भारतकोश
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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९९ तडित्कोटिनिभप्रख्या बिसतन्तुनिभाकृतिः । व्योमेन्दुमण्डलासक्ता सुधास्रोतःस्वरूपिणी ॥७१॥ सदा व्याप्त¹जगत्कृत्स्ना सदानन्दस्वरूपिणी । एषा स्वात्मेति बुद्धिस्तु रहस्यार्थो महेश्वरि ॥७२॥ मूलाधारे पूर्वोक्त(१।२५)लक्षणे, तडिद्रूपे ²विद्युद्वर्णे, वाग्भवाकारतां गते, वाचः परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यः, ताभिर्वाग्भिर्भवतीति वाग्भवं त्रिकोणम्, तदुक्त- मत्रैव—"आत्मनः स्फुरणम्" (१।३६) इत्यादिना "क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा"(१।४०)इत्यन्तेन। तदाकारतां गते तद्रूपेण परिणते। अष्टात्रिंशत्कलाः, वह्नेर्धूम्मार्चिराद्या दश, सूर्यस्य तपिन्याद्या द्वादश, सोमस्यामृताद्याः षोडश, एव- मेता अष्टात्रिंशत्कलाः, ³ताभिर्युक्तैः पञ्चाशद्वर्णैरकारादिक्षकारान्तैः, वह्नि- कलाभिर्दशभिर्युक्ता यादयो दश वर्णाः, सूर्यकलाभिर्द्वादशभिर्युक्ताः क्रमोत्क्रमकभा- अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली यह कुण्डलिनी शक्ति जब शून्यगगन में चन्द्रमण्डल से संयुक्त होती है, तो अमृतरस बरसने लगता है। सदा आनन्दस्वरूपिणी यह शक्ति अपने इस अमृतरस से सारे संसार को आप्यायित किये रहती है। यह शक्ति स्वयं मेरी ही आत्मा है, ऐसी बुद्धि ही रहस्यार्थ के नाम से यहाँ बताई गई है ।६९-७२। मूलाधार का स्वरूप पहले (१।२५) बताया जा चुका है। बिजली के समान कान्ति वाला यह मूलाधार यहाँ वाग्भव (त्रिकोण) के आकार में परिणत हो गया है। ¹परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी वाणियों से जो उत्पन्न होता है, उसे वाग्भव कहते हैं। यह वाग्भव त्रिकोण है। त्रिकोण की उत्पत्ति उक्त वाणियों से होती है, इस विषय का वर्णन पहले (१।३६-४०) किया जा चुका है। यहाँ बताया गया है कि मूलाधार ही वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत हो जाता है। वह्नि की धूम्नार्चि आदि दस, सूर्य की तपिनी आदि बारह और सोम की अमृता आदि सोलह कलाएँ मिलकर कुल ²अड़तीस कलाएँ होती हैं। पचास वर्ण इन कलाओं से इस तरह से संबद्ध है—यादि दस वर्ण वह्नि की दस कलाओं १. व्याप्तं जगत्कृत्स्नं-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. विद्युत्सस्वर्णवर्णे-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. ताभिर्युक्ताः पञ्चाशद्वर्णाः-क. ग. झ. । १. आगे (३।५) भी वाग्भव पद की व्याख्या दी गई है। वहाँ वाग्भव से परा प्रभृति वाणियों की उत्पत्ति बताई गई है। वाग्भव पद में तत्पुरुष और बहुव्रीहि समास मान कर दोने ही अर्थ किये जा सकते हैं, क्योंकि बिन्दु और त्रिकोण की अलग अलग रेखाओं से परा प्रभृति वाणियों की उत्पत्ति मानी जाती है और त्रिकोण की परिपूर्णता इसकी अलग अलग रेखाओं से वाणियों की उत्पत्ति के उपरान्त ही होती है। २. पृष्ठ ९४ की टिप्पणी देखिये।

२०० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः द्याश्चतुर्विंशतिवर्णाः, सोमकलाभिः षोडशभिर्युक्ता अकारादयः षोडश स्वराः, एव- मेते पञ्चाशद्वर्णा विग्रहो यस्याः सा तथा। विद्या१ सौभाग्यविद्या। "स्वरव्यञ्जन- भेदेन२......षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपिणी" (२।३३) इति पूर्वोक्तरीत्या षट्त्रिंशत्तत्त्वावयव- वत्पञ्चाशदक्षरमयी वैखरीत्मिका ३कुण्डलिनीरूपा तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥ नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा४ । नीवारशूकवत् तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥ (तै० आ० १०।११।११-१२) ५इति श्रुत्युक्तरीत्या भुजङ्गभोगसदृशी ज्योतिर्लता। मण्डलत्रयभेदिनी, मण्डल- त्रयं६ मूलहृदयभ्रूमध्यस्थितानां वह्निसूर्यसोममण्डलानां त्रयम्, तद्भेदिनी। मण्डल- त्रयं भित्त्वा तन्मध्यमार्गेणाकुलं प्रवेष्टुमुद्यतेत्यर्थः। तडित्कोटिनिभप्रख्या तडि- त्कोटीनां निभा सदृशी प्रख्या कान्तिर्यस्याः सा। बिसतन्तुनिभाकृतिः बिसतन्तुवत् सूक्ष्मरूपा। व्योमेन्दुमण्डलासक्ता से संबद्ध हैं, सूर्य की बारह कलाओं से क्रम से कादि बारह वर्ण और उत्क्रम (विपरीत क्रम) से १भादि बारह वर्ण और सोम की सोलह कलाओं से अकारादि सोलह स्वर संयुक्त हैं। इस तरह से अड़तीस कलामय पचास वर्णों से इस सौभाग्यविद्या का स्वरूप बनता है। पहले (२।३३) विद्यागत स्वर और व्यंजन के भेद से छत्तीस तत्त्वों के अवयव वाली विद्या का निरूपण किया गया है। वही विद्या पचास वैखरी वर्णों वाली कुल- कुण्डलिनी कहलाती है। समस्त शरीर में व्याप्त उस अग्नि के बीच में से सुषुम्ना नाडी के सहारे ऊपर उठती हुई अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली एक ज्वाला (कुण्डलिनी) ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त व्याप्त हो जाती है। वर्षा ऋतु के काले बादलों के बीच में चमकने वाली बिजली की सी इसकी चकाचौंध होती है। नीवार शूक [जौ की बाल] के समान सूक्ष्म आकृति वाली यह ज्वाला (कुण्डलिनी शक्ति) अत्यन्त सूक्ष्म और चमकीले पीले वर्ण की होती है॥ इस तैत्तिरीय आरण्यक श्रुति में इसी का वर्णन किया गया है। इसका आकार सांप के फण के समान होता है। यह ज्योतिर्लता मूलाधार, हृदय और भ्रूमध्य में स्थित वह्नि सूर्य और सोम नामक तीनों मण्डलों का भेदन करने वाली है। इन तीनों मण्डलों को भेद कर वह सुषुम्ना के मध्य मार्ग से अकुल कमल में प्रवेश पाने को उद्यत रहती है। १. 'विद्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. सम्पूर्णः श्लोकः-क. ग.। ३. कुलकुण्ड- ख. ग. ज. झ. उ. । ४. भासुरा-ने. ज.। ५. इत्यस्मदुक्त-ख. ग. ने. ज. झ. उ., इत्युपनिषदुक्त-ब.। ६. त्रयमाधार-ख. ने. ज. झ. उ. । I. यहाँ भी मकार का समावेश कहीं नहीं किया गया है। इसके लिये पृ० २६ की टिप्पणी देखिये।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०१ ^१ललाटोर्ध्वं समारभ्य कपालोर्ध्वावसानकम् । ^२त्र्यङ्गुलोर्ध्वं शिरोदेशे परं व्योम प्रकीर्तितम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या परे व्योम्नि यदिन्दुमण्डलं चिच्चन्द्रबिम्बम्, तत्रासक्ता । सुधास्रोतःस्वरूपिणी तद्गलितामृतप्रवाहरूपा । सदा ^३व्याप्त- जगत्कृत्स्ना सदा कालत्रयेऽपि षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं जगत् कृत्स्नं व्याप्तं ययेति शेषः । सदानन्दस्वरूपिणी ^४सदानन्दः परशिवः स्वरूपं यस्याः सा सदानन्दस्वरूपिणी । एषा ^५चिन्मयी कुण्डलिनीशक्तिः ^६स्वात्मेति बुद्धिस्तदात्मतया समावेशो रहस्यार्थ इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— यदोल्लसति शृङ्गाटपीठात् ^७कुण्डलरूपिणी ॥ शिवार्कमण्डलं भित्त्वा द्रावयन्तीन्दुमण्डलम् । तदुद्भूवामृतस्यन्दपरमानन्दनन्दिता ॥ कुलयोषित् कुलं त्यक्त्वा परं पुरुषमेति सा । करोड़ों बिजलियों की सी इसकी चकाचौंध रहती है । कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान यह अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाली है । यह व्योमेन्दुमण्डल में आसक्त है, ललाट के ऊर्ध्वभाग से लेकर कपाल के ऊर्ध्व भाग पर्यन्त स्थान को शिरःप्रदेश कहा जाता है । इसमें दो अंगुल ऊँचा स्थान परम व्योम कहा गया है ॥ स्वच्छन्दसंग्रह के इस वचन के प्रमाण पर परम व्योम में जो ज्ञानस्वरूप चन्द्रमण्डल विद्यमान है, इसको प्राप्त करने के लिये वह लालायित रहती है । उसको प्राप्त कर लेने पर वह चन्द्रमण्डल से निकलने वाले अमृत से ओत-प्रोत हो जाती है । यह शक्ति तीनों कालों में छत्तीस तत्त्वमय इस सारे जगत् को व्याप्त कर विराजमान है । यह देवी सदा आनन्द से ओत-प्रोत अपने परम शिवममय स्वरूप में प्रतिष्ठित है । यह चिन्मयी कुण्डलिनी शक्ति मेरी ही आत्मा है, इस प्रकार की बुद्धि, अर्थात् ऊपर वर्णित स्वात्मस्वरूपिणी कुण्डलिनी शक्ति के रूप में स्वात्मस्वरूप का समावेश, एकाग्रता ही यहाँ रहस्यार्थ का स्वरूप है । चतुःशतीशास्त्र में यह इस तरह से वर्णित है— कुण्डलरूपिणी यह कुण्डलिनी शक्ति जब शृंगाट पीठ (त्रिकोण) से उठती है, तब वह मंगलमय रविमण्डल को भेद कर और इन्दुमण्डल को द्रवित करती हुई आगे बढ़ती है । इन्दुमण्डल से उत्पन्न अमृत की वर्षा से वह परम आनन्द में निमग्न हो जाती है । तब यह कुलकुण्डलिनी शक्ति अपने कुल (शक्तिचक्र) को छोड़ कर अकुल नामक पर पुरुष के पास १. द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं-ख. ने. ज. उ. । २. द्वयङ्गु-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. व्याप्तं जगत्कृत्स्नं-झ. उ. । ४. स्वसंविदानन्दस्य भावः सदानन्दः-क. । ५. 'चिन्मयी' नास्ति-क. । ६. स्वात्मशक्ति बुद्धिः स्वात्मेति-ख. ने. ज. । ७. कुटिल-मु. ।

