भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

१७८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः १अथ क्रमप्राप्तं कौलिकार्थमाह— कौलिकं कथयिष्यामि चक्रदेवतयोरपि ॥५१॥ विद्यागुर्वात्मनामैक्यं कौलिकं कौलि२कार्थम्, कथयिष्यामि । चक्रदेवतागुरुविद्यासाधकानामैक्यानु- सन्धानं कौलिकार्थ इत्यर्थः । अक्षरार्थः ३स्फुटः ॥५१॥ तत्प्रकारमाह— तत्प्रकारः प्रदर्श्यते । “तत्प्रकारः प्रदर्श्यते” इत्यादिना “इत्येवं कौलिकार्थस्तु कथितो वीर- वन्दिते” (२।६८) इत्यन्तेन ॥ ५२ ॥ ४आदौ विद्याचक्रयोरैक्यमाह— लकारैश्चतुरस्राणि वृत्तत्रितयसंयुक्तम् ॥५२॥ सरोरुहद्वयं शाक्तेरग्नीषोमात्मकं प्रिये । हृल्लेखात्रयसम्भूतैरक्षरैर्नवसंख्यकैः ॥५३॥ अब क्रमप्राप्त १कौलिकार्थ को समझाते हैं— अब मैं कौलिकार्थ का वर्णन करूँगा । चक्र, देवता, विद्या, गुरु और स्वयं साधक की भी एकता का अनुसन्धान ही कौलिकार्थ है ॥५१॥ कौलिक शब्द यहाँ कौलिकार्थ का ज्ञापक है । इसका अब मैं वर्णन करूँगा । चक्र, देवता, गुरु, विद्या और साधक इन पाँचों में एकता का अनुसन्धान ही कौलिकार्थ है । इन सभी अक्षरों का अर्थ स्पष्ट है ॥५१॥ अब उसकी पद्धति बताते हैं— चक्र आदि में एकता का अनुसन्धान कैसे किया जाय ? अब इसकी विधि बताते हैं ॥ आगे के ५१-६८ श्लोकों में इसकी विधि बताई गई है ॥ पहले विद्या और चक्र की एकता बताई जा रही है— विद्यागत लकार बीजों से चतुरस्रों की, शाक्त (सकार) बीजों से वृत्तत्रितय और तदन्तर्गत षोडशदल तथा अष्टदल नामक पद्मों की अभिव्यक्ति होती है । हे प्रिये ! ये दोनों पद्म अग्नीषोमात्मक हैं । तीन हृल्लेखाओं में स्थित तीन- १. अनन्तरं क्रम-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. काख्यम्-झ. । ३. स्पष्टः-ने. ज. झ. । ४. तत्रादौ-ज. ।

  1. कौलिकार्थ का निरूपण यहाँ ५१ से ६८ श्लोक पर्यन्त हुआ है ।
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