योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः प्रकृत्या च गुणेनापि पुंस्त्वबन्धेन^१ चात्मना ॥ ५९ ॥ नक्षत्रविग्रहा जाता ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि बोधकरणानि, कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थानि, तेषामर्थाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा वचनादानगमनविसर्गा- नन्दाश्च, करणानि मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तान्यान्तराणि च, प्रकृतिः गुणसाम्य- मव्यक्तम्, गुणो गुणतत्त्वं सुखदुःखमोहानां मूलम्, पुंस्त्वबन्ध आत्मा पुरुषतत्त्वम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— एभिर्मायादिभिः षड्भिः परिपूर्णः पशुः पुमान् । भुङ्क्ते भोगान् यथा देवि तथा पुरुषसंज्ञकः ॥ सैव मायाऽथ भोगार्थं पशोरव्यक्तसंज्ञकम् । मूलप्रकृतिर्विश्वस्य गुणत्रितयरूपकम् ॥ अभूत् तस्यां प्रकृत्यां तु गुणतत्त्वं बभूव ह । तद् दुःखसुखमोहानां मूलं सत्त्वं रजस्तमः ॥ करण, प्रकृति, गुण और पुरुष तत्त्व इन सत्ताईस पदार्थों के समवाय के कारण यह देवी नक्षत्रों का स्वरूप भी धारण कर लेती है ॥५८-६०॥ श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा और घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ; शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वचन, आदान, गमन, विसर्ग और आनन्द ये दस विषय; मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त ये चार अन्तःकरण, प्रकृति अर्थात् गुणों की साम्यस्वरूपिणी अव्यक्त अवस्था, सुख-दुःख-मोहात्मक गुणतत्त्व और पुरुष को बाँधने वाला आत्मा पुरुषतत्त्व है । इन २७ तत्त्वों का वर्णन स्वच्छन्द- संग्रह में इस तरह से किया गया है— इन माया आदि छः^१ कंचुकों से आवृत होने पर पुरुष का पशुस्वरूप परिपूर्ण हो जाता है । हे देवि ! पुरुषतत्त्व के रूप में स्थित होकर यह नाना प्रकार के भोगों को भोगता है । वही मायातत्त्व पशु के भोग का संपादन करने के लिये अव्यक्त नामक तत्त्व का रूप धारण कर लेता है । यह अव्यक्त तत्त्व विश्व की मूलप्रकृति है । तीनों गुण इसमें छिपे हुए हैं, साम्यावस्था में विद्यमान हैं । इस प्रकृति से ^२गुणतत्त्व की सृष्टि १. नाथ-ख. च. छ. ज. झ. । १. पाँच अथवा छः कंचुकों की चर्चा हम पहले पृ० १४७ की टिप्पणी में कर चुके हैं । २. प्रकृति से गुणतत्त्व की उत्पत्ति प्रायः सभी शैव शास्त्रों में वर्णित है । साथ ही वहाँ यह भी बताया गया है कि ये तीनों गुण प्रकृति से अभिन्न हैं (देखिये—१।१६२-१६३)