२०२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः निर्लक्षणं निर्गुणं च कुलरूपविवर्जितम् ॥ ततः स्वच्छन्दरूपा ^१तु परिगृह्य जगत्पतिम् । तेन ^२मार्गेण सन्तुष्टा पुनरेकाकिनी सती ॥ रमते ^३स्वयमव्यक्ता त्रिपुरा व्यक्तिमागता । इति ॥६९-७२॥ (नि० षो० ४।१२-१६) अथ क्रमप्राप्तं महातत्त्वार्थं वक्तुं प्रतिजानीते-- महातत्त्वार्थ इति यत् तच्च देवि वदामि ते । ^४स्पष्टम् ॥७३॥ महातत्त्वार्थमेवाह— निष्कले परमे सूक्ष्मे ^५निर्लक्ष्ये भाववर्जिते ॥७३॥ व्योमातीते परे तत्त्वे प्रकाशानन्दविग्रहे । विश्वोत्तीर्णे विश्वमये तत्त्वे स्वात्मनि योजनम् ॥७४॥ निष्कले निरवयवे, कला अवयवाः । परमे महद्भ्योऽपि महीयसि । सूक्ष्मे अणोरप्यणीयसि । निर्लक्ष्ये करणेन्द्रियाद्यगोचरे । ^६भाववर्जिते ^७‘भावनागम- पहुँच जाती है। यह पर पुरुष सभी गुणों और धर्मों से रहित है, कुल और रूप से भी यह शून्य है। उसको पाकर वह शक्ति स्वेच्छाचारिणी हो जाती है, उस जगत्पति के साथ समरस हो जाती है। इस अवस्था से सन्तुष्ट होकर वह पुनः अकेली हो जाती है। इस तरह से यह अव्यक्त स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा व्यक्त होकर नाना प्रकार की क्रीडा करती है ॥६९-७२॥ अब क्रमप्राप्त ^१महातत्त्वार्थ का वर्णन करते हैं— हे देवि ! यह जो महातत्त्वार्थ है, अब उसे मैं तुम्हें समझा रहा हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७३॥ उसी को समझा रहे हैं— निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप, विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर देने का ही नाम महातत्त्वार्थ है ॥७३-७४॥ कला अवयवों को कहते हैं। यह परम तत्त्व निष्कल है, निरवयव है। यह परम है, महान् से भी महान् है । सूक्ष्म है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। अन्तःकरण, बहिरिन्द्रिय आदि १. तद्विभ्राम्य जगत्प्रभुम्-क. ग., परिभ्रम्य जगत्पुनः-मृ.। २. चारेण-मृ. । ३. सेय- क. ग. झ. । ४. स्पष्टमेतत्-ज. । ५. निर्मले-झ. । ६. ‘भाववर्जिते’ नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ७. कल्पनातिग-मृ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०३ मतीन्द्रियं च यल्लक्ष्यमुक्तम्"१ (श्लो० १६) इति चिद्गगनचन्द्रिकोक्तरीत्या भावना- गम्ये । व्योमातीते व्योम पूर्वोक्त(२।७१)लक्षणं तदतीते । परे तत्त्वे २सकलतत्त्वा- तीते परमार्थे । प्रकाशानन्दविग्रहे, प्रकाशो ज्योतिषां ज्योतिरनुत्तरम्, आनन्दः सकलवैषयिकानन्दसमष्टिभूतः परमानन्दः, तौ प्रकाशानन्दौ विग्रहो यस्य, तस्मिन् । विश्वोत्तीर्णे विमुक्तसकलजगदुत्तीर्णे । विश्वमये देशकालपदार्थात्म यद्यद्वस्तु यथा तथा३ । तत्तद्रूपेण या भाति तां श्रये ४सांविदीं कलाम् ॥ (सौ० हृ० ४) इति प्रामाणिकोक्तवचनरीत्या तत्तदात्मनाऽवभासमाने, तत्त्वे "तत्त्वमसि" (छा० उ० ३।८।७) इत्युपनिषद्वक्य५परमार्थ६परविद्याप्रदायकपरशिवरूपे निजगुरु- प्रबोधितनिर्मलस्वभावे स्वात्मनि योजनं तदेकतानुप्रवेशा महातत्त्वार्थ इत्यर्थः ॥७३-७४॥ का विषय न होने से यह निर्लक्ष्य है, किसी को दिखाई नहीं पड़ता । यह भाववर्जित है, सभी प्रकार के स्वभावों से शून्य होने से केवल भावना के सहारे ही यहाँ पहुँचा जा सकता है। चिद्गगनचन्द्रिका में बताया गया है—"यह अतीन्द्रिय तत्त्व केवल भावना के द्वारा ही लक्षित हो सकता है" । व्योम (परम व्योम) का स्वरूप अभी (२।७१) बताया गया है । उस परम व्योम पद से भी यह ऊपर है । समस्त तत्त्वों से भी ऊपर है, अतः इसे पर तत्त्व कहते हैं । समस्त तत्त्वों से अतीत यह पर तत्त्व ही परमार्थ है, वास्तविक है । इसका स्वरूप प्रकाश और आनन्दमय है । यह सभी ज्योतियों का प्रकाशक अनुत्तर प्रकाश है और समस्त वैषयिक आनन्दों का समष्टिभूत परमानन्द है । यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व है, विमुक्त अवस्था में यह सारे जगत् से ऊपर उठ जाता है । यह विश्वमय भी है, संसारावस्था में यही तत्त्व विभिन्न रूपों में भासित होता है । शिवानन्द मुनि सौभाग्यहृदय स्तोत्र में कहते हैं— देश, काल और पदार्थ के रूप में जो जो वस्तु जिस किसी रूप में भासित हो रही है, उन सभी रूपों में संवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा ही एकमात्र भासमान है । मैं उसी की शरण में जाता हूँ ॥ इस तरह से विश्व के समस्त पदार्थों में भासमान यह परतत्त्व विश्वमय भी है । इस परम तत्त्व में "वह तुम ही हो" इस तरह के उपनिषद् वाक्यों द्वारा प्रतिपादित पर- मार्थ स्वरूप परविद्या के प्रदायक परम शिव के स्वरूप में, अपने गुरु के द्वारा जगाये गये अपने ही निर्मल स्वभाव में अपने को नियोजित कर देना, अपनी अभेदप्रतीति को निरन्तर जगाये रखना ही महातत्त्वार्थ कहलाता है ॥७३-७४॥ १. मुञ्जति-मु. । २. सकलतत्त्वार्थपर-ख. ने. ज्ञ. झ. उ. । ३. यथा-मु. । ४. संविदं-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. द्वाक्यार्थपरमार्थे-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'पर'.... त्त्वार्थः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।

