योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५३ ननु हकारादिवर्णा आकाशादिभूतवाचका इत्युक्तम्, कथं शब्दादिपञ्चभूत- गुणानामपि वाचका इत्युच्यन्त इत्यत आह— भवेद् गुणवतां बीजं गुणानामपि वाचकम् ॥३७॥ गुणवताम्, गुणाः शब्दादयः पञ्च, तद्वतामाकाशादीनां पञ्चभूतानां बीजम् । जातावेकवचनम् । अत्र विद्यायां हकारादीनि पञ्चभूताक्षराणि व्यञ्जनानि । अत्रै- वोक्तम्—"हकाराद् व्योम संभूतम्" (२।२९) इत्यादिना १ । अतो बीजान्युच्यन्ते । ककारादिक्षकारान्तानां व्यञ्जनानां बीजत्वमुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— षण्ढवर्जंमहिमद्युतेः २स्वरा बिन्दुसर्गंरहिताश्च ये शुचेः । सर्व एव शशिनः कलाः३ शिवे योनयो विधृतबोजतः स्वराः४ ॥ इति । (श्लो० ४०) फिर प्रश्न उठता है कि पहले यह बताया गया था कि विद्यागत हकार आदि वर्ण आकाश आदि भूतों के वाचक हैं, अब कहा जा रहा है कि ये वर्ण भूतगत शब्द आदि गुणों के भी वाचक हैं । यह कैसे होगा ? इसी का उत्तर देते हैं— गुणवान् आकाश आदि के वाचक बीजभूत हकार आदि अक्षर आकाशादि- गत गुणों के भी वाचक हो जाते हैं ॥३७॥ यहाँ एकवचन में प्रयुक्त बीज शब्द बीज जाति का वाचक है । विद्या में विद्यमान बीजाक्षर शब्द आदि गुणों से युक्त आकाश आदि के तो वाचक हैं ही, वे आकाश आदि में विद्यमान गुणों के भी वाचक हो जाते हैं । यहाँ विद्या में पाँच भूतों के वाचक हकार आदि अक्षर व्यंजन हैं । पहले (२।२९) ही इस विषय का वर्णन किया जा चुका है । हकार आदि से आकाश आदि की इस उत्पत्ति के कारण ही इनको 'बीज' कहा गया है । ककार से क्षकार पर्यन्त व्यंजनों को चिद्गगनचन्द्रिका में 'बीज' नाम दिया गया है । जैसे कि— षण्ढ (ऋ ॠ ऌ ॡ) स्वरों को छोड़कर बाकी बारह स्वर सूर्य की बारह कलाओं के, बिन्दु और विसर्ग को भी छोड़कर बाकी दस स्वर अग्नि की १० कलाओं के और सभी १. इत्यादि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. कला-ख. ने. ज. उ. । ३. कलाश्च ये योनयो-ख. ज. झ. उ. । ४. बीजकास्तदा-ख. ने. ज. उ. ।