भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८५ गणेशत्वं महादेव्याः ससोमरविपावकैः ॥५७॥ इच्छाज्ञानक्रियाभिश्च गुणत्रययुतैः पुनः । ग्रहरूपा च सा देवी १पुनःशब्दादेकादशाधिकशतदेवतात्मतयाऽस्या गणेशत्वम् । गणेशत्वं महादेव्या इत्यनेनापि काकाक्षि२न्यायवदन्वयः । पूर्वोक्तत्रिकोणादिचतुरस्रान्तश्रीचक्रपद- निवास्येकादशाधिकशतदेवतात्मतया ३महादेव्यास्तु तत्संख्याकदेवता४समुदायो गणः । देव्याः सोमरविपावका नेत्ररूपेण स्थिताः, इच्छा शिरःप्रदेशस्था ज्ञाना च तदधोगता । क्रिया पादगता ह्यस्याः इति संकेतपद्धत्युक्तरीत्या इच्छादिका मूर्धाद्यवयवाः, गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि, एवं स्वावयवभूतैस्तैर्नवभिर्ग्रहरूपा च सा देवी ॥ ५७-५८ ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियैरपि ॥ ५८ ॥ तदर्थैरेव देवेशि करणैरन्तरैः पुनः । देवताओं के १११ संख्या वाले गण की स्वामिनी होने से महादेवी भगवती महात्रिपुरसुन्दरी यहाँ गणेश के नाम से अभिहित है। उस भगवती के सोम, रवि और पावक (अग्नि) नेत्र रूप में हैं। इच्छा, ज्ञान और क्रिया तथा सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों को भी मिलाने पर यह देवी ग्रहरूपा भी कही जाती है ॥५७-५८॥ 'पुनः शब्द का यहाँ प्रयोग हुआ है। इसका अभिप्राय यह है कि वही परा भगवती फिर एकसौ ग्यारह देवताओं के गण की स्वामिनी होने से गणेश भी कहलाती है और ग्रहरूपा भी हो जाती है । महादेवी पद का काकाक्षिन्याय से गणेश और ग्रहरूपा दोनों से अन्वय होता है । पूर्वोक्त त्रिकोण से चतुरस्र पर्यन्त श्रीचक्र के अवयवों में निवास करने वाली १११ देवताओं के रूप में यह महादेवी ही स्थित है । अतः यह उस देवता- समुदाय की स्वामिनी है । इस देवी के चन्द्र, सूर्य और अग्नि नेत्र के रूप में स्थित हैं। संकेतपद्धति के अनुसार इस देवी का इच्छाशक्ति से शिरोभाग, ज्ञानशक्ति से मध्यभाग और क्रियाशक्ति से अधोभाग बना है और सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण इसमें स्थित हैं । इस प्रकार अपने इन नौ अवयवों के कारण यह देवी नवग्रहात्मिका भी है ॥५७-५८॥ हे देवेशि ! पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, १० इनके अर्थ, चतुर्विध अन्तः- १. 'पुनः....गणेशत्वं....देवतात्मतया' नास्ति-ख. । २. न्यायतः-क. ग. ज. । ३. महादेव्यास्तु नास्ति-क. ग. । ४. समूहो-ग. ज. झ. ।

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