२०४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः नन्वेवंविध२लक्षणं स्वात्मतत्त्वं केन प्रमाणेनावसीयत इत्यत आह— तदा प्रकाशमानत्वं तेजसां तमसामपि। अविनाभावरूपत्वं तस्माद् विश्वस्य सर्वतः॥७५॥ २यदा शिवः सर्वप्राणिनां चित्ते परिस्फुरति, तदा 'आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन'' (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या तेजसां सूर्यादीनां तमसां घटादीनां जडानामपि प्रकाशमानत्वम्। चित्ते चिदात्मनि परमशिवे प्रथमं परिस्फुरति सत्येव तत्तदिन्द्रियद्वारा तत्तदर्थानां परिस्फुरणम्। अत्र श्रुतिः—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (क० उ० ५।१५) इति। तस्मात् सर्वतः सर्वस्य विश्वस्य उक्त (१।४१) लक्षणस्य अविनाभाव- रूपत्वम्, विना न भवतीत्यविनाभावः। कोऽर्थः ? विश्वमिदं द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकं दृश्यत्वात्, यद्यद् दृश्यं तत्तद् द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकम्, यथा सम्प्रतिपन्नो घटः, यद् द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकं न भवति तद् दृश्यमपि न भवति, यथा शशविषाणम्; इत्याद्यन्वयव्यतिरेकसिद्धेनानुमानप्रमाणेनावसीयत इत्यर्थः ॥७५॥ अब प्रश्न होता है कि ऊपर जिस स्वात्मस्वरूप का वर्णन किया गया है, उसकी प्रतीति हमें कैसे होगी ? इसी का उत्तर देते हैं— इस परम स्वरूप के प्रकाश से ही तेज और तम सभी प्रकाशित होते हैं। इस लिये यह सारा विश्व इसमें अभिन्न रूप में स्थित है ॥७५॥ जब शिव सब प्राणियों के हृदय में स्फुरित होते हैं, तब "आत्मा मन से, मन इन्द्रियों से और इन्द्रियां विषय से संयुक्त होती है" न्यायभाष्य की इस पद्धति से सूर्य प्रभृति तेजस्वी पदार्थों का तथा घट प्रभृति तमोमय (जड़) पदार्थों का भी बोध होता है। चित्त में चिदात्मस्वरूप परम शिव का पहले परिस्फुरण होने पर ही उन-उन इन्द्रियों की सहा- यता से उन-उन विषयों का ज्ञान हो पाता है। कठोपनिषद् भी कहती है—"उसका प्रकाश होने पर ही बाकी सब वस्तुएँ भासित होती हैं, इसी के प्रकाश से यह सब कुछ प्रका- शित है"। इसलिये पूर्वोक्त (१।४१) लक्षण वाला यह सारा जगत् उस परम शिव में ही अनुस्यूत है, उसके बिना जगत् की स्थिति ही नहीं बन सकती। इसका अभिप्राय यह है कि इस विश्व की प्रतीति के लिये द्रष्टा की अपेक्षा है, क्योंकि यह दृश्य है, जो जो दृश्य पदार्थ हैं, उनकी प्रतीति द्रष्टा द्वारा ही होती है, जैसे दृश्य रूप में स्वीकृत घट की प्रतीति द्रष्टा करता है। जिसकी प्रतीति द्रष्टा के अधीन नहीं होती, वह दृश्य भी नहीं होता, जैसे खरगोश की सींग। इस तरह अन्वय और व्यतिरेक की सहायता से अनुमान प्रमाण के द्वारा यह सिद्ध होता है कि दृश्य जगत् का द्रष्टा वह स्वात्मस्वरूप परम शिव ही है ॥ ७५ ॥ १. पदलक्षणं सर्वाङ्गीणं... २. यदा सर्वप्राणिनां चे...

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०५ अथवा अलं प्रमाणचिन्तया, प्रमाणानामपि चिदनुप्रवेशेनैव प्रमाणत्वात् तेषा- मपि ^१स्वरूपमेतत्सद्भावं साधयितुमलम्, तस्य प्रकाशरूपत्वादित्याह— प्रकाशते महातत्त्वं दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले। महातत्त्वं देशकालाकारैरनवच्छिन्नं तत्त्वं प्रकाशते ^२स्वयमेव, तेन विना न तत्किमपि प्रकाशयितुमलम्, तस्यैव प्रकाशेन ^३सर्वत्र प्रकाशात्। अत्र श्रुति- स्मृती— “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (क० उ० ५।१५) इति, "न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः" (भ० गी० १५।६) इति च। अभियुक्तवचोऽपि— अवधानैकतानानां मतिरेवात्र साक्षिणी। किं प्रमाणै^४र्वराकंस्तैश्चिदनुप्राणितात्मभिः॥ नहि वैकर्तनं ज्योतिर्दीपालोकमपेक्षते। (प० प० ११-१२) इति। अथवा उस स्वात्मस्वरूप के लिये किसी प्रमाण की चिन्ता करना व्यर्थ है। प्रमाणों की प्रवृत्ति भी, उनका प्रामाण्य भी चिच्छक्ति की सहायता से ही निश्चित होता है, अतः इन प्रमाणों के प्रकाशक के रूप में भी इस स्वात्मस्वरूप का सद्भाव सिद्ध होता है— हे शिवशक्तिसामरस्यस्वरूपिणि देवि ! यह महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है, अर्थात् इसके प्रकाश के लिये किसी दूसरे तत्त्व की आवश्यकता नहीं है ॥७६॥ यह देश, काल, आकार आदि से अपरिच्छिन्न महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है। इसके बिना कोई भी वस्तु प्रकाशित नहीं हो सकती। इसी के प्रकाश से बाकी सब वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं। श्रुति का कहना है कि उस ब्रह्म के प्रकाश से ही सब कुछ प्रकाशित होता है। स्मृति (गीता) भी कहती है कि उस ब्रह्म को सूर्य, चन्द्रमा अथवा अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकती। किसी प्रामाणिक ^१व्यक्ति ने भी कहा है— पूरी सावधानी बरतने वाले योगियों की एकाग्र बुद्धि ही मात्र इस परम तत्त्व का साक्षात्कार कर सकती है। बेचारे प्रमाणों की प्रवृत्ति यहाँ कैसे हो सकती है, क्योंकि उनका संचालन तो यह चिच्छक्ति ही करती है। सूर्य को प्रकाशित करने के लिये बेचारे दिये की क्या औकात हो सकती है ? १. 'स्वरूपम्' नास्ति-क. ग. ज. झ. । २. स्वत एव-ख. ज. झ. उ. । ३. सर्वाणि प्रकाशन्त इति-ज. झ. उ., प्रकाशन्ते सर्वाण्यपि-क.। ४. र्वचोभिश्च स्वप्रकाशे चिदात्मनि- ख. ते. ज. झ. ।

  1. इस उक्ति से स्पष्ट हो जाता है कि परापंचाशिका किसी व्यक्ति की रचना है। अतः कश्मीर ग्रन्थमाला में अनुत्तरप्रकाशपंचाशिका के नाम से प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रारंभ में दिया गया नाम (आद्यनाथ) भगवान् शंकर का वाचक न होकर किसी व्यक्ति विशेष का नाम है।

