योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ब्रह्माविष्णुरुद्रेश्वरैश्चतुर्भिः पादरूपेण धृतं पञ्चमभूताकाशाधिपतिसदाशिव- रूपपञ्चमयासनम् । महाबिन्दुमयं परम्, परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे । प्रतिरुचिरुचिरे कुड्ये चित्तमये निविशते महाबिन्दुः ॥ (श्लो० ४) इति कामकलाविलासोक्तरीत्या परशिवप्रतिबिम्बमहाबिन्दात्मकं परमुत्कृष्टम्, शिवशक्त्योरधिवासयोग्यत्वात् । तदुक्तं ज्ञानदीपविमर्शिन्याम्—ओड्याणपीठमध्ये कदम्बवनान्तः श्रीमञ्चचतुष्पादके लं¹ पृथिव्यधिपतये ब्रह्मणे नमः, वं अपामधि- पतये विष्णवे नमः, रं तेजोऽधिपतये रुद्राय नमः, यं वाय्वधिपतये ईश्वराय नमः । एतानभ्यर्च्य हं आकाशाधिपतये पञ्चवक्त्रसदाशिवमहाप्रेतासनाय नम इति ²श्रीमञ्चाकारं सदाशिवमभ्यर्च्य" इति । इत्थमुक्तप्रकारेण मन्त्रात्मकं चक्रं सौभाग्यविद्यामयमित्यर्थः ॥५४-५६॥ के अधिपति ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वररूपी चार पायों पर रखा हुआ है। पंचम भूत आकाश के अधिपति सदाशिव से यह आसन बना हुआ है। यह उत्कृष्ट आसन महा- बिन्दुमयं है। इस महाबिन्दु के स्वरूप का वर्णन करने वाले 'परशिव' आदि श्लोक की व्याख्या पहले (१।११) की जा चुकी है। परशिव का प्रतिबिम्ब यह महाबिन्दु परम श्रेष्ठ आसन है, क्योंकि शिव और शक्ति के निवास का यह उत्कृष्ट स्थान है। ¹ज्ञानदीप- विमर्शिनी में इसका वर्णन मिलता है—"ओड्याण पीठ के मध्य में कदम्ब वन में स्थित चार पायों वाले श्रीमंच में लं बीज से पृथिवीतत्त्व के अधिपति ब्रह्मा को, वं बीज से जलतत्त्व के अधिपति विष्णु को, रं बीज से तेजस्तत्त्व के अधिपति रुद्र को, यं बीज से वायुतत्त्व के अधिपति ईश्वर को नमनपूर्वक प्रतिष्ठित करना चाहिये। इनकी पूजा करने के बाद हं बीज से आकाशतत्त्व के अधिपति पाँच मुँह वाले सदाशिव नामक महाप्रेतासन को नमन कर वहाँ श्रीमंचाकार सदाशिव की पूजा करनी चाहिये"। इस तरह से चक्र की सौभाग्यविद्या से अभिन्नता होने से चक्र की मन्त्रात्मकता स्पष्ट है ॥५४-५६॥ १. लां वां रां यां हां-इत्येवं पाठः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'श्रीमञ्चा'''' मभ्यर्च्य' इति नास्ति-ख. ज. उ. ।
- ज्ञानदीपविमर्शिनी नि० षो० की अर्थरत्नावली टीका के कर्त्ता विद्यानन्द की कृति है। अर्थरत्नावली के बाद उन्होंने इस पद्धति ग्रन्थ की रचना की है। इस ग्रन्थ की विशे- षता यह है कि इसके प्रत्येक प्रकरण में अपने प्रतिपाद्य विषय के आन्तर और बाह्य स्वरूपों का एक साथ वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ की बड़ोदा, त्रिवेन्द्रम् तथा उदयपुर से प्राप्त मातृकाएँ हमारे पास हैं। इन तीनों मातृकाओं में संक्षेप और विस्तार की दृष्टि से परस्पर अत्यन्त भिन्नता है। नेपाल में उपलब्ध अन्य दो मातृकाएँ हमें फ्रांस के तन्त्रशास्त्र के विद्वान् डॉ० आन्द्रे पाटु के सहयोग से मिली हैं। बड़ोदा की मातृका इन सबमें प्राचीन तथा संक्षिप्त है। उसमें उक्त उद्धरण हमें देखने को नहीं मिला।