योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८१ दंशाररादिचक्रत्रयं व्योमबीजत्रयेणैव हकारत्रयेणैव, हकारस्य व्योमवाचकत्वात् । हृल्लेखात्रये हकारत्रयं गतम्, शिष्टेन हकारत्रयेण चतुर्दशारादिचक्रत्रयं जात- मित्यर्थः । प्रमातारस्त्रिविधा¹ उक्तरूपा अशुद्धशुद्धमिश्रात्मानः, तेषां त्रयेणान्वितम् । पश्चात् शिवानुग्रहतो मलकर्मविपाकात् पृथिव्यप्तेजोवाय्वधिपतीनां² तेषां त्रयेण व्यष्ट्या³ समष्ट्या चेदमन्वितं प्राप्तम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— मलादीनामपाके तु सामान्यानुग्रहो भवेत् । आधिकारिकमैश्वर्यं शिवानुग्रहमात्रतः ॥ पशवस्त्रप्रकारास्तु प्राप्नुयुः परमेश्वरि । ये⁴ पक्वमलकर्माणस्तान् किञ्चिदनुगृह्य च ॥ जलतत्त्वादितत्त्वानां मध्ये लोकेश्वरास्त्रिधा । इति । इच्छाज्ञानक्रियाशक्तिप्रधानप्रमातृत्रयरूपाणां त्रयाणां मादनानां ककाराणां त्रयेण संयुक्तं संमिश्रितं सदाशिवासनं पृथिव्यादिवायुतत्त्वान्तचतुस्तत्त्वाधिपतिभि- त्रिकोणों के मिलने से तीन चक्रों की निष्पत्ति होती है। चतुर्दशार, बाह्यदशार और अन्तर्दशार नामक इन तीन चक्रों की उत्पत्ति तीन व्योमबीजों (हकारों) से होगी। हकार को व्योम (आकाश) का वाचक माना जाता है। तीन हृल्लेखाओं के हकारों के अतिरिक्त विद्यागत बीजों में भी तीन हकार हैं। हृल्लेखागत बीजों से नवयोनि चक्र की निष्पत्ति ऊपर बता दी गई है। अब बचे हुए इन तीन हकारों से चतुर्दशार आदि तीन चक्रों की निष्पत्ति यहाँ बताई गई है। अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रमाताओं का वर्णन पहले (२।४३) किया जा चुका है। इन तीनों से यह अन्वित (संयुक्त) है। इन तीनों की व्यष्टि और समष्टि को लेकर इनके चार रूप हो जाते हैं। शिव की कृपादृष्टि का उन्मीलन होने के बाद मल और कर्म का परिपाक हो जाने पर ये ही पृथिवी, जल, तेज और वायु तत्त्वों के अधि- पति (स्वामी) हो जाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में यह विषय इस तरह से वर्णित है— मल आदि का परिपाक न होने पर ईश्वर का अनुग्रह परिपूर्ण नहीं होता। हे परमेश्वरि ! तीनों प्रकार के पशु शिव का अनुग्रह होने पर ही आधिकारिक ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकते हैं। जिनके मल और कर्म परिपक्व हो गये हैं, ऐसे उक्त पशुओं को ईश्वर जल आदि तत्त्वों के मध्य में त्रिविध लोकेश्वरों के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं ॥ इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति-प्रधान तीन प्रमाताओं को लक्षित करने वाले तीन मादन (ककार) अक्षरों से संयुक्त सदाशिवासन पृथिवी से वायु तत्त्व पर्यन्त चार तत्त्वों १. त्रिधा-ख. ने. ज. उ. । २. पतयः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. व्यष्टिसमष्टित्यां ४. सुस्नात इति प्राक्तन पाठः