२०६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले । १'देव्याः संबुद्धिः । २'दिवि भवो दिव्यः परमशिवः, तस्य क्रीडा विश्वसर्जनादिव्यवहारक्रियात्मिका चिच्छक्तिः, तयोः रसः सामरस्यम्, तेनोज्ज्वले नित्यं शिवशक्तिसामरस्यपरायणप्रतीते देवि इत्यर्थः ॥७६॥ ननु महातत्त्वार्थज्ञानस्य फलं यागादिकर्मणामिव देहान्तरदेशान्तरकालान्तर- भाविप्रत्ययः किम् ? नेत्याह— निरस्तसर्वसंकल्पविकल्पस्थितिपूर्वकः ॥७६॥ रहस्यार्थो महागुप्तैः सद्यः प्रत्ययकारकः । इदमहं करिष्यामीति मानसं कर्म संकल्पः, एवं मया कर्तव्यं न वेति कोटि- द्वयावलम्बि ज्ञानं विकल्पः । शिव४स्वातन्त्र्यभावे तु तौ निरस्तौ यत्परिज्ञान- मात्रतः, तदुभयनिरासादेव मनःस्थैर्यं स्थितिर्जायते । तत्पूर्वको रहस्यार्थ आकर्णन- योग्यो न भवति । अत एव ३महागुप्तः, न५ कस्यापि कथितः, अत्यन्तयत्नेन दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले यह देवी का संबोधन है । दिव्य शब्द यहाँ परम शिव का वाचक है । उसकी क्रीडा है विश्व के सृष्टि आदि व्यवहारों का संचालन करने वाली चिच्छक्ति । इसका अर्थ है सामरस्य । इस तरह से परम शिव और चिच्छक्ति के सामरस्य से उल्ल- सित स्वरूप वाली यह देवी यहाँ संबोधित है । इसका भाव यह है कि हे देवि ! शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप को जानने के लिये जो साधक निरन्तर सचेष्ट रहते हैं, उन्हीं को तुम्हारा यह स्वरूप प्रतीत हो सकता है, वे ही तुम्हारे इस स्वरूप को जानने में समर्थ हो सकते हैं ॥७६॥ यज्ञ-याग आदि कर्मों का फल देहान्तर, देशान्तर और कालान्तर में मिलता है । महा- तत्त्वार्थ को जान लेने का फल तो तुरन्त मिल जाता है, अब इसी बात को समझा रहे हैं— समस्त संकल्पविकल्पात्मक स्थितियों को दूर कर देने वाला यह रहस्यार्थ अत्यन्त गोपनीय है । यह तत्काल फल देने वाला है ॥७६-७७॥ इस कार्य को मैं करूंगा, इस तरह का मानस कर्म संकल्प कहलाता है । इस कार्य को मैं करूं या न करूं, इस तरह का दो कोटियों वाला संशयात्मक ज्ञान विकल्प कहलाता है । ये दोनों ही स्थितियां तब दूर भाग जाती हैं, जब साधक अपने परिपूर्ण स्वतन्त्र शिव- स्वरूप को जान लेता है । संकल्पविकल्पात्मक चित्त की वृत्तियों के दूर हो जाने से मन स्थिर हो जाता है । इनको दूर करने का कार्य यह रहस्यार्थ ही करता है, अतः इसे अवश्य साव- धानी से सुनना चाहिये । इसीलिये अब तक मैंने इसे गुप्त रखा है, किसी को भी बताया १. 'देव्याः संबुद्धिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. दिवः संबन्धेन भवो-ख. ने. ज. उ. । ३. मया गुप्तः-क. ग. । ४. न्त्र्याभावहेतुकाले-क. ख. ग. ने. ज., न्त्र्या- भावहेतुज्ञाने-झ. । ५. न कस्यापि कथितः-क. ख. ग. ज., न कस्याप्युक्तः-ने.।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०७ रक्षितः। सद्यः प्रत्ययकारकः एतदाकर्णनेन शिवोऽहमस्मीति प्रत्ययः सद्य एव समुदेतीत्यर्थः ॥७६-७७॥ नन्वयमर्थः कुत्र स्थितः ? कुत्र वा दृष्टस्त्वया ? किं वा तस्य फलम् ? इत्यत आह— महाज्ञानार्णवे दृष्टः शङ्का तत्र न पार्वति ॥७७॥ विद्यापीठनिबन्धेषु संस्थितो दिव्यसिद्धिदः। विद्यैव पीठं विद्यापीठम्, शिवयोर्विश्रान्तिस्थान¹त्वात्। तन्निबद्ध्यते येषु तानि तदवयवभूतानि वाग्भवकामराजशक्त्याख्यानि बीजानि, तेषु विद्यापीठनिब- न्धेषु, "अकुले विषसंज्ञे च" (१।२५) इत्यत्रोक्तरीत्या बीजत्रयशिखरवर्तिबिन्द्वर्ध- चन्द्ररोधनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनाक्रमेणानुसन्धीयमानेषु उन्मन्यन्त- देशकालानवच्छिन्न²वस्तुपरचिदात्मकमहातत्त्वार्थः संस्थित इत्यर्थः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— नहीं है, बड़े जतन के साथ छिपाये रखा है। इसको सुन लेने मात्र से मैं शिव हूँ, इस तरह का ज्ञान तत्काल उत्पन्न हो जाता है ॥ ७६-७७॥ फिर प्रश्न होता है कि यह अर्थ अब तक कहाँ छिपा हुआ था ? आपने उसे कहाँ देखा और इसका फल क्या है ? अब इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देते हैं— इस अर्थ को मैंने महाज्ञानार्णव में देखा है। हे पार्वति ! इस विषय में किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि विद्यापीठ के निबन्धों में भी दिव्य सिद्धि के देने वाले इस अर्थ का निरूपण है ॥७७-७८॥ विद्या स्वयं ही तब पीठ बन जाती है, जब शिव और शक्ति उस पर विश्राम करते हैं। इस ¹विद्यापीठ की जहाँ व्याख्या की जाती है, वे उसी के अवयवभूत वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक बीज हैं। पूर्वोपदिष्ट (१।२५) पद्धति से इन तीनों बीजों के शीर्ष स्थान में स्थित बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना के क्रम से जब हम परम तत्त्व के अनुसन्धान में लगते हैं, तो उन्मना से परे देश, काल, आकार आदि से अपरिच्छिन्न परचिदात्मक स्थिति का ज्ञान होता है। यही महा- तत्त्वार्थ है। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— १. स्थानं तन्निबन्धनानि-ख. ने. ज. उ. । २. 'वस्तु' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. मुद्रा, मण्डल, मन्त्र और विद्या नामक चार पीठों में विभक्त तन्त्रों की चर्चा हमने नि० बो० (उपोद्घात, पृ० ५६-५७) में की है। उसी विभाग की चर्चा यहां हुई है, किन्तु अमृतानन्द और भास्करराय ने उस परम्परा की उपेक्षा कर यहाँ कल्पना के सहारे विद्यापीठ लिया है।

