भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८७ बुद्धिव्यापारनिश्चयरूपं व्यक्तगुणात्मकम् । १विषयाध्यवसायात्मा बुद्धिः स्याद् गुणतत्त्वतः ॥ गुणत्रयानुसारेण त्रिधा कर्मानुसारतः । तया बुद्ध्या समु२द्भूतोऽहङ्कारस्त्रिप्रकारकः ॥ सर्वजीवनसंरम्भरूपेण कमलासने३ । ४विषयास्तस्य भेदाश्च त्रिधा कर्मानुसारतः ॥ होती है। सुख, दुःख और मोह के कारणभूत सत्त्व, रज और तम नामक गुणों की अभिव्यक्ति इसी से होती है। यह गुणतत्त्व बुद्धि के सभी व्यापारों से युक्त है तथा इसमें सभी गुण व्यक्त अवस्था में रहते हैं। गुणतत्त्व से विषयों का निश्चय करनेवाली बुद्धि अभिव्यक्त होती है। तीन गुणों और कर्मों के अनुसार इस बुद्धि से त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति होती है। हे कमलासने ! यह अहंकार ही सभी प्राणियों में जीवन और १संरम्भ का संचार करता है। कर्म के अनुसार जब इसके त्रिविध भेद और विषय हो १. विषयात्मा तु बुद्धिः स्याद् गुणास्तत्र प्रयोजकाः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. त्पन्नो-ज. । ३. सनम्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. विशतस्तत्र भेदेन-ख. ने. ज. झ. उ. । (वि० १०।२०-२१), तत्त्वसंग्रह (श्लो० ९), भोगकारिका (श्लो० ८७-८८), तत्त्वप्रकाश (श्लो० २३-२४, ५१)। मतंगपारमेश्वर, विद्यापाद के पन्द्रहवें पटल में अव्यक्त का तथा १६वें में गुणतत्त्व का निरूपण है। १. मृगेन्द्रागम (वि० ११।२०) में बुद्धितत्त्व से गर्व (अहंकार) की उत्पत्ति बताकर कहा गया है कि इसी के व्यापार से शरीर स्थित पंचविध प्राण अपने अपने कार्यों में प्रवृत्त होते हैं। गर्व की इस वृत्ति को व्याख्याकार ने संरम्भ नाम दिया है। तत्त्वसंग्रह (श्लो० ६) और भोगकारिका (श्लो० ३३) में भी इसका यही नाम है। भोगकारिका- कार का कहना है कि शरीरधारण (जीवन) के लिये आवश्यक प्राण आदि पाँच वायुओं की प्रवर्तक अहंकार की संरम्भ नामक वृत्ति है। टीकाकार स्पष्ट करते हैं कि अहंकार के इस संरम्भ नामक प्रयत्न से ही शरीर स्थित प्राण आदि पाँच वायु तथा कालोत्तरागम (१०।५-१३) में वर्णित नाग आदि अन्य पाँच वायु सभी प्राणियों के शरीर को धारण करने में समर्थ होते हैं। इनके नाम योगिनीहृदय (२।६२) में भी उल्लिखित हैं। तत्त्वप्रकाशकार (श्लो० ५३) ने अहंकार के जीवन, संरम्भ और गर्व नामक तीन भेद किये हैं और टीकाकारों ने संरम्भ का अर्थ पाँच प्राणों का प्रवर्तक प्रयत्न किया है। प्रस्तुत उद्धरण में जीवन और संरम्भ पदों का प्रयोग इन्हीं अर्थों में किया गया है।