भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१९८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः कौलिकार्थमुपसंहरति— इत्येवं कौलिकार्थस्तु कथितो वीरवन्दिते ॥६८॥ इतिशब्दः प्रसङ्गपरिसमाप्तिपरः । एवंशब्दः पूर्वोक्तानुवादपरः । शेषं स्पष्टम् ॥६८॥ अथ क्रमप्राप्तं सर्वरहस्यार्थं वक्तुं प्रतिजानीते— तथा सर्वरहस्यार्थं कथयामि तवानघे । तथाशब्दः पूर्वोक्तार्थप्रकारपरामर्शार्थः । सर्वरहस्यार्थं पूर्वोक्तसर्वेभ्यो रहस्यम्, परप्राप्तिरूपत्वात् ॥६९॥ सर्वरहस्यार्थमेवाह— मूलाधारे तडिद्रूपे वाग्भवाकारतां गते ॥६९॥ अष्टात्रिंशत्कलायुक्तपञ्चाशद्वर्णविग्रहा । विद्या कुण्डलिनीरूपा मण्डलत्रयभेदिनी ॥७०॥ आदि स्वरूपों की भावना की जाती है, उसी तरह से शिष्य को अपने देह में भी इन सबकी भावना करनी चाहिये ॥६७-६८॥ अब कौलिकार्थ का उपसंहार करते हैं— हे वीरवन्दिते ! इस तरह से मैंने यह कौलिकार्थ तुमको सुनाया है ॥६८॥ इति शब्द यहाँ प्रस्तुत कौलिकार्थ प्रकरण की समाप्ति का सूचक है। एवं शब्द पूर्वोक्त प्रकार का निर्देशक है । बाकी पदों का अर्थ स्पष्ट है ॥६८॥ इसके उपरान्त क्रमप्राप्त सर्वरहस्यार्थ को कहा जा रहा है— हे अनघे ! अब मैं तुम्हें सर्वरहस्यार्थ को समझा रहा हूँ ॥६९॥ तथा शब्द यहाँ पूर्वोक्त षड्विध अर्थ का सूचक है। पहले छः प्रकार के अर्थों की चर्चा कर उनमें से कुछ का वर्णन कर दिया गया है। अब सर्वरहस्यार्थ का स्वरूप बताया जा रहा है। परम स्वरूप की प्राप्ति कराने वाला यह अर्थ पूर्व की अपेक्षा अधिक रहस्यमय है, अतः इसे सर्वरहस्यार्थ नाम दिया गया है ॥६९॥ अब १सर्वरहस्यार्थ का वर्णन किया जा रहा है। बिजली के समान कान्ति वाले, वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत मूला- धार में अड़तीस कलाओं से युक्त पचास वर्णों का शरीर धारण करने वाली विद्या कुण्डलिनी के रूप में विराजमान है। तीन मण्डलों का भेदन करने वाली, करोड़ों विद्युत्पुंजों के समान कान्तिवाली, कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान १. षतप्रकारा—क. ग. । २. कुल—ख. । १. यहाँ सर्वरहस्यार्थ का निरूपण ६९-७२ श्लोकों में किया गया है।