२०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः या १चेयं समनाशक्तिस्तदूर्ध्वे उन्मना २स्मृता। नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता ॥ सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिवशक्तिरिति ख्यातं३ निर्विकल्पं निरञ्जनम् ॥ तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोतीतगोचरम् । अनिष्कलं चासकलं नीरूपं निर्विकल्पकम् ॥ निर्द्वन्द्वं परमं ४तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् । इति । दिव्यसिद्धिदः । दिवि ५उन्मन्यन्ते निरस्तनिखिलप्रपञ्चमहाशून्ये भवतीति दिव्यः ६परमशिवः पूर्वोक्तः (२।७६), तस्य सिद्धिः स्वाभेदेन परिज्ञानम्, तल्लक्षणं परमप्रयोजनं ददातीति दिव्यसिद्धिदः । महाज्ञानार्णवे दृष्टः । तादृशपरमशिव- सामरस्यसमाधिरेव महाज्ञानम्, तदेवार्णवः७, निस्तरङ्गपारावारभूतपरमामृत- परिपूर्णत्वात्, तस्मिन् दृष्टः ८स्वात्माहंभावभावनया भावितः। कोऽर्थः ? अयं परमः यह जो समना शक्ति है, उसके ऊपर उन्मना शक्ति की स्थिति सुनी जाती है । यह काल की कला, तत्त्व, देवता आदि की प्रतीति नहीं होती । परम शुद्ध स्वच्छ निर्वाण पद यही है । शिव के स्वरूप की प्रतीति का १द्वार यही है । यह शिव और शक्ति का समरस स्वरूप है । हे वरारोहे ! यह निर्विकार, निरंजन, तत्त्वातीत पद मन और वाणी का विषय नहीं बन सकता । यही अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है, यही शिव नामक परम पद है ॥ यह महातत्त्वार्थ दिव्य सिद्धि को देने वाला है । उन्मना के अन्त में समस्त जागतिक प्रपंचों से ऊपर विद्यमान महाशून्य ही परम आकाश है । उस परम आकाश में ही परम शिव विद्यमान हैं । इस दिव्य परम शिव की सिद्धि, उसके साथ अपना अभेद ज्ञान इस महातत्त्वार्थ की सहायता से ही मिल सकता है, अतः यह दिव्य सिद्धि को देने वाला है । यह ज्ञान २महाज्ञानार्णव में दृष्ट है । परम शिव की समरसता रूप समाधि को ही यहाँ महाज्ञान कहा गया है । यह निस्तरंग शान्त समुद्र के समान परमामृत से परिपूर्ण है । इस महाज्ञानरूपी समुद्र में इस अर्थ को देखा गया है, अपनी आत्मा का ही यह स्वरूप १. चोक्ता-ज. झ., शक्तिः का०णत्वेन पूर्वतनः पाठः । २. स्थिता-ने. ज. । ३. ता**** कारा''''ञ्जना-ख. ने. ज. झ. । ४. शान्तं-क. ग. । ५. 'उन्मन्यन्ते' नास्ति-क. ग. । ६. परमेश्वरः-ख. ने. झ. उ. । ७. र्णवो विस्तारः, तरणपराणां परा-ख. ने. ज. उ. । ८. शिवाहं-ज. झ. । १. पृ० ४९ की टिप्पणी देखिये । २. महाज्ञानार्णव एक तन्त्र का नाम है । भास्करराय ने भी इसको माना है । अमृतानन्द ने इस ग्रन्थ के नाम पर ही अपने ग्रन्थ का नामकरण किया है ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०९ शिवपरप्राप्तिलक्षणो महातत्त्वार्थः सौभाग्यविद्याबीजत्रयशिखरवर्तिन्युन्मन्यवसान- भूमाववस्थितस्तथाविधफलदो मया नित्यं समाधिदशायां निरीक्ष्यत¹ इत्यर्थः । शङ्का तत्र न पार्वति । शङ्का तत्र त्वया न कार्या । यथार्थदर्शी यथादृष्टार्थवादी तवाहमाप्तः, तेन मदुक्तेऽर्थेऽपि विश्वासः कार्य इत्यर्थः ॥७७-७८॥ नन्वयं महातत्त्वार्थो ²महागुप्त इत्युक्तम्, तर्हि कीदृशैर्लभ्यत इत्यत आह— कौलाचारपरैर्देवि पादुकाभावनापरैः ॥७८॥ योगिनीमेलनोधुक्तैः प्राप्तदिव्याभिषेचनैः । शङ्काकलङ्कविगतैः सदा मुदितमानसैः ॥७९॥ पारम्पर्येण विज्ञातरहस्यार्थविशारदैः । लभ्यते कुलं शरीरं महाप्रयोजनहेतुतया ज्ञेयं येषां ते कौलाः । तदुक्तं स्वच्छन्द- संग्रहे— है, इस तरह से पहचाना गया है। इसका भाव यह है कि परम शिव की भलीभाँति प्राप्ति कराने वाला यह महातत्त्वार्थ सौभाग्यविद्या के तीन बीजों के शिखर स्थान में विद्यमान उन्मना पर्यन्त नाद की जहाँ समाप्ति होती है, वहाँ विराजमान है। यह तत्काल फल देने वाला है। इसीलिये मैं प्रतिदिन समाधि दशा में इसका निरीक्षण करता हूँ। हे पार्वति ! इस विषय में तुमको किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये। सभी पदार्थों के रहस्य को यथार्थ रूप में देखने वाला और यथार्थ रूप में देखे गये उन विषयों को तुमको समझाने वाला मैं तुम्हारे लिये परम प्रमाणभूत हूँ। इसलिये मेरी कही बात पर तुमको विश्वास करना चाहिये ॥७७-७८॥ भगवान् शिव ने बताया है कि यह महातत्त्वार्थ परम गोपनीय है, तब कैसे व्यक्ति इसे प्राप्त कर सकते हैं, इसीका अब वर्णन किया जा रहा है— हे देवि ! कौलाचार का अनुसरण करने वाले, गुरुपादुका की सेवा में लगे हुए, योगिनीमेलन में निरत, सभी प्रकार की शंकाओं से उन्मुक्त, सदा प्रसन्न- चित्त रहने वाले लोग ही इस महातत्त्वार्थ को ठीक तरह से समझ सकते हैं, जो कि गुरु-क्रम से दीक्षित और अभिषिक्त होकर परम्परा से सारे रहस्य को जानते हैं ॥७७-८०॥ कुल शब्द यहाँ शरीर का वाचक है। यह मानव शरीर ही महाप्रयोजन मोक्ष की सिद्धि कराने वाला है, ऐसा मानने वाले कौल कहलाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इनका वर्णन है— १. क्ष्यते । अस्मत्कल्पितोऽयं पाठः ख., ग., घ., ङ.। २. महा गुप्तः ख., ङ.। १४

२१० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः कुलज्ञानमथो वक्ष्ये कौलिकानां हिताय वै। यस्य विज्ञानमात्रेण योगोपायाश्च योगिनाम् ॥ १सुगुप्ताः सिद्धयः सर्वा भवन्ति सुलभाः प्रिये। शरीरं कुलमित्युक्तम् .... .... .... ॥ तेषामाचारः, सर्वेषामेव शिष्याणां दीक्षितानां२ कुलान्वये। सर्वावस्थागतानां च साधारणमतं३ शृणु ॥ गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च पूजा श्रद्धा क्षमा धृतिः। इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या समयाचारपरैः। पादुकाभावनापरैः, स्वप्रकाशशिवमूर्त्तिरेकिका तद्विमर्शतनुरेकिंका तयोः। सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः॥ (चि० १) अब मैं कौलिकों के हित के लिये कुल ज्ञान का उपदेश करता हूँ। हे प्रिये ! इसको जानने मात्र से योगियों को योग के उपायों की और नाना प्रकार की अत्यन्त गुप्त सिद्धियों की प्राप्ति अनायास हो जाती है। यह शरीर ही कुल कहलाता है ॥ इन कौलिकों का आचार ही कौलिकाचार है। इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में है— कुलान्वय में दीक्षित सभी शिष्यों के लिये, चाहे वे किसी भी अवस्था में पहुँच गये हों, साधारण नियम (समय) सुनो, जिनका पालन करना सबके लिये आवश्यक है। ये हैं—गुरुभक्ति, शान्ति, पूजा, श्रद्धा और धृति ॥ इस तरह से समयाचार का, समयों (नियमों) का पालन करना ही कौलिकाचार है। इनका सदा पालन करने वाला हुआ कौलिकाचारतत्पर। पादुकाभावनापर का अर्थ है गुरु की पादुका की भावना में सदा लगा हुआ। गुरुपादुका का स्वयं व्याख्याकार ने अपने स्तोत्र चिद्विलास में इस तरह से वर्णन किया है— स्वयंप्रकाशस्वरूप शिव की एक मूर्ति है और उसका विमर्शशक्तिमय दूसरा शरीर है। इन दोनों के सामरस्यमय शरीर से परा पादुका बनती है, जो परमशिव स्वरूप गुरु का देह है। इसका अभिप्राय यह है कि गुरु की पादुका की भावना करने वाला शिष्य अपने गुरु के प्रसाद से शिव और शक्ति के सामरस्य को भलीभाँति समझ सकता है, क्योंकि गुरु की पादुका में यह स्वरूप स्वाभाविक रूप से छिपा हुआ है ॥ १. योगोक्तविधयः सर्वे—क. ग. । २. तानामपि प्रिये—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गतं—क. ग. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २११ इत्यस्मदुक्तरीत्या प्रकाशविमर्शतत्समष्टितया श्रीगुरुपादुकात्रयभावनापरैः। योगिनीमेलनोध्द्युक्तैः, यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते। तत्सतां हि नियमावलम्बनं १ध्यानपूजनकथा विडम्बना॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या मातृमानमेयसंविदो योगिन्यः, तासां मेलनम् अन्तर्मुखीभावेन परप्रमातृविश्रान्तिः३, अथवा ब्राह्म्याद्यष्टकार्चनार्थं सामयिक- शक्तिचक्रमेलनं योगिनीमेलनम्, तत्रोद्युक्तैः४। प्राप्तदिव्याभिषेचनैः लब्धपरमशिव- इस तरह से यहाँ प्रकाश, विमर्श और इनकी समष्टिस्वरूपिणी तीन पादुकाओं की भावना करनेवालों का बोध होता है। अब योगिनीमेलनोध्द्युक्त पद का अर्थ किया जा रहा है— जहाँ जहाँ मरीचियाँ मिलती हैं, सब जगह उस परम शिव का व्यापक स्वरूप ही दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में नाना प्रकार के नियमों का पालन करना, ध्यान करना, पूजा करना—ये सब विडम्बना मात्र हैं॥ इस १प्रामाणिक वचन के अनुसार यहाँ माता, मान और मेय रूप संवित्त्तियाँ ही योगिनियाँ कहलाती हैं। उनके मेलन का अर्थ है उनको अन्तर्मुख बना कर परप्रमाता स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देना। अथवा ब्राह्मी प्रभृति के २अष्टाष्टक स्वरूपों की उपासना के लिये सामयिक शक्तिचक्र के मेलन को भी योगिनीमेलन कह सकते हैं। इस उभय- विध योगिनीमेलन के लिये जो तत्पर हैं, उनको कहते हैं योगिनीमेलनोध्द्युक्त। इसी- १. लम्बिनां-क. ग.। २. प्रमाणवच-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'रत्रोद्युक्तैः' इत्य- धिकम्-झ.। ४. 'तत्रोद्युक्तैः' नास्ति-झ.।

