योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९७ तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः संप्रकाशते¹ । देव्याः त्रिपुरसुन्दर्याः, देहे² स्वेच्छागृहीतलीलाविग्रहे³, यथा प्रोक्तः—"एका- दशाधिकशतदेवतात्मतया पुनः । गणेशत्वं महादेव्याः" (२।५७) इत्यादिना । गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या देवतादेह⁴स्यैव गुरुत्वाद् गुरुदेहेऽपि⁵, यथा देव्या देहे गणेशत्वादिकं योजितं ⁶तथैव तद्रूपस्य⁷ गुरोरपि देहे तद् योज्यमित्यर्थः । तत्प्रसादात् स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति भावुकः⁸ ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या प्राप्तगुरुप्रसादः शिष्यस्तद्रूपो देवतारूप एव संप्रकाशत इति । अतो यथा देव्या गुरोश्च देहे गणेशत्वादिकं योजितम्, तथैव शिष्यदेहेऽपि योज- नीयमित्यर्थः ॥६७-६८॥ गुरु के देह में भी इन सबकी भावना करनी चाहिये । अन्ततः गुरु के प्रसाद से शिष्य में भी इन सब स्वरूपों की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥६७-६८॥ देवी त्रिपुरसुन्दरी के अपनी इच्छा से परिगृहीत लीलामय शरीर में जैसे एक सौ ग्यारह देवताओं के गण की स्थिति होने से उसकी गणेशता स्वीकार की गई है, उसी पद्धति से गुरु के देह में भी इन सबकी भावना करनी चाहिये । किसी अभियुक्त के “गृणीते” प्रभृति वचन के प्रमाण से गुरु की शिव से अभिन्नता बताई जा चुकी है (२।२६) । तदनुसार देवता ही गुरुदेह के रूप में अवतरित होती है । अतः जैसे देवी के देह में गणेश आदि की योजना की गई, उसी तरह से देवीस्वरूप गुरु के देह में भी इन सबकी योजना करनी चाहिये । गुरु के प्रसाद (कृपा) से ही— अपने प्रकाशमय स्वरूप के कारण यह शिवस्वरूप गुरु जिस पर प्रसन्न हो जाता है, जिस शिष्य के मस्तिष्क में अपनी कृपादृष्टि से ज्ञान का प्रकाश फैला देता है, तब ज्ञान- चक्षु के खुल जाने से वह साधक सभी बाह्य तत्त्वों का शोधन कर परमानन्द स्वरूप में लीन हो जाता है ॥ स्वयं ग्रन्थकार द्वारा रचित चिद्विलास स्तव के इस वचन के अनुसार स्वयं शिष्य भी देवता के स्वरूप में प्रकाशित हो उठता है । अतः जैसे देवी और गुरु के देह में गणेश १. संप्रजायते-क. ग. । २. 'देहे' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. गृहीतविग्रहो-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रूप-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. देहोऽपि देव्या देहवद् गणेश-ख. ने. ज. उ. । ६. 'तथैव' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ७. तद्रूपो गुरुदेहोऽपि यथेष्ट इत्यर्थः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. भावतः-ख. ग. ज. झ. उ., भावितः-ने. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)