भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 249

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९९ तडित्कोटिनिभप्रख्या बिसतन्तुनिभाकृतिः । व्योमेन्दुमण्डलासक्ता सुधास्रोतःस्वरूपिणी ॥७१॥ सदा व्याप्त¹जगत्कृत्स्ना सदानन्दस्वरूपिणी । एषा स्वात्मेति बुद्धिस्तु रहस्यार्थो महेश्वरि ॥७२॥ मूलाधारे पूर्वोक्त(१।२५)लक्षणे, तडिद्रूपे ²विद्युद्वर्णे, वाग्भवाकारतां गते, वाचः परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यः, ताभिर्वाग्भिर्भवतीति वाग्भवं त्रिकोणम्, तदुक्त- मत्रैव—"आत्मनः स्फुरणम्" (१।३६) इत्यादिना "क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा"(१।४०)इत्यन्तेन। तदाकारतां गते तद्रूपेण परिणते। अष्टात्रिंशत्कलाः, वह्नेर्धूम्मार्चिराद्या दश, सूर्यस्य तपिन्याद्या द्वादश, सोमस्यामृताद्याः षोडश, एव- मेता अष्टात्रिंशत्कलाः, ³ताभिर्युक्तैः पञ्चाशद्वर्णैरकारादिक्षकारान्तैः, वह्नि- कलाभिर्दशभिर्युक्ता यादयो दश वर्णाः, सूर्यकलाभिर्द्वादशभिर्युक्ताः क्रमोत्क्रमकभा- अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली यह कुण्डलिनी शक्ति जब शून्यगगन में चन्द्रमण्डल से संयुक्त होती है, तो अमृतरस बरसने लगता है। सदा आनन्दस्वरूपिणी यह शक्ति अपने इस अमृतरस से सारे संसार को आप्यायित किये रहती है। यह शक्ति स्वयं मेरी ही आत्मा है, ऐसी बुद्धि ही रहस्यार्थ के नाम से यहाँ बताई गई है ।६९-७२। मूलाधार का स्वरूप पहले (१।२५) बताया जा चुका है। बिजली के समान कान्ति वाला यह मूलाधार यहाँ वाग्भव (त्रिकोण) के आकार में परिणत हो गया है। ¹परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी वाणियों से जो उत्पन्न होता है, उसे वाग्भव कहते हैं। यह वाग्भव त्रिकोण है। त्रिकोण की उत्पत्ति उक्त वाणियों से होती है, इस विषय का वर्णन पहले (१।३६-४०) किया जा चुका है। यहाँ बताया गया है कि मूलाधार ही वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत हो जाता है। वह्नि की धूम्नार्चि आदि दस, सूर्य की तपिनी आदि बारह और सोम की अमृता आदि सोलह कलाएँ मिलकर कुल ²अड़तीस कलाएँ होती हैं। पचास वर्ण इन कलाओं से इस तरह से संबद्ध है—यादि दस वर्ण वह्नि की दस कलाओं १. व्याप्तं जगत्कृत्स्नं-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. विद्युत्सस्वर्णवर्णे-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. ताभिर्युक्ताः पञ्चाशद्वर्णाः-क. ग. झ. । १. आगे (३।५) भी वाग्भव पद की व्याख्या दी गई है। वहाँ वाग्भव से परा प्रभृति वाणियों की उत्पत्ति बताई गई है। वाग्भव पद में तत्पुरुष और बहुव्रीहि समास मान कर दोने ही अर्थ किये जा सकते हैं, क्योंकि बिन्दु और त्रिकोण की अलग अलग रेखाओं से परा प्रभृति वाणियों की उत्पत्ति मानी जाती है और त्रिकोण की परिपूर्णता इसकी अलग अलग रेखाओं से वाणियों की उत्पत्ति के उपरान्त ही होती है। २. पृष्ठ ९४ की टिप्पणी देखिये।