  1. अमृतानन्द ने आगे (३।१४३) इसी वचन को स्तोत्रावली के नाम से उद्धृत किया है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रवर्तक भट्ट उत्पल की शिवस्तोत्रावली में उक्त श्लोक नहीं मिलता। भट्ट उत्पल के नाम से उद्धृत कुछ अन्य श्लोक भी वहाँ नहीं मिलते। क्षेम- राज ने शिवस्तोत्रावली के उसी स्वरूप की व्याख्या की है, जो श्रीराम, आदित्यराज और विश्वावर्त के द्वारा निर्धारित किया गया था। प्राप्त सभी हस्तलेखों के आधार पर मूल शिवस्तोत्रावली का नया संस्करण होना चाहिये।
  2. अष्टाष्टक शब्द का अर्थ भास्करराय की सेतुबन्ध टीका (३।२००-२०२) में देखिये। वैरोचन कृत प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय (६।३२७-४००) में ब्रह्मयामल के प्रमाण से आठ दिशाओं में विद्यमान योगिनियों के अष्टाष्टक स्वरूपों (६४ योगिनियों) की नामावली तथा ध्यान विस्तार से वर्णित हैं। भेड़ाघाट जैसे स्थानों में विद्यमान ६४ योगिनियों की मूर्तियों का इनसे मिलान करके नया पाठ निर्धारित होना चाहिये।

२१२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः प्रायगुरुवराभिमन्त्रितचिद्रसमयकलशसलिलसेकैस्ततः प्रक्षालितमलमयपाशैः। अत एव शङ्काकलङ्कविगतैः। इदमित्थं भवेन्न भवेदित्यनवधारणज्ञानं शङ्का, सैव कलङ्कः, मालिन्यहेतुत्वात्, तस्माद्विगतैः। अत एव सदा मुदितमानसैः, मेघावरण- विगमाद् यथा रखेः स्वरूपं स्फुरति, तथा मलपाशविगमात् सदा येषां मनसि प्रमोद- लक्षणं परशिवस्वरूपं प्रकाशते, तैरित्यर्थः। पारम्पर्येण विज्ञातरहस्यार्थविशारदै- र्लभ्यते शिवादिस्वगुरुपर्यन्तं १गुरुपारम्पर्यक्रमसमासादितसकलरहस्यार्थपर्यालोचन- पटुतरमतिभिरयं२ महातत्त्वार्थो लभ्यत इत्यर्थः ॥७८-८०॥ कौलाचारपरैरित्याद्युक्तगुणविहीनैरयमर्थो न लभ्यत इति शपथपूर्वकमाह— नान्यथा देवि त्वां शपे कुलसुन्दरि ॥८०॥ स्पष्टम् ॥८०॥ तरह से प्राप्तदिव्याभिषेचन का अर्थ है जो प्रायः परमशिव स्वरूप गुरुप्रवर के द्वारा अभिमन्त्रित चिद्रसमय ज्ञानामृत से परिपूर्ण कलश के जल से अभिषिक्त हो चुके हैं और इसके कारण मलमय पाश जिनके घुल चुके हैं। इसीलिये ऐसे योगी शंकारूपी कलंक से मुक्त हो जाते हैं। यह ऐसा होगा या नहीं, इस तरह की अनिश्चयात्मक स्थिति को शंका कहते हैं। यह १शंका मलिनता का कारण बनती है, अतः कलंक के समान है। इस शंका- रूपी कलंक से योगी मुक्त रहते हैं। इसीलिये ये सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। बादलों के हट जाने से जैसे निरावरण सूर्य निर्मल रूप से प्रकाशित होता है, उसी तरह से मलमय पाशों के हट जाने से इनके हृदय में आनन्दमय परशिव का स्वरूप प्रकाशित होता रहता है। शिव से लेकर अपने गुरु पर्यन्त चली आई गुरु-परम्परा के क्रम से जिन्होंने समस्त रहस्यों को समझ लिया है और बड़ी सावधानी से जो इसका पर्यालोचन करते रहते हैं, ऐसे निपुण मति वाले साधक ही इस महातत्त्वार्थ को प्राप्त कर सकते हैं ॥७८-८०॥ कौलाचारपर इत्यादि विशेषताओं से रहित व्यक्ति इसको कभी नहीं प्राप्त कर सकता, इसी बात को अब शपथपूर्वक कहते हैं— हे देवि ! इसके अतिरिक्त अन्य किसी उपाय से इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती। हे कुलसुन्दरि ! यह बात मैं तुमको शपथपूर्वक कहता हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥८०॥ १. पर्यन्तपरम्परया विदितसकल—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'अयं' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । १. आठ पाशों की चर्चा दीपिकाकार (१।७२) ने की है । तन्त्रालोककार (१५। ५९५-५९६) ने इनको ग्रह अथवा आग्रह कहा है । इनमें शंका भी एक है । इसका संक्षिप्त स्वरूप लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० २१२-२१३) में देखिये ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१३ ननु मास्तु गुरुपारम्पर्यक्रमः, पुस्तकपाठादिना व्युत्पत्तिबलेनापि किञ्चिन्मात्र- परिज्ञानं सम्पादयितुं शक्यत इत्याह— पारम्पर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः । तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥८१॥ अन्यथा कौलाचारव्यतिरेकेण ज्ञानमात्रेण पुस्तकपाठोत्पन्नज्ञानमात्रेण तस्य साधकस्य सिद्धिर्न भवतीति ये पारम्पर्यविहीनाः शब्दव्युत्पत्तिबलेन किञ्चिन्मात्रपरि- ज्ञानेन गर्विताः१, तेषां समयलोपेन, “मादनं तदधः शक्तिः” (नि० षो० १।१११) इत्याद्यागमशास्त्रविहितसकलमन्त्राक्षरसंकेतपरिज्ञानाद्युच्चारणादिक्रमलोपेन विकु- र्वन्ति मरीचयः सर्वपीठनिवासिन्यः सर्वगाश्चिन्मरीचयः । भैरव्यो २भरिताकारा रक्षन्तु कुलमातरः ॥ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ब्राह्म्याद्या डाकिन्याद्यास्त्वगादिधातुदेवताः, विकुर्वन्ति विकारं जनयन्ति, स्वस्वधातूद्रैकरूपविकारजननेन तेषां देहं नाश- यन्तीत्यर्थः ॥८१॥ शंका होती है कि गुरु-परम्परा के बिना भी पुस्तक को पढ़कर शब्दों की व्युत्पत्ति के आधार पर कुछ न कुछ जानकारी मिल ही सकती हैं, अब इसका समाधान देते हैं— जो व्यक्ति गुरु-परम्परा से विहीन हैं और जिनको अपने ज्ञान पर गर्व है, परम्परा का लोप करनेवाले ऐसे व्यक्तियों को योगिनियां विद्रूप बना देती हैं ॥८१॥ जिनको गुरु-परम्परा से कौलाचार का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, तो पुस्तक को पढ़ने से उपजे ज्ञान से उनको किसी प्रकार की सिद्धि नहीं मिल सकती। जो परम्परा से विहीन (रहित) हैं, शब्दों की व्युत्पत्ति के सहारे थोड़ा बहुत जान कर जो अहंकारी बन गये हैं, ऐसे व्यक्ति समय का लोप करने वाले हैं। नित्याषोडशिकार्णव आदि शास्त्रों में निर्दिष्ट मूलविद्या के अक्षर-संकेत और उच्चारण आदि की गुरु-परम्परा से प्राप्त होने वाली पद्धति को न जानने के कारण ये प्रत्यवाय के भागी होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को मरीचियाँ कष्ट पहुँचाती हैं। इसीलिये किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इन मरीचियों की इस तरह से स्तुति की है— सभी पीठों में निवास करने वाली, सर्वत्र यथेच्छ विचरण करने वाली, चिच्छक्ति की मरीचियाँ (किरणें) ही, परिपूर्ण स्वभाववाली भैरवियाँ हैं, कुलदेवियाँ हैं। ये हमारी रक्षा करें ॥ तदनुसार ब्राह्मी आदि और त्वचा आदि धातुओं की अधिपति देवता डाकिनी आदि, जो मरीचियों के नाम से जानी जाती हैं, अपने अपने नियन्त्रण में विद्यमान १. ताः समयः संकेत:, मादनं—ख. ने. ज. उ. । २. भाविताकाराः—ख. ने. ज,

