भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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'द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९१ बात्तुषु ब्राह्मयादिभिः सेविता सर्वसमष्टिरूपत्वाद् योगिनीरूपमास्थाय राजते विश्वविग्रहा तत्तद् [ये]योगिनीरूपेण विहरति । अत्रैव वक्ष्यति— अष्टाष्टकं तु कर्तव्यं वित्तशाठ्यविवर्जितम् । त्वमेव तासां रूपेण क्रीडसे विश्वमोहिनि ॥ (३।१९४) इति ॥६०-६१॥ प्राणापानौ समानश्चोदानव्यानौ तथा पुनः । नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः ॥६२॥ जीवात्मापरमात्मा चेत्येतै¹ राशिरूपिणी । प्राणादिधनञ्जयान्ता दश वायवः, जीवात्मा उक्तलक्षणः पशुः, परमात्मा “एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” (बृ० उ० ३।७।३) इत्युपनिषदुक्तः सर्वभूतानामन्त- र्यामी । एतैर्द्वादशभी ²राशिरूपिणी ॥६२-६३॥ गणेशेत्यादिपदं विद्यापदेऽपि योजयति— अकथादित्रिपङ्क्त्यात्मै³तार्तीयादिक्रमेण सा ॥६३॥ गणेशोऽभून्महाविद्या परावागादिवाङ्मयी । देवियों से सेवित यह सर्वसमष्टिरूपिणी परा भगवती योगिनी का स्वरूप धारण कर उन उन योगिनियों के रूप में सारे विश्व को व्याप्त कर विराजमान है । भगवती के इस अष्टाष्टक स्वरूप की उपासना लोभ का परित्याग कर उदार भावना से करनी चाहिये, क्योंकि उन सभी स्वरूपों में विश्वमोहिनी परा देवी ही क्रीडा करती है । इस विषय का वर्णन आगे (३।१९४) किया जायेगा ॥६०-६१॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनंजय नामक दस प्राणों के साथ जीवात्मा और परमात्मा को मिलाकर यह परा देवी राशिरूपिणी बन जाती है ॥ प्राण से धनंजय पर्यन्त दस वायु हैं, जो इस शरीर को धारण किये रहते हैं । जीवात्मा पूर्वोक्त लक्षण वाला त्रिविध पशु है। बृहदारण्यक श्रुति के अनुसार सारी आत्माओं के अन्दर निवास करने वाला अमृतमय अन्तर्यामी ही परमात्मा है। इन बारह स्वरूपों के कारण यह परा भगवती राशिरूपिणी बन जाती है ॥६२-६३॥ गणेश आदि पदों की अब विद्या में भी संगति बैठाते हैं— परा, पश्यन्ती आदि चतुर्विध वाग्रूपिणी महाविद्या आदि, कादि और थादि के क्रम से विन्यस्त तार्तीय (शक्ति बीज) आदि तीनों बीजों के वर्णगणों की स्वामिनी होने से गणेश कही जाती है ॥६३-६४॥ १. तैर्र्वा राशिरू-ड. । २. राशिरू-ख. ने. ज. उ. । ३. त्मा-क. ग. ।