भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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उपोद्घात

योगिनीहृदय और दीपिका

श्रद्धेयचरण गुरुदेव पण्डित श्री श्री गोपीनाथ कविराज द्वारा सम्पादित योगिनीहृदय और उसकी टीका दीपिका के प्रथम संस्करण का पहला भाग सन् १९२३ में तथा दूसरा भाग सन् १९२४ में प्रकाशित हुआ। इसका दूसरा संस्करण सन् १९६३ में एक ही जिल्द में छापा गया और उसके साथ भास्करराय कृत सेतुबन्ध टीका का भी समावेश किया गया। इसका तीसरा संस्करण सन् १९८१ में निकला। इससे योगप्रधान आन्तर वरिवस्या के प्रतिपादक इस ग्रन्थ की लोकप्रियता प्रकट होती है। पेरिस के तन्त्रशास्त्र के ख्यातनामा विद्वान् डॉ० आन्द्रे पाटु इसका फ्रेंच भाषा में अनुवाद कर रहे हैं। उनके जिज्ञासा भरे कुछ पत्र मिले। तब ऐसा लगा कि मूल और दीपिका के नये संस्करण की अपेक्षा है। पहला संस्करण उस समय उपलब्ध केवल दो हस्तलेखों के आधार पर किया गया था। आगे के संस्करण भी इन्हीं पर आधारित थे। सौभाग्य से हमें सरस्वतीभवन पुस्तकालय में मूल और टीका के अनेक हस्तलेख मिल गये। बड़ोदरा एवं उदयपुर की यात्रा में वहाँ भी इनके हस्तलेख मिले। इन सबकी सहायता से मूल और दीपिका का संशोधित संस्करण तथा उनका भाषानुवाद प्रस्तुत कर आज हम अपने को कृतकृत्य मानते हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में भी देवनागरी तथा शारदा लिपि में इनकी ११ मातृकाएँ उपलब्ध हैं। इनमें से शारदा लिपि की तीन मातृकाओं से पाठ- संकलन करने का हमारा विचार था, किन्तु यह सम्भव न हो सका।

मातृकाओं का परिचय

ग्रन्थ और ग्रन्थकार का परिचय देने से पहले इस संशोधित संस्करण के विषय में कुछ कह देना तथा इसमें प्रयुक्त मातृकाओं का परिचय दे देना आवश्यक है। संक्षेप में मातृकाओं का परिचय इस प्रकार है— संकेतमातृकासंख्यापत्रसंख्यालिपिलिपिकालविशेष क   शंकरमठ   १-८९   देवनागरी   प्रथम संस्करण देखिये। सरस्वती भवन, वाराणसी ख   २५०९९   १-५३(= ५४),   देवनागरी           ५५-६९ ग   २४९६६   १-४६, ५७-१८७   ,,   सं० १७९२ घ   २५...   १-...   ,,   सं० १७९६   अपूर्ण