२१४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु कस्मिन् दिने कस्मिन्नक्षत्रे कस्मिन् १वासरे कौलाचारक्रमेण योगिनी- मेलनं कार्यमित्यत आह— यस्तु दिव्यरसास्वादमोदमानविमर्शनः । देवतातिथिनक्षत्रे२ वारेऽपि च विवस्वतः ॥८२॥ मरीचीन् प्रीणयत्येव मंदिरानन्दँघूर्णितः । सर्वदा च विशेषेण यस्तु कौलाचारपरो योगी दिव्यरसास्वादमोदमानविमर्शनः, दिवि परव्योम्नि भवतीति दिव्यः परशिवः, तेन रसः सामरस्यम्, तस्यास्वादोऽनुभवः, तेन मोदमानं विमर्शनं मनोवृत्तिर्यस्य सः। प्रथमं परशिवैक्यपरामर्शपरिस्फुरदकृत्रिमा- नन्दकेवलः पश्चान्मदिरानन्दघूर्णितो वक्ष्यमाणा(३।९८-१०३)र्घ्यशुद्धिं विधाय ५परामृतभूतया मदिरया सम्पादितानन्दो योगी। देवतातिथिनक्षत्रे, चतुर्दश्यष्टम्यौ देवतातिथी, पुष्यनक्षत्रं देवतानक्षत्रम् । अत्रैव वक्ष्यति— धातुओं में विषमता पैदा करके ऐसे समयलोप करनेवाले व्यक्तियों के शरीर को रुग्ण बना कर नष्ट कर देती हैं ॥८१॥ किस दिन, किस नक्षत्र और किस वार में कौलाचार के क्रम से योगिनीमेलन करना चाहिये, इसी विषय को अब बताते हैं— कौलाचार का पालन करने वाले योगी का मन जब परम शिव के सामरस्य का आस्वादन कर आनन्दित हो उठता है, तब वह मदिरा का सेवन कर इस आनन्द को और भी उभारता है। इस अवस्था में योगी देवतातिथि और नक्षत्र में रविवार के दिन तो मरीचियों (योगिनियों) को विशेष रूप से अवश्य ही तृप्त करता है ॥८२-८३॥ जो कौलाचारपरायण योगी परम शिव के सामरस्य से उत्पन्न आनन्द का अनुभव कर प्रसन्नता से भर जाता है, वह पहले परम शिव के साथ एकता का अनुभव कर अकृ- त्रिम (स्वाभाविक) आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। बाद में यह योगी आगे (३।९८- १०३) बताई गई विधि से अर्घ्य की शुद्धि करके परम अमृतमय उस सुधा का सेवन कर कृत्रिम आनन्द से भी अपने को परिपूर्ण कर लेता है। ऐसी अवस्था में वह योगी देवता- तिथि (चतुर्दशी और अष्टमी) तथा देवतानक्षत्र (पुष्य) में मरीचियों को अवश्य ही तृप्त करता है। देवतानक्षत्र से पुष्य नक्षत्र का ग्रहण इसी ग्रन्थ में आगे (३।१९१- १९२) किया गया है। वहाँ बताया गया है— १. वारे-ख. ग. घ. उ., योगे-ने. । २. श्रवारे-छ. ज. झ. उ. । ३. कारणा-ज. झ., सुधया-छ. । ४. मद-ने. ड. च. छ. । ५. परामृतरूपया तया-ख. ग. घ.

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१५ 'पुष्यभेन तु वारे च सौरे च परमेश्वरि ॥ गुरोर्दिने स्वनक्षत्रे चतुर्दश्यष्टमीषु च । चक्रपूजां विशेषेण योगिनीनां समाचरेत् ॥ (३।१९१-१९२) इति । मरीचीन् प्रीणयत्येव²। एवकारोऽयोगव्यवच्छेदपरः। उक्तकालेषु सर्वदा योगिनी- प्रीणनं कुर्यात्, अन्यथा प्रत्यवायो भवेदित्यर्थः । कालविशेषकथनं नैमित्तिकविशेष³- पूजाद्योतनार्थम् । सर्वदा प्रत्यहं च मरीचीप्रीणनं कुर्यादेव, एवकारेणाप्यन्वयः । नित्यार्चनाकरणे प्रत्यवायोऽस्तीति तात्पर्यम्, “नित्यार्चनायां लुप्तायां सासनां सावृति क्रमात्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोकरीत्या प्रायश्चित्तस्य कर्तव्य⁴त्वात् ॥८२-८३॥ अकरणे प्रत्यवाय एव भवति, करणे तु फलमस्तीत्याह— लभते पूर्णबोधैताम् ॥८३॥ हे परमेश्वरि ! पुष्य नक्षत्र से युक्त रविवार के दिन, गुरु की जन्म और मृत्यु तिथि पर, अपने जन्म दिन पर, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि पर योगिनियों की प्रसन्नता के लिये चक्रपूजा अवश्य करे ॥ एव शब्द का अभिप्राय यह है कि ऐसा अवश्य करे, ऊपर बताये गये तिथि, नक्षत्र, वार आदि के उपस्थित होने पर सदा योगिनियों को तृप्त करे । ऐसा न करने पर साधक प्रायश्चित्त का भागी होगा । यहाँ विशेष काल की सूचना नैमित्तिक पूजा की द्योतक है । सामान्य रूप से नित्य क्रिया के रूप में तो योगिनियों की तृप्ति सदा करनी है । एव (ही) शब्द यहाँ अपि (भी) के अर्थ में मानना चाहिये । नित्य पूजा न करने पर व्यक्ति प्रायश्चित्त का भागी होता है। स्वच्छन्दसंग्रह के अनुसार “नित्यार्चन का लोप होने पर आसन देवताओं और आवरण देवताओं के साथ परा भगवती की क्रमशः अर्चा (पूजन) होनी चाहिये”। नित्यार्चन के न करने पर इस तरह से उसको प्रायश्चित्त करना पड़ता है । इससे यह अभिप्राय निकलता है कि नित्यार्चन तो प्रतिदिन करना ही है, उक्त विशेष तिथियों में नैमित्तिक पूजा भी साधक को अवश्य करनी चाहिये ॥८२-८३॥ यह बता दिया गया है कि न करने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है और अब करने से फल की प्राप्ति होती है, इस विषय को बताते हैं— नित्य और नैमित्तिक पूजा करने वाला साधक पूर्णबोधता को प्राप्त कर लेता है ॥८३॥ १. नित्यं पुष्यदिने वारे सौरे च-ख. ज. झ. ड. । २. इतः परम्-‘मरीचीनुबतरूपां- श्चिन्मरीचीन् प्रीणयत्येव तर्पयत्येव’ इत्याधिकः पाठः-झ. ३. ‘विशेष’ नास्ति-ख. नै. ४. व्यवच्छिन्नात्-ख. नै. ज. झ. ड. । ५. ष्टनम्-ख. नै. च. छ. ज. झ. ।

