योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः अकचटतपयशाः, तेषामष्टके निविष्टा ब्रह्माण्याद्या योगिन्यः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— सर्ववाङ्मयूला या वर्गाष्टकसमावृता । विश्वोत्पत्तिक्रमान्ताष्टशक्तिप्रसृतभैरवैः ॥ शक्तिभिश्च समायुक्ता अक्षांन्ता मातृकावलिः । इति । चतुःशत्यामप्युक्तम्—"वर्गानुक्रमयोगेन यस्यां मात्रष्टकं स्थितम्" (नि० षो० १।११) इति । एभिः संयुक्ता । षडाधारेषु ¹डाकिन्यादिभिः, “मातृकास्थूलरूपत्वात् त्वगादिव्यापकत्वतः । योगिन्यः प्रकटा ज्ञेयाः” (३।११४) इति वक्ष्यमाणरीत्या त्वगादि- और श ये आठ वर्ग हैं। ब्रह्माणी प्रभृति आठ योगिनियाँ क्रमशः प्रत्येक वर्ग की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इनका वर्णन इस प्रकार किया गया है— अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त मातृका की माला सारे वाङ्मय की मूलकारण हैं। आठ वर्गों में विभक्त यह वर्णमाला आठ शक्तियों और आठ भैरवों के अधिकार में स्थित होकर सारे जगत् की उत्पत्ति करती है ॥ चतुःशती शास्त्र में भी प्रदर्शित है—"इस पूर्णाहन्तास्वरूपिणी परा भगवती में आठ वर्गों के अनुक्रम से ब्रह्माणी प्रभृति आठ माताएँ स्थित हैं"। इन सभी योगिनियों से यह देवी संयुक्त है। मूलाधार प्रभृति छः आधारों में भी डाकिनी प्रभृति का निवास है। आगे (३।११४) बताई गई पद्धति से त्वक् आदि धातुओं की अधिष्ठात्री ब्राह्मी प्रभृति
- यद्यपि यहाँ दीपिका के सभी हस्तलेखों में हाकिनी के बाद याकिनी का भी उल्लेख मिलता है, किन्तु आगे (३।३२) यह नाम नहीं दिया गया है। यद्यपि धातुओं की संख्या वहाँ सात है। आयुर्वेद के ग्रन्थ अष्टांगहृदय (सू. १।१८) में भी सात ही धातु वर्णित हैं। तदनुसार धातु देवता सात ही होनी चाहिये। भास्करराय ने भी आगे (३।३२) इसी मत को स्वीकार किया है, किन्तु प्रस्तुत प्रसंग में वे सात चक्रों की अधिष्ठात्री सात योगिनियों के प्रतिपादक मत की समालोचना करते हैं। आगे योगिनीहृदय (३।३२) में छः चक्रों का ही उल्लेख है और ऋजुविमर्शिनीकार शिवानन्द ने "डरळकसहदेवीभिर्द्वादिशार्धदेवताभिः" (पृ० १८२) यहाँ छः योगिनियों का ही उल्लेख किया है। दीपिकाकार ने प्रस्तुत प्रसंग में छः धातुओं की ही गणना की है और आगे "योगिन्यश्च डाकिन्याद्याः षट्" (२।६६) इस तरह से वे छः योगिनियों का स्पष्ट उल्लेख करते हैं। अतः याकिनी नाम की अनावश्यकता को देखते हुए हमने उसको मूल में नहीं रखा है।