भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७९ बिन्दुत्रययुतैर्जातं नवयोन्यात्मकं प्रिये । लकारैः विद्याबीजत्रयगतैः । चतुरस्राणि भूगृहाणि, "पृथिवीमण्डलं पीतं चतु- रस्त्रं सुशोभनम्" इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या भूमण्डलस्य चतुरस्ररूपत्वाद् भूतत्त्ववाचकैर्लकारैश्चतु१रस्रत्रयं जातमित्यर्थः । शाक्तैः [२सकारैः । तदुक्तं चतुः- शतीशास्त्रे—"मादनं तदधः शक्तिः" (१।१११) इति । हंसपारमेश्वरेऽप्युक्तम्— "शिवो हकार इत्युक्तः सकारः शक्तिरुच्यते" इति । विद्याबीजत्रयगतैः] सकारैर्वृत्त- ३त्रितयसंयुतं सरोरुहद्वयम् । चतुरस्रान्तरेण एकं वृत्तम्, तद्वृत्तान्तः षोडशदलं सोमात्मकं पद्मम् । तदन्तश्च द्वितीयं वृत्तम्, तदन्तश्चाष्टदलं पद्ममग्न्यात्मकम् । तदन्तश्च तृतीयं वृत्तम् । एवं वृत्त३त्रितयसंयुतमग्नीषोमात्मकं सरोरुह- द्वयम् । "जलबिम्बं सुवृत्तं च श्वेतं४ वै पद्मलाञ्छितम्" इति स्वच्छन्द- संग्रहोक्तरीत्या जलबिम्बस्य पद्मलाञ्छितवृत्तरूपत्वाज्जलतत्त्ववाचकैः सकारै- र्वृत्तत्रयसंयुतं सरोरुहद्वयं जातमित्यर्थः । बीजत्रयशिखरगतहृल्लेखात्रायावयव- तीन, अर्थात् नौ अक्षरों से, जो कि तीन बिन्दुओं से सुशोभित हैं, हे प्रिये ! नौ योनियोंवाला चक्र निष्पन्न होता है ॥५२-५४॥ विद्या के तीन बीजों में स्थित तीन लकारों से तीन चतुरस्र आकार की रेखाओं वाले भूगृह चक्र की निष्पत्ति होती है । स्वच्छन्दसंग्रह में पृथिवी-मण्डल को सुन्दर चतुरस्र आकार वाला और पीत वर्ण का बताया गया है । भूमण्डल चतुरस्र आकार वाला है, अतः पृथिवी तत्त्व के वाचक तीन लकार अक्षरों से तीन चतुरस्रों की अभिव्यक्ति होती है । [चतुःशती शास्त्र (१।१११) में शक्ति शब्द से सकार का ग्रहण किया गया है, अतः यहाँ भी शाक्त पद का अर्थ सकार हो है । हंसपारमेश्वर तन्त्र में भी शिव को हकार और शक्ति को सकार कहा गया है ।] विद्या के तीन बीजों में तीन सकार हैं । इन सकारों से तीन वृत्तों के साथ दो पद्द्मों की निष्पत्ति मानी जाती है । चतुरस्र के बाद एक घेरा है । इस वृत्त (गोलाई) में षोडशदल सोमात्मक पद्म स्थित है । इसके बाद दूसरा घेरा है । इसके भीतर अष्टदल वह्न्यात्मक पद्म विद्यमान है । इसके बाद तीसरा घेरा है । इस तरह से तीन वृत्तों से संवलित अग्नीषोमात्मक दो पद्द्मों की निष्पत्ति विद्यागत तीन सकारों से होती है । स्वच्छन्दसंग्रह में जलबिम्ब को मण्डलाकार श्वेत वर्ण और पद्म से संवलित माना गया है । तदनुसार पद्म से संयुक्त वृत्ताकार जलतत्त्व के वाचक तीन सकारों से वृत्तत्रय से संवलित दो पद्द्मों की निष्पत्ति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये । तीन बीजों के शिखर भाग में तीन हृल्लेखाएं विद्यमान हैं । इन हृल्लेखाओं के अवयवभूत अक्षर हैं हकार, रेफ और ईकार । तीन बीजों की तीन हृल्लेखाओं में मिलकर नौ अक्षर १. रस्रं जात-ख. ने. ज. ड. । २. 'सकारैः.....बीजत्रयगतैः' नास्ति-ख. ने. जं. ब. ड. । ३. त्रय-ने. ज. ड. । ४. ज्ञेयं-ख. ने. ज. ड. ।