२१६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः “यत्र निर्विषयबोधलक्षणः स्वात्मशम्भुरवतिष्ठतेऽनिशम्” (चि० १०) इत्यस्मदुक्तरीत्या निरावरणचिद्रूपस्वात्मशम्भुत्वं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥८३॥ ननु पूर्णबोधभावः केन वा कियता कालेन कैर्वा सम्प्राप्यत इत्यत आह— एवंभावस्तु देवेशि देशिकेन्द्रप्रसादतः । महाज्ञानमयो देवि सद्यः सम्प्राप्यते नरैः ॥८४॥ एवंभावः पूर्णबोधत्वम् । देशिकेन्द्रप्रसादतः, यस्य करुणाकटाक्षपातमात्रेण पाशजालं छिद्यते, स परमशिवः केवलो देशिकेन्द्रः, तत्प्रसादतः स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति १भावुकः ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या तत्पादग्रहणेन, महाज्ञानमयो निरावरणचिन्मयः । नरैः२ “कौलाचारपरैः” (१७८) इत्यादिपूर्वोक्तविशेषणविशेषितैः । सद्यः देशिकेन्द्र- प्रसादसमवाप्तिसमय एव सम्प्राप्यते ॥८४॥ व्याख्याकार ने अपने चिद्विलास स्तव में पूर्णबोधता की व्याख्या इस तरह से की है—“इस स्थिति में बिना किसी विषय की सहायता के स्वप्रकाशमय बोध(ज्ञान)- मय स्वात्मस्वरूप शिव निरन्तर स्फुरित होता रहता है”। इस उक्ति के अनुसार नित्य और नैमित्तिक पूजा करने वाला साधक निरावरण चित्स्वरूप स्वात्मा की परम शिव से अभिन्नता को, उसकी पूर्णबोधस्वरूपता को पहचान लेता है ॥६३॥ अब प्रश्न होता है कि यह पूर्णता का बोध कौन, कितने समय में, किनकी सहायता से प्राप्त कर सकता है ? इसका उत्तर देते हैं— हे देवेशि ! इस पूर्ण बोधभाव की प्रतीति गुरुकृपा से होती है। हे देवि ! इस चिन्मय बोध की प्रतीति सद्गुरु की आराधना करने वालों को तत्काल हो जाती है ॥८४॥ एवंभाव का अर्थ है मैं परिपूर्ण बोधस्वरूप हूं । जिसकी कृपादृष्टि के पड़ने मात्र से सारे पाशजाल भिन्न-भिन्न हो जाते हैं, वह परम शिव ही केवल देशिकेन्द्र (सबका गुरु) कहलाता है । उसके प्रसाद (प्रसन्नता) का वर्णन स्वयं व्याख्याकार ने अपने चिद्विलास स्तव के एक श्लोक में किया है, जिसकी व्याख्या हम पहले (२।६८) कर चुके हैं। इस परम गुरु के प्रसाद को ग्रहण कर साधक महाज्ञानमय निर्मल चिन्मय स्वात्मस्वरूप को पहचान लेता है। यह साधक पूर्व निर्दिष्ट (२।७७) 'कौलाचारपर' इत्यादि विशेषताओं से संपन्न होकर तत्काल ही, परम गुरु की कृपादृष्टि के प्रसाद को पाने के साथ ही, उक्त महाज्ञान से सम्पन्न हो जाता है, अपने पूर्ण बोधमय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥८४॥ १. भावकः-ग. ने. उ. भावतः-ज. । २. ‘नरैः’ नास्ति-ख. ने. ज. ङ. उ.

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१७ मन्त्रसंकेतमुपसंहरति— एवमेतत्प्रदं^१ ज्ञानं विद्यार्णगमगोचरम् । देवि गुह्यं प्रियेणैव व्याख्यातं दुर्गि^२ षड्विधम् ॥ सद्यो यस्य प्रबोधेन वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥८५॥ एवम् उक्तप्रकारेण, एतत्प्रदं^३ परिपूर्णबोधलक्षण^४परशिवतत्त्व^५प्रदं ज्ञानम् । ^६विद्यार्णगमगोचरम्, विद्याया अर्णाः^७ पञ्चदश वर्णाः, त एवागमा महार्थबोध- कत्वात्, तद्गोचरं तदर्थतया व्याख्यातम्, "यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत्" (२।१) इत्यारभ्य "एवमेतत्प्रदम्" (२।८५) इत्यन्तश्लोकजालेन । षड्विधं "भावार्थः सम्प्रदायार्थः" (२।१५) इत्यादिना प्रतिपादितषट्प्रकारम् । देवि प्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपे परे । दुर्गि दुर्गे देशिकेन्द्रकटाक्षपातविहीनैर्नाप्यस्वरूपे । सद्यो यस्य प्रबोधेन षड्विधार्थस्य प्रबोधेन । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । इदन्तरिपोरहमि अब मन्त्रसंकेत प्रकरण का उपसंहार करते हैं— इस तरह से परिपूर्ण बोधस्वरूपता को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णों में जिस तरह से प्रतिष्ठित है, हे दुर्गि, हे देवि ! उसकी षड्विध व्याख्या तुम्हारे प्रेम के वशीभूत हो मैंने यहाँ प्रस्तुत की है । इस विषय को ठीक तरह से जान लेने पर साधक वीरों के समूह का स्वामी बन जाता है ॥८५॥ ऊपर बताई गई विधि से परिपूर्ण बोधस्वरूप परम शिव पद को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णरूपी शास्त्र से प्राप्त होता है, क्योंकि श्रीविद्या के अन्तर्गत विद्यमान वर्ण बहुत बड़े रहस्य का ज्ञान कराते हैं। इनकी यहाँ सम्प्रदाय-प्राप्त परम्परा के अनुसार व्याख्या की गई है । इस विषय को इस ग्रन्थ के पूरे द्वितीय मन्त्र- संकेत प्रकरण के प्रथम श्लोक से लेकर अन्तिम श्लोक पर्यन्त देखा जा सकता है। यह अर्थ भावार्थ, सम्प्रदायार्थ आदि के भेद से छः प्रकार का है, इसका निरूपण विस्तार से ऊपर किया जा चुका है। 'देवि' यह प्रकाशविमर्शसामरस्यमयी परा भगवती का संबोधन है। 'दुर्गि' यह उस देवी के संबोधन का विशेषण है। 'दुर्गे' के स्थान पर 'दुर्गि' पद का प्रयोग वैदिक आर्ष पद्धति से किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि बिना गुरुकृपा के इसके स्वरूप को पहचानना कठिन है । इस षड्विध अर्थ का सम्यग् ज्ञान हो जाने पर साधक वीरचक्र का स्वामी हो जाता है। इस आध्यात्मिक युद्ध-क्षेत्र में इदन्ता १. परं-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. तन्वि-ङ., तव-उ. । ३. परं-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लक्षणं-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'तत्त्व' नास्ति-क. । ६. 'विद्यार्णगम- गोचरं' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ७. वर्णाः-सार्वत्रिकः पाठः ।

२१८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः 'समराङ्गणे प्रलयप्रतिपादनपरा वीराः, तेषां चक्रं समूहः, तस्येश्वरः परशिवः। पूर्वोक्तषड्विधार्थविज्ञानसमय एव परशिवो भवेदित्यर्थः ॥८५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीपुण्यानन्दशिष्या- मृतानन्दयोगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदय- दीपिकायां मन्त्रसंकेतो नाम द्वितीयः ॥ रूपी शत्रु का अहन्ता में प्रविलय करने वाले वीर कहलाते हैं। द्वैतदृष्टि को हटाकर अद्वैत में प्रतिष्ठित होने वाले वीरों के समूह का वह स्वामी हो जाता है, स्वयं परम शिव बन जाता है। पूर्वोक्त छः प्रकार के अर्थों को जान लेने पर साधक तत्काल ही अपने परम शिव स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥८५॥ इस तरह श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री पुण्यानन्द के शिष्य अमृतानन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का दूसरा मन्त्रसंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥२॥