योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७९ बिन्दुत्रययुतैर्जातं नवयोन्यात्मकं प्रिये । लकारैः विद्याबीजत्रयगतैः । चतुरस्राणि भूगृहाणि, "पृथिवीमण्डलं पीतं चतु- रस्त्रं सुशोभनम्" इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या भूमण्डलस्य चतुरस्ररूपत्वाद् भूतत्त्ववाचकैर्लकारैश्चतु१रस्रत्रयं जातमित्यर्थः । शाक्तैः [२सकारैः । तदुक्तं चतुः- शतीशास्त्रे—"मादनं तदधः शक्तिः" (१।१११) इति । हंसपारमेश्वरेऽप्युक्तम्— "शिवो हकार इत्युक्तः सकारः शक्तिरुच्यते" इति । विद्याबीजत्रयगतैः] सकारैर्वृत्त- ३त्रितयसंयुतं सरोरुहद्वयम् । चतुरस्रान्तरेण एकं वृत्तम्, तद्वृत्तान्तः षोडशदलं सोमात्मकं पद्मम् । तदन्तश्च द्वितीयं वृत्तम्, तदन्तश्चाष्टदलं पद्ममग्न्यात्मकम् । तदन्तश्च तृतीयं वृत्तम् । एवं वृत्त३त्रितयसंयुतमग्नीषोमात्मकं सरोरुह- द्वयम् । "जलबिम्बं सुवृत्तं च श्वेतं४ वै पद्मलाञ्छितम्" इति स्वच्छन्द- संग्रहोक्तरीत्या जलबिम्बस्य पद्मलाञ्छितवृत्तरूपत्वाज्जलतत्त्ववाचकैः सकारै- र्वृत्तत्रयसंयुतं सरोरुहद्वयं जातमित्यर्थः । बीजत्रयशिखरगतहृल्लेखात्रायावयव- तीन, अर्थात् नौ अक्षरों से, जो कि तीन बिन्दुओं से सुशोभित हैं, हे प्रिये ! नौ योनियोंवाला चक्र निष्पन्न होता है ॥५२-५४॥ विद्या के तीन बीजों में स्थित तीन लकारों से तीन चतुरस्र आकार की रेखाओं वाले भूगृह चक्र की निष्पत्ति होती है । स्वच्छन्दसंग्रह में पृथिवी-मण्डल को सुन्दर चतुरस्र आकार वाला और पीत वर्ण का बताया गया है । भूमण्डल चतुरस्र आकार वाला है, अतः पृथिवी तत्त्व के वाचक तीन लकार अक्षरों से तीन चतुरस्रों की अभिव्यक्ति होती है । [चतुःशती शास्त्र (१।१११) में शक्ति शब्द से सकार का ग्रहण किया गया है, अतः यहाँ भी शाक्त पद का अर्थ सकार हो है । हंसपारमेश्वर तन्त्र में भी शिव को हकार और शक्ति को सकार कहा गया है ।] विद्या के तीन बीजों में तीन सकार हैं । इन सकारों से तीन वृत्तों के साथ दो पद्द्मों की निष्पत्ति मानी जाती है । चतुरस्र के बाद एक घेरा है । इस वृत्त (गोलाई) में षोडशदल सोमात्मक पद्म स्थित है । इसके बाद दूसरा घेरा है । इसके भीतर अष्टदल वह्न्यात्मक पद्म विद्यमान है । इसके बाद तीसरा घेरा है । इस तरह से तीन वृत्तों से संवलित अग्नीषोमात्मक दो पद्द्मों की निष्पत्ति विद्यागत तीन सकारों से होती है । स्वच्छन्दसंग्रह में जलबिम्ब को मण्डलाकार श्वेत वर्ण और पद्म से संवलित माना गया है । तदनुसार पद्म से संयुक्त वृत्ताकार जलतत्त्व के वाचक तीन सकारों से वृत्तत्रय से संवलित दो पद्द्मों की निष्पत्ति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये । तीन बीजों के शिखर भाग में तीन हृल्लेखाएं विद्यमान हैं । इन हृल्लेखाओं के अवयवभूत अक्षर हैं हकार, रेफ और ईकार । तीन बीजों की तीन हृल्लेखाओं में मिलकर नौ अक्षर १. रस्रं जात-ख. ने. ज. ड. । २. 'सकारैः.....बीजत्रयगतैः' नास्ति-ख. ने. जं. ब. ड. । ३. त्रय-ने. ज. ड. । ४. ज्ञेयं-ख. ने. ज. ड. ।