योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८३ इदानीं चक्रेण देवताया ऐक्यमाह— देवतायाः परं वपुः ॥५६॥ चक्रं देवतायाः परम् अन्यद् वपुः । "ततः पद्मनिभां देवीम्" (नि० षो० १।१३०) इत्यत्र देवतायाः करचरणादिमद् वपुरुक्तम् । तदेव त्रिकोणादिभूगृहान्त- श्रीचक्रपदनिवास्यावरणदेवतारूपेणावयवशो विभज्य बैन्दवनिवासिनी स्वसं- विद्देवता श्रीचक्रवपुषा स्थितेत्यर्थः । तदुक्तमत्रैव— १एवंरूपं परं तेजः श्रीचक्रवपुषा स्थितम् । तदीयशक्तिनिकरस्फुरदूर्भिसमावृतम् ॥ (१।५५) इति ॥५६॥ एतदेवोपपादयति— एकादशाधिकशतदेवतात्मतया पुनः । २एकादशोत्तरशतदेवतास्त्रिकोणाग्रदक्षवामकोणेषु कामेश्वर्यादिकास्तिस्रः, तद्बहिरष्टकोणान्तराले त्रिकोणं परितश्चतुर्दिक्षु अष्टौ कामेश्वरकामेश्वर्यायुध- अब चक्र से देवता की एकता बताई जा रही है— यह चक्र देवता का दूसरा शरीर है ॥५६॥ श्रीचक्र देवता (महात्रिपुरसुन्दरी) का दूसरा स्वरूप है। नित्याषोडशिकार्णव (१।१३०-१४९) में देवता परा भगवती का हाथ-पैर वाला स्वरूप वर्णित है। अपने उसी स्वरूप को त्रिकोण से भूगृह पर्यन्त श्रीचक्र के विभिन्न स्थानों में निवास करने वाले आवरण देवताओं के रूप में विभक्त कर बैन्दवचक्र में निवास करने वाली यह स्वसंवि- त्स्वरूपिणी महात्रिपुरसुन्दरी श्रीचक्रमय एक दूसरा ही अनोखा स्वरूप धारण कर लेती है। भगवती के इस श्रीचक्र रूपी देह का वर्णन पहले (१।४९-५५) हो चुका है। यहाँ उद्धृत श्लोक का अर्थ वहीं कर दिया गया है ॥५६॥ अब इसी विषय को समझा रहे हैं— फिर यह श्रीचक्र एक सौ ग्यारह (आवरण) देवताओं का भी स्वरूप है, परा भगवती के अतिरिक्त इनका भी यहाँ निवास है ॥५७॥ इस चक्र में एक सौ ग्यारह देवता निवास करते हैं। जैसे कि त्रिकोण के अग्र, दक्ष और वाम कोणों में १कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी निवास करती हैं। उसके बाहर अष्टकोण के अन्तराल में त्रिकोण के चारों तरफ चार दिशाओं में कामेश्वर और १. श्रीचक्रपरव-क. ग. ने. झ. उ. । २. इतः पूर्वम्-‘स्वेच्छा, इच्छा, आश्रया’ इत्यादिकं श्लोकत्रयम् (१।५०, ५३-५४) अपि दृश्यते-क. । ३. एता एका-ख. ने. झ. उ. । १. नि० षो० (१।१५३-१७६) में संहार क्रम से अणिमा आदि दस, ब्राह्मी आदि आठ, कामाकर्षिणी आदि सोलह, अनंगकुसुमा आदि आठ, सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह,