योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तेषां शब्दानां कारणरूपेण स्थितः कारणात्मना स्थितो ध्वनिनादः शब्दानां कारणम्। तदुक्तमभियुक्तैः— पिण्डो वाचकविस्तरस्य महतः संस्कारशेषा¹ स्थिति- र्नादोऽसौ तव देवि मूर्ध्नि समनासीमानमुल्लङ्घयन्। ²घण्टाक्वाण इव क्रमेण विरम³न्नन्यामणीयस्तनी- माजिघ्रन् परचिद्दशामनुभवन् मूर्तिं पुराणीमुमे⁴ ॥ इति । तन्मयं ⁵तल्लक्षकत्वात्। परं कामराजबीजस्थितककारलकारमध्यगतहकारा- क्षरम्। कोऽर्थः ? कामराजमध्यस्थितः षष्ठो हकार आकाशादिपञ्चभूतगतशब्द- पञ्चककारणनादरूपः कामराजबीजस्य स्थितिरूपतां लक्षयतीत्यर्थः ॥ ऊपर बताये गये पाँच प्रकार के शब्दों को उत्पन्न करने वाला ध्वनिमय नाद ही इन सबका कारण है। जैसा कि किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— वर्ण, पद, वाक्यरूप इस विशाल शब्द विस्तार की जहाँ संस्कार के रूप में स्थिति बनी रहती है, उसी का नाम पिण्ड है। इसको नाद कहते हैं। इसका भाव यह है कि नाद के रूप में परिणत हुए पिण्ड मन्त्र में वर्ण, पद, वाक्य रूप शब्दप्रपंच की संस्कार के रूप में स्थिति रहती है। सारा शब्दप्रपंच यहाँ आकर शान्त हो जाता है। हे देवि उमे ! यह नाद ललाट से ऊपर बढ़ता हुआ जब समना की सीमा को लांघकर उन्मनावस्था में पहुँचता है, तब वह एक अनोखी सूक्ष्मतर अवस्था को स्पर्श करता हुआ परचिद्दशा रूप अपने पुराने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह कैसे होता है, इसका उदा- हरण है— घण्टा ध्वनि। जैसे घण्टे को बजाने से उत्पन्न हुई ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती हुई सनसनाहट के रूप में बदल कर अन्ततः विलीन हो जाती है, उसी तरह से नाद भी समना पर्यन्त सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचता हुआ अन्त में विलीन हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ।। कामराज बीज के ककार और लकार के बीच में विद्यमान छठा हकार इसी नादमय शब्द को लक्षित करता है। इसका अभिप्राय यह है कि कामराज बीज में स्थित छठा हकार आकाश आदि पाँच भूतों में विद्यमान पाँच शब्दों के कारणभूत छठे नादरूप शब्द का बोधक है। इससे कामराज बीज स्थिति का प्रतिनिधि है, इस बात की पुनः¹ पुष्टि हो जाती है। १. दोषा-ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । २. 'घण्टा ॰॰॰मुमे' नास्ति-क. ग. उ. । ३. न्नन्त्यां-ब. । ४. णीं मम-ख. ब. । ५. तल्लक्ष्यत्वात्-ख. ने. ज. झ. । १. कामराज बीज की स्थितिरूपता का प्रतिपादन पहले (२।२२-२३) किया जा चुका है।