भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकभापानुवादसहितम् १९५ कूटशब्दोऽत्राक्षरपिण्डेऽपरः । यथोक्तमभियुक्तैः— "कूटेषु त्रिषु कार्यगौरव- वशादीकारशृङ्गक्रमात्" इति । सौभाग्यविद्याक्षरपिण्डेषु बीजबिन्दुध्वनीनां च, बीजम् ईकारान्ताक्षरजातम्, बिन्दुरुक्त(१।२८)लक्षणः, ध्वनिनादः, बीजबिन्दु- ध्वनीनां चेति तृतीयार्थे छान्दसः प्रयोगः । कूटत्रयबीजानि त्रीणि, बिन्दवस्त्रयः, नादास्त्रय इति नवभिर्ग्रहात्मिका विद्येत्यर्थः । बीजत्रयशिखरवर्ति²हृल्लेखात्रयसंभूतैस्तथाक्षरैर्हंकाररेफेकारबिन्दुनादात्मकै - स्तिथिसंख्यकैः पञ्चदशभिः, अन्यैर्हृल्लेखात्रयवर्जितैर्द्वादशवर्णैः कूटत्रयावयवैरेवं³ पञ्चदशभिर्द्वादशभिश्च४ सप्तविंशतिवर्णैः सर्वैर्नक्षत्ररूपिणोत्यर्थः ॥६५॥ विद्यान्तर्भूतशक्त्याद्यैः शाक्तैः षड्भिस्तथाक्षरैः । योगिनीत्वं च विद्याया राशित्वं चान्त्यवर्जितैः ॥६६॥ विद्यायाः पञ्चदशाक्षर्या अन्तर्भूताः शक्तयो हृल्लेखास्तित्रः, तदाद्याश्च लकारास्त्रयः। ५शाक्तैरेतैः षड्भिरक्षरैर्विद्याया योगिनोत्वम् । योगिन्यश्च डाकि- कूट शब्द यहाँ अक्षरपिण्ड (समूह) का वाचक है। “कूटेषु त्रिषु” इस अभियुक्त वचन में कूट शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त है। सौभाग्यविद्या के अक्षरसमूह में ईकार पर्यन्त अक्षर बीज कहलाते हैं। बिन्दु का लक्षण पहले (१।२८) बता दिया गया है। ध्वनि नाद को कहते हैं। प्रस्तुत श्लोक में तृतीया के स्थान पर षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है। तीन कूटों के तीन बीज, तीन बिन्दु और तीन नादों को मिलाकर विद्या का नवग्रहात्मक स्वरूप परिपूर्ण होता है। इसी तरह से तीन बीजों के शीर्ष स्थान में विराजमान तीन हृल्लेखाओं के हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु और नादात्मक पन्द्रह अक्षरों और इन हृल्लेखाओं को छोड़कर तीन कूटों के बाकी बचे बारह अक्षरों को मिलाकर सत्ताईस वर्ण वाली यह महाविद्या नक्षत्ररूपिणी बन जाती है ॥६४-६५॥ पंचदशाक्षरी विद्या में अन्तर्भूत शक्ति वर्ण तीन हृल्लेखाओं और उनसे पहले स्थित तीन लकारों के कारण यह विद्या योगिनीस्वरूपिणी और अन्तिम तीन वर्णों को छोड़ देने पर राशिस্বরূপिणी बन जाती है ॥६६॥ पंचदशाक्षरी विद्या के अन्तर्भूत शक्तियाँ हैं तीन हृल्लेखाऐं और इन हृल्लेखाओं के पहले तीन लकार स्थित हैं। ये सभी वर्ण शाक्त कहलाते हैं। इन शाक्त अक्षरों के कारण यह विद्या योगिनी कहलाती है। अर्थात् डाकिनी प्रभृति छः योगिनियों का स्वरूप १. 'पिण्ड' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ह्रींकार-ख. ने. ज. । ३. 'एवं' नास्ति- क. ख. ग. ने. । ४. 'च सप्तविंशति' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. रथा-ख. ने. च. छ. ६. 'शाक्तैः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.।

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