम पहले परा पूजा का विधान सुनो ॥४॥ उस विधि का ही विवरण देते हैं— महापद्मवन के अन्दर विद्यमान वाग्भव (त्रिकोण) में सारे जगत् का विस्तार करने वाली परम उत्कृष्ट अमृत की वर्षा करने वाली गुरुपादुका का ध्यान करना चाहिये ॥५-६॥ ब्रह्मरन्ध्र में अधोमुख श्वेत सहस्रदल अकुल कमल स्थित है। अनेक दलों से आवृत्त होने से यह कमलों के वन (जंगल) जैसा मालूम पड़ता है। स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से यह वर्णित है— १. द्वितीयायाः-ज., अपरायाः-उ.। २. दलं कुल-ख. उ.। ३. वनमिति। तदु-ख. ने. ज. झ. उ.। १. अमृतानन्द ने यहाँ ज्ञेया पद की व्याख्या परा पूजा के विशेषण के रूप में की है, जब कि भास्करराय इसको क्रिया पद मानते हैं। यही पक्ष उचित लगता है। इसी- लिये मूल का हिन्दी अनुवाद हमने तदनुसार ही किया है। दीपिका की पूर्व प्रकाशित पुस्तक तथा उसके अनेक हस्तलेखों में उपलब्ध पाठ का अर्थ यह होता है कि परा पूजा की विधि बाद में बताई जायगी। वस्तुस्थिति यह है कि भास्करराय ही नहीं, स्वयं दीपिकाकार भी आगे आठवें श्लोक की पातनिका में कहते हैं कि यहाँ परा पूजा का स्वरूप बता दिया गया है, अब अपरा पूजा का विधान करते हैं। इसीलिये हमने यहाँ ख. और झ. मातृका के पाठ को मूल में स्थान दिया है और तदनुसार ही ग्रन्थ का अनु- वाद किया है। अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर प्रायः इन्हीं दो हस्तलेखों की सहायता से पूर्व मुद्रित पाठ में संशोधन किया गया है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२५ १यावदूर्ध्वकुलं पद्मं सहस्रारमधोमुखम् । श्वेतं च निष्कला२शक्तिमध्यं चासंख्यशक्तिकम् ॥ व्यापिनी केवला शश्वदमृतौघप्रवर्षिणी । महापद्मवनं चैव समना तस्य चोपरि ॥ तस्यान्तः कर्णिकामध्ये तत्स्थे वाग्भवरूपिणि । इति । पूर्वोक्त (२।६९) रीत्या वाचः परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यो भवन्त्यस्मादिति वाग्भवं त्रिकोणम् । तत्र गुरुपादुकाम्, गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या विश्वगुरोः परमशिवस्य ३पादुकाम्, स्वप्रकाशशिवमूर्त्तिरेकिका तद्विमर्शतनुरेकिका तयोः । सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः ॥ (चि० १) इत्यस्मदुक्तरीत्या त्रिभेदवतीम् । आप्यायितजगद्रूपां शिशिरतरनिजरश्मि- ४निफालनात् प्रसारणादाप्यायितचराचराम् । परामृतवर्षिणीं निरन्तरनिबिड- चिद्रसासारवर्षिणीम् । संचिन्त्य स्वात्मतया ५विमृश्य ॥५-६॥ सबसे ऊपर अकुल पद्म स्थित है । यह अधोमुख सहस्रदल कमल है । यह श्वेत वर्ण का है। इसमें असंख्य शक्तियों का निवास है। इन सबके बीच में निष्कला शक्ति विराजमान है। व्यापिनी कला यहाँ निरन्तर अमृत की वर्षा करती रहती है। यही महापद्मवन ऊर्ध्व सहस्रार कमल है। इसके ऊपर समना स्थित है। इसके ऊपर कर्णिका के मध्य में वाग्भव (त्रिकोण) की स्थिति मानी गई है ॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक वाणियां त्रिकोण से ही उत्पन्न होती हैं, यह पहले (१।