भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

१९६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः न्याद्याः षट् । अस्या¹ विद्यायाः पञ्चदशाक्षर्या अन्त्या हृल्लेखास्तित्रः, तद्वर्जिते- द्वादशभिर्वर्णे राशित्वं भवेदित्यर्थः । ²राशयो मेषाद्या द्वादश ।।६६।। उक्तमर्थं चक्रे व्यतिदिशति— एवं विश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी । एवमुक्तरीत्या योजितगणेशादिविश्वप्रकारा महेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी चक्ररूपा देवता³ । विद्यापक्षवत् चक्रपक्षेऽपि गणेशत्वादिकं योज्यमित्यर्थः । योजनाप्रका- रस्तु—अकथादि⁴मयमध्यत्रिकोणरेखया गणेशत्वम्, नवकोणैर्ग्रहरूपत्वम्, वृत्तत्रय- चतुर्दशकोणबहिर्दशार⁵कोणैश्च नक्षत्ररूपत्वम्, अष्टकोणैर्ब्राह्म्यादियोगिनीसंख्यै- र्योगिनीत्वम्, पञ्चशक्तिचतुर्वह्निपद्मद्वयभूगृहै राशित्वम् ।।६७।। पुनश्च पूर्वोक्तलक्षणमेवार्थं गुरुशिष्ययोरप्यतिदिशति— देव्या देहे⁶ यथा प्रोक्तो गुरुदेहे⁷ तथैव हि⁸ ।। ६७ ।। धारण कर लेती है । इसी पंचदशाक्षरी विद्या की अन्तिम तीन हृल्लेखाओं को हटा देने पर विद्या में बारह अक्षर रह जाते हैं । इनसे विद्या का राशिमय स्वरूप बनता है । मेष, वृष आदि राशियां भी बारह होती हैं ।।६६।। विद्या के बाद अब चक्र में भी इसी विषय का निरूपण करते है— इसी तरह से चक्ररूपा महेश्वरी भी विश्व के गणेश आदि प्रकारों को धारण करती है ।।६७।। उक्त पद्धति से महेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी जब श्रीचक्र का स्वरूप धारण करती है, तब भी उसमें गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि सभी प्रकारों का संनिवेश किया जा सकता है । अर्थात् विद्या के पक्ष में जैसे गणेश आदि पदों की योजना बताई गई, वैसे ही चक्र के पक्ष में भी इन सबकी योजना की जा सकती है । जैसे कि अकथादिमय मध्यत्रिकोण की तीन रेखाओं के कारण चक्र की गणेशस्वरूपता, नवकोणों के कारण ग्रहरूपता, तीन वृत्त, चतुर्दश कोण और बहिर्दशार कोण को मिलाकर नक्षत्ररूपता, ब्राह्मी आदि आठ योगि- नियों की संख्या वाले अष्टकोण के कारण योगिनीस्वरूपता तथा पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और भूगृह के योग से राशिस্বরূপता सिद्ध होती है ।।६७।। अब इसी अर्थ का अतिदेश गुरु और शिष्य में भी किया जा रहा है— देवी के देह में जैसे गणेश आदि स्वरूपों की योजना की गई, उसी तरह से १. 'अस्याः' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । २. 'राशयो...सुन्दरी चक्ररूपा' नास्ति- ख. ज. उ. । ३. भवेदित्यर्थः । देवतामन्त्रविद्यापक्षवदेव, चक्रपक्षे तु-झ., देवताविद्यापक्षे । देवताचक्रपक्षे तु-ख. ज. उ. । ४. मयत्रिरेखामध्ये-क. ग. । ५. रूपेण-ख. ने. ज. उ. । ६. देहो-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । ७. देहस्त-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । ८. च-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. ।