योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 234, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः देवताः, अष्टकोणेऽष्टौ वशिन्याद्याः, अष्टकोणान्तराले षडङ्गदेवताः, अन्तर्दशारे सर्वज्ञाद्या दश, द्वितीयदशारे सर्वसिद्धिप्रदाद्या दश, चतुर्दशारे सर्वसंक्षोभिण्या- द्याश्चतुर्दश, अष्टदलेऽष्टानङ्गकुसुमाद्याः, षोडशदले कामाकर्षिण्याद्याः षोडश, अन्तश्चतुरस्रे मुद्रादेवता दश, मध्यचतुरस्रे ब्राह्म्याद्या अष्टौ, बाह्यचतुरस्रेऽ- णिमाद्या दश। एवमेकादशोत्तरशतदेवतात्मतया तासामाधारभूता ^२श्रीचक्र- रूपिणी देवतेत्यर्थः ॥ ५७ ॥ नन्वयं कौलिकार्थो वामकेश्वरतन्त्रे कुत्र सूचित इत्याशङ्कां परिहरन् देवता- विद्याचक्रगुरुशिष्याणामैक्यार्थमेव “गणेश” (नि० षो० १।१) इत्यत्र सूचितं कौलि- कार्थं विवृणोति— कामेश्वरी के आठ आयुध देवताओं की स्थिति है । अष्टकोण में वशिनी आदि आठ देवियाँ, अष्टकोण के अन्तराल में छः अंगदेवता, अन्तर्दशार में सर्वज्ञा आदि दस देवियाँ, द्वितीय दशार में सर्वसिद्धिप्रदा आदि दस, चतुर्दशार में सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह, अष्टदल में अनङ्गकुसुमा आदि आठ, षोडशदल में कामाकर्षिणी आदि सोलह, अन्तश्चतुरस्र में दस मुद्रादेवता, मध्यचतुरस्र में ब्राह्मी प्रभृति आठ और बाह्यचतुरस्र में अणिमा आदि दस देवियां निवास करती हैं। इस तरह से सब मिल कर एक सौ ग्यारह आवरण देवताओं का इसमें निवास होने से उनका आधारभूत यह श्रीचक्र देवतामय ही है ॥५७॥ यहाँ शंका उठती है कि ^१वामकेश्वर तन्त्र में इस कौलिकार्थ को कहाँ सूचित किया गया है, इस शंका के परिहार के लिये कहते हैं कि वहाँ “गणेशग्रहनक्षत्र०” (१।१) प्रभृति श्लोक में इस विषय की सूचना दे दी गई थी कि देवता, विद्या, चक्र, गुरु और शिष्य में एकता की भावना करना ही कौलिकार्थ है। इसी विषय को आगे स्पष्ट किया जा रहा है— १. सिद्धद्याद्या-ख. ने. ज. उ. । २. श्रीचक्रदेवते-ख. ने. ज. झ. उ. । सर्वसिद्धिप्रदा आदि दस, सर्वज्ञा आदि दस आवरण देवताओं के नाम दिये गये हैं। वशिनी आदि आठ देवताओं के नाम बीजोद्धारपूर्वक वहीं (१।७७-९५) मिलते हैं। आयुध देवता वहाँ (१।१७९-१८०) चार ही हैं। अन्त में (१।१८२) त्रिकोण स्थित तीन आवरण देवताओं तथा मध्यबिन्दु स्थित मूलदेवता का नाम है। आठ आयुध देवताओं का उल्लेख योगिनीहृदय (१।५४) में है। यहीं (३।४८-४९) अन्तश्चतुरस्र स्थित दस मुद्रादेवताओं की चर्चा है। इन सभी आवरण देवताओं का उल्लेख पूजासंकेत में अनेक बार हुआ है। छः अंगदेवताओं की चर्चा ऋजुविमर्शिनी (पृ० १३२) तथा सुभगोदय (पृ० २८६) में मिलती हैं। १. दीपिकाकार ने यहाँ भी वामकेश्वर तन्त्र का मूलतः उल्लेख किया है।