भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०१ ^१ललाटोर्ध्वं समारभ्य कपालोर्ध्वावसानकम् । ^२त्र्यङ्गुलोर्ध्वं शिरोदेशे परं व्योम प्रकीर्तितम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या परे व्योम्नि यदिन्दुमण्डलं चिच्चन्द्रबिम्बम्, तत्रासक्ता । सुधास्रोतःस्वरूपिणी तद्गलितामृतप्रवाहरूपा । सदा ^३व्याप्त- जगत्कृत्स्ना सदा कालत्रयेऽपि षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं जगत् कृत्स्नं व्याप्तं ययेति शेषः । सदानन्दस्वरूपिणी ^४सदानन्दः परशिवः स्वरूपं यस्याः सा सदानन्दस्वरूपिणी । एषा ^५चिन्मयी कुण्डलिनीशक्तिः ^६स्वात्मेति बुद्धिस्तदात्मतया समावेशो रहस्यार्थ इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— यदोल्लसति शृङ्गाटपीठात् ^७कुण्डलरूपिणी ॥ शिवार्कमण्डलं भित्त्वा द्रावयन्तीन्दुमण्डलम् । तदुद्भूवामृतस्यन्दपरमानन्दनन्दिता ॥ कुलयोषित् कुलं त्यक्त्वा परं पुरुषमेति सा । करोड़ों बिजलियों की सी इसकी चकाचौंध रहती है । कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान यह अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाली है । यह व्योमेन्दुमण्डल में आसक्त है, ललाट के ऊर्ध्वभाग से लेकर कपाल के ऊर्ध्व भाग पर्यन्त स्थान को शिरःप्रदेश कहा जाता है । इसमें दो अंगुल ऊँचा स्थान परम व्योम कहा गया है ॥ स्वच्छन्दसंग्रह के इस वचन के प्रमाण पर परम व्योम में जो ज्ञानस्वरूप चन्द्रमण्डल विद्यमान है, इसको प्राप्त करने के लिये वह लालायित रहती है । उसको प्राप्त कर लेने पर वह चन्द्रमण्डल से निकलने वाले अमृत से ओत-प्रोत हो जाती है । यह शक्ति तीनों कालों में छत्तीस तत्त्वमय इस सारे जगत् को व्याप्त कर विराजमान है । यह देवी सदा आनन्द से ओत-प्रोत अपने परम शिवममय स्वरूप में प्रतिष्ठित है । यह चिन्मयी कुण्डलिनी शक्ति मेरी ही आत्मा है, इस प्रकार की बुद्धि, अर्थात् ऊपर वर्णित स्वात्मस्वरूपिणी कुण्डलिनी शक्ति के रूप में स्वात्मस्वरूप का समावेश, एकाग्रता ही यहाँ रहस्यार्थ का स्वरूप है । चतुःशतीशास्त्र में यह इस तरह से वर्णित है— कुण्डलरूपिणी यह कुण्डलिनी शक्ति जब शृंगाट पीठ (त्रिकोण) से उठती है, तब वह मंगलमय रविमण्डल को भेद कर और इन्दुमण्डल को द्रवित करती हुई आगे बढ़ती है । इन्दुमण्डल से उत्पन्न अमृत की वर्षा से वह परम आनन्द में निमग्न हो जाती है । तब यह कुलकुण्डलिनी शक्ति अपने कुल (शक्तिचक्र) को छोड़ कर अकुल नामक पर पुरुष के पास १. द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं-ख. ने. ज. उ. । २. द्वयङ्गु-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. व्याप्तं जगत्कृत्स्नं-झ. उ. । ४. स्वसंविदानन्दस्य भावः सदानन्दः-क. । ५. 'चिन्मयी' नास्ति-क. । ६. स्वात्मशक्ति बुद्धिः स्वात्मेति-ख. ने. ज. । ७. कुटिल-मु. ।