३६-४०) बताया जा चुका है। १वाणियों की उत्पत्ति इससे होती है, अतः इसे वाग्भव कहा जाता है । इस त्रिकोण में गुरु की पादुका की भावना करनी चाहिये । ऊपर अनेक स्थलों पर उद्धृत वचन के आधार पर विश्वगुरु परम शिव की पादुका यहाँ अभिप्रेत है । व्याख्याकार के गुरुपादुका के सूचक चिद्विलास स्तव के श्लोक की व्याख्या भी पहले (२।७८) की जा चुकी है। तदनुसार यह पादुका तीन (प्रकाश, विमर्श और इनका सामरस्य) भेदों वाली है । गुरु की कृपादृष्टि की अत्यन्त शीतल रश्मियों से यह सारा चराचर जगत् आप्यायित हो उठता है । इससे निरन्तर ज्ञानामृत की वर्षा १. यावदूर्ध्वं कुलं-ख. ने. ज. झ. उ. । २. सक्त-ख. ने. झ. । ३. 'पादुकाम्' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. 'निफालनात्' नास्ति-ने. ज. । ५. विचिन्त्य-ख. ने. । १. पृ० १९९ की टिप्पणी देखिये । १५

२२६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः गुरुपादुकापरामर्शानन्तरमेव१ प्रसादस्वीकारमाह— परमाद्वैतभावनामदघूर्णितः । परमः परमशिवः, तेनाद्वैतभावना स२ एवाहमस्मीति समावेशरूपा, सैव मद इत्युच्यते, मदहेतुत्वात् । तत्कृतेन मदेन घूर्णितो मुदितः । स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति भावुकः३ ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या परमशिवाद्वैतभावनालक्षणगुरुप्रसादस्वीकार४समुल्लसत्पर- मानन्दपरवश इत्यर्थः ॥६॥ प्रसादस्वीकारानन्तरमान्तरजपमेवाह— दहरान्तरसंसर्पन्नादालोकनतत्परः ॥६॥ विकल्परूपसंजल्पविमुखः होती रहती है। इस पूजा का अनुष्ठान करते समय साधक को सबसे पहले इस गुरु- पादुका का ही ध्यान करना चाहिये ॥५-६॥ गुरुपादुका का स्मरण करने के उपरान्त पूजक को प्रसाद लेना चाहिये— इसके बाद साधक को चाहिये कि वह परम अद्वैतभावना के मद से परिपूर्ण हो जाय ॥ परम शब्द का अर्थ यहाँ परमशिव किया जाता है। परमशिव के साथ अद्वैत भावना का अर्थ है 'वह शिव मैं ही हूँ' इस तरह की शिवमय दृष्टि। यह अद्वैत भावना एक अनोखे मद (नशा) को जन्म देती है। साधक को चाहिये कि वह अपने में अद्वैत भावना को जगाकर इस अनूठे नशे में मस्त हो जाय। इस प्रसाद के ग्रहण की विधि व्याख्याकार के चिद्विलास स्तव में वर्णित है। उसकी व्याख्या हम पहले (२।६८) कर चुके हैं। इस तरह से गुरुपादुका का स्मरण करने के उपरान्त साधक को परमशिव के साथ अद्वैत भावना को स्थिर करने वाले गुरु के प्रसाद को स्वीकार करना चाहिये, जिससे कि उसमें परम आनन्दमय अवस्था का उल्लास भर जाय ॥ गुरु के प्रसाद को स्वीकार करने के उपरान्त साधक को जप करना चाहिये— साधक को चाहिये कि वह दहराकाश के अन्दर ध्वनित हो रहे नाद का सावधानी से श्रवण करे और सारे जागतिक विकल्प जाल से, नाना प्रकार के बाह्य वैखरी वर्णों के उच्चारण से विमुख हो जाय ॥६-७॥ १. नन्तरमान्तरमेव-ख. झ. उ. । २. सोऽहम-झ. । ३. भावकः-ने., ४. समुल्लसत्-ने., क., ख., झ., उ. ।