योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः सोऽयं तैजसवैकारिभौतिकाख्यास्वरूपतः । विकाराश्च¹ स्व(स)भेदाश्च¹ वागादीन्द्रियसंहतौ² ॥ वाचकार्थाः³ स्युरीशानि तत्र तत्र ⁴नियन्तृतः । प्राप्नोति ⁵सात्त्विकाद्याभिरवस्थाभिरात्मजे ॥ संकल्पकारकं⁶ ⁷चेच्छारूपं तैजसतो मनः । जातं वैकार्यवस्थाभिर्ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि च ॥ ⁸भूततन्मात्रशब्दस्पर्शरूपरसगन्धकाः । जाता ⁹वागादीन्द्रियाणां व्यापाराः परमेश्वरि ॥ श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनाघ्राणान्येतानि पञ्च च। बुद्धीन्द्रियाणि¹⁰ व्यापारास्तेषामेकैकशः क्रमात् ॥ जाते हैं, तब यह ¹तैजस, वैकारिक और भौतिक अहंकार ने नाम से प्रख्यात होता है। सभी भेदों और उपभेदों के साथ सोलह विकारों की, वाचक अर्थों के साथ ²वाक् प्रभृति इन्द्रियों की उत्पत्ति इसी से होती है। हे पार्वति ! इन विषयों से नियन्त्रित होकर ही वह सात्त्विक आदि अवस्थाओं को प्राप्त करता है। तैजस (सात्त्विक) अहंकार से संकल्प के कारण इच्छारूप मन की और वैकारिक (राजस) भेद से ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। हे परमेश्वरि ! भूतादि (तामस) अहंकार से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है, जिनसे कि वाक् प्रभृति इन्द्रियों के विषय विकसित होते हैं। श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण ये पाँच बुद्धीन्द्रियाँ हैं। हे प्रिये ! १. च्च-ख. ग. ज. उ. । २. संभवैः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. वाचिकाद्याः स्यु- रेतानि-क. ग. । ४. नियन्त्रिभिः-क. ख. ग. ने. झ. उ. । ५. सा तु विद्याभिः-ख. झ. उ. । ६. कारणं वष्मं-ख. ज. झ. ब. उ. । ७. 'चेच्छा''''स्याभिः' नास्ति-ख. ज. झ. ब. उ. । ८. भूतादीन्यथ तन्मात्राः शब्दस्पर्शरूपरसाः । गन्धाद्याः पञ्चका जाताः । देहेन्द्रियाणां व्यापाराः प्रोच्यन्ते परमेश्वरि-क. । ९. दृगा-ज. झ. । १०. याणां-ज. ।
- तैजस, वैकारिक और भौतिक शब्दों का प्रयोग ऊपर उद्धृत सभी ग्रन्थों में क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस के अर्थ में किया है, किन्तु सांख्यकारिकाकार (श्लो० २५) सात्त्विक के लिये वैकृत और राजस के लिये तैजस शब्द का प्रयोग करते हैं। मतंगपारमेश्वर (वि० १८।४३-४४) में सांख्यकारिका का अनुसरण किया गया है।
- मतंगपारमेश्वर में अहंकार का निरूपण करते समय (वि० १८।१२-१५) उसकी ज्ञानसत्ता और क्रियासत्ता का विवरण दिया है। तदनुसार ज्ञानसत्ता का बुद्धी- न्द्रियों से तथा क्रियासत्ता का वागादि इन्द्रियों से सम्बन्ध है। इसी विषय की यहाँ चर्चा की गई लगती है। यहाँ भी अहंकार के सात्त्विक आदि भेदों के निरूपण से पहले इस विषय की चर्चा है।