भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 250

२०० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः द्याश्चतुर्विंशतिवर्णाः, सोमकलाभिः षोडशभिर्युक्ता अकारादयः षोडश स्वराः, एव- मेते पञ्चाशद्वर्णा विग्रहो यस्याः सा तथा। विद्या१ सौभाग्यविद्या। "स्वरव्यञ्जन- भेदेन२......षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपिणी" (२।३३) इति पूर्वोक्तरीत्या षट्त्रिंशत्तत्त्वावयव- वत्पञ्चाशदक्षरमयी वैखरीत्मिका ३कुण्डलिनीरूपा तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥ नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा४ । नीवारशूकवत् तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥ (तै० आ० १०।११।११-१२) ५इति श्रुत्युक्तरीत्या भुजङ्गभोगसदृशी ज्योतिर्लता। मण्डलत्रयभेदिनी, मण्डल- त्रयं६ मूलहृदयभ्रूमध्यस्थितानां वह्निसूर्यसोममण्डलानां त्रयम्, तद्भेदिनी। मण्डल- त्रयं भित्त्वा तन्मध्यमार्गेणाकुलं प्रवेष्टुमुद्यतेत्यर्थः। तडित्कोटिनिभप्रख्या तडि- त्कोटीनां निभा सदृशी प्रख्या कान्तिर्यस्याः सा। बिसतन्तुनिभाकृतिः बिसतन्तुवत् सूक्ष्मरूपा। व्योमेन्दुमण्डलासक्ता से संबद्ध हैं, सूर्य की बारह कलाओं से क्रम से कादि बारह वर्ण और उत्क्रम (विपरीत क्रम) से १भादि बारह वर्ण और सोम की सोलह कलाओं से अकारादि सोलह स्वर संयुक्त हैं। इस तरह से अड़तीस कलामय पचास वर्णों से इस सौभाग्यविद्या का स्वरूप बनता है। पहले (२।३३) विद्यागत स्वर और व्यंजन के भेद से छत्तीस तत्त्वों के अवयव वाली विद्या का निरूपण किया गया है। वही विद्या पचास वैखरी वर्णों वाली कुल- कुण्डलिनी कहलाती है। समस्त शरीर में व्याप्त उस अग्नि के बीच में से सुषुम्ना नाडी के सहारे ऊपर उठती हुई अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली एक ज्वाला (कुण्डलिनी) ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त व्याप्त हो जाती है। वर्षा ऋतु के काले बादलों के बीच में चमकने वाली बिजली की सी इसकी चकाचौंध होती है। नीवार शूक [जौ की बाल] के समान सूक्ष्म आकृति वाली यह ज्वाला (कुण्डलिनी शक्ति) अत्यन्त सूक्ष्म और चमकीले पीले वर्ण की होती है॥ इस तैत्तिरीय आरण्यक श्रुति में इसी का वर्णन किया गया है। इसका आकार सांप के फण के समान होता है। यह ज्योतिर्लता मूलाधार, हृदय और भ्रूमध्य में स्थित वह्नि सूर्य और सोम नामक तीनों मण्डलों का भेदन करने वाली है। इन तीनों मण्डलों को भेद कर वह सुषुम्ना के मध्य मार्ग से अकुल कमल में प्रवेश पाने को उद्यत रहती है। १. 'विद्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. सम्पूर्णः श्लोकः-क. ग.। ३. कुलकुण्ड- ख. ग. ज. झ. उ. । ४. भासुरा-ने. ज.। ५. इत्यस्मदुक्त-ख. ग. ने. ज. झ. उ., इत्युपनिषदुक्त-ब.। ६. त्रयमाधार-ख. ने. ज. झ. उ. । I. यहाँ भी मकार का समावेश कहीं नहीं किया गया है। इसके लिये पृ० २६ की टिप्पणी देखिये।