योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः भूतैरक्षरैर्हंकाररेफेकाराख्यैर्बिन्दुत्रययुतैर्नवसंख्यात्मकैर्नवयोन्यात्मकं चक्रं जात- मित्यर्थः ॥५२-५४॥ ननु पद्मद्वयानन्तरं चतुर्दशारदशारद्वयात्मकचक्र१त्रयस्य कथने युक्ते २किमिति तदुल्लङ्घ्य नवयोनिचक्रं ३कथितम् ? उच्यते—नवयोनिचक्रस्योपरिष्टात् प्रस्तारे कृते ४सति तिसृभिः शक्तिभिर्वह्निभिश्च द्विदशचतुर्दशकोणात्मकं चक्रत्रयं जातम्, अतो नवयोनिचक्रानन्तरमेतच्चक्रत्रयं जायत इत्येतन्मनसि निधायाह— मण्डलत्रययुक्तं तु चक्रं शक्त्यनलात्मकम् ॥५४॥ व्योमबीजत्रयेणैव प्रमातृत्रयान्वितम् । इच्छाज्ञानक्रियारूपं५मदनत्रयसंयुतम् ॥५५॥ सदाशिवासनं देवि महाबिन्दुमयं परम् । इत्थं ६मन्त्रात्मकं चक्रं मण्डलत्रययुक्तं तु ७वृत्तत्रयान्तर्गतशक्त्यनलात्मकं चक्रम् । नवयोनिचक्रस्यो- परिष्टात् प्रस्तारे कृते सति तिसृभिः शक्तिभिरनलैश्च त्रिभिर्निष्पन्नत्वा८च्चतु- हो जाते हैं। तीन बिन्दुओं से संयुक्त इन नौ संख्या के अक्षरों में नवयोनिमय चक्र की निष्पत्ति माननी चाहिये ॥५२-५४॥ यहाँ शंका उठती है कि दो पद्मों के बाद चतुर्दशार, बाह्यदशार और अन्तर्दशार चक्रों की निष्पत्ति होती है, उन्हीं का वर्णन यहाँ पहले होना चाहिये। ऐसा न कर नवयोनि- चक्र का वर्णन कैसे कर दिया गया ? इसका समाधान यह है कि नवयोनिचक्र का जब आगे विस्तार होता है, तो उसी में तीन शक्तियों और तीन वह्नियों के मिलने से दो दशारचक्रों तथा चतुर्दशार चक्र की निष्पत्ति होती है, अतः ये तीन चक्र नवयोनिचक्र के बाद ही निष्पन्न होते हैं, इस अभिप्राय की सूचना देने के लिये यहाँ ऐसा कहा गया है— शक्तित्रिकोण और वह्नित्रिकोण से निष्पन्न तीन मण्डलों (वृत्तों) से अलंकृत चक्र की उत्पत्ति विद्यागत तीन व्योमबीजों (हकार) से होती है। तीन प्रमा- ताओं से संवलित सदाशिवासन की उत्पत्ति हे देवि ! इच्छा, ज्ञान और क्रिया- रूप तीन ककारों से और महाबिन्दु से होती है। इस तरह से यह पूरा चक्र मन्त्रात्मक है ॥५४-५६॥ शक्तित्रिकोण और वह्नित्रिकोण से बना चक्र तीन वृत्तों के अन्तर्गत है, अर्थात् नवयोनिचक्र का जब आगे विस्तार करेंगे तो तीन शक्तित्रिकोणों और तीन वह्नि- १. त्रितयस्य-क. ग. । २. 'किमिति' नास्ति-क. ग. । ३. कथं कथ्यत इति चेत्- क. ग. । ४. 'सति' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रूपं-ङ. ज. झ उ. । ६. मन्त्रमयं-ख. ने. च. छ. झ. । ७. 'वृत्त''''चक्रम्' नास्ति-ख. ने. ज. ब. उ. । ८. -त्वाद्विदशचतु-क.