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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

उपोद्घात

योगिनीहृदय और दीपिका

श्रद्धेयचरण गुरुदेव पण्डित श्री श्री गोपीनाथ कविराज द्वारा सम्पादित योगिनीहृदय और उसकी टीका दीपिका के प्रथम संस्करण का पहला भाग सन् १९२३ में तथा दूसरा भाग सन् १९२४ में प्रकाशित हुआ। इसका दूसरा संस्करण सन् १९६३ में एक ही जिल्द में छापा गया और उसके साथ भास्करराय कृत सेतुबन्ध टीका का भी समावेश किया गया। इसका तीसरा संस्करण सन् १९८१ में निकला। इससे योगप्रधान आन्तर वरिवस्या के प्रतिपादक इस ग्रन्थ की लोकप्रियता प्रकट होती है। पेरिस के तन्त्रशास्त्र के ख्यातनामा विद्वान् डॉ० आन्द्रे पाटु इसका फ्रेंच भाषा में अनुवाद कर रहे हैं। उनके जिज्ञासा भरे कुछ पत्र मिले। तब ऐसा लगा कि मूल और दीपिका के नये संस्करण की अपेक्षा है। पहला संस्करण उस समय उपलब्ध केवल दो हस्तलेखों के आधार पर किया गया था। आगे के संस्करण भी इन्हीं पर आधारित थे। सौभाग्य से हमें सरस्वतीभवन पुस्तकालय में मूल और टीका के अनेक हस्तलेख मिल गये। बड़ोदरा एवं उदयपुर की यात्रा में वहाँ भी इनके हस्तलेख मिले। इन सबकी सहायता से मूल और दीपिका का संशोधित संस्करण तथा उनका भाषानुवाद प्रस्तुत कर आज हम अपने को कृतकृत्य मानते हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में भी देवनागरी तथा शारदा लिपि में इनकी ११ मातृकाएँ उपलब्ध हैं। इनमें से शारदा लिपि की तीन मातृकाओं से पाठ- संकलन करने का हमारा विचार था, किन्तु यह सम्भव न हो सका।

मातृकाओं का परिचय

ग्रन्थ और ग्रन्थकार का परिचय देने से पहले इस संशोधित संस्करण के विषय में कुछ कह देना तथा इसमें प्रयुक्त मातृकाओं का परिचय दे देना आवश्यक है। संक्षेप में मातृकाओं का परिचय इस प्रकार है— संकेतमातृकासंख्यापत्रसंख्यालिपिलिपिकालविशेष क   शंकरमठ   १-८९   देवनागरी   प्रथम संस्करण देखिये। सरस्वती भवन, वाराणसी ख   २५०९९   १-५३(= ५४),   देवनागरी           ५५-६९ ग   २४९६६   १-४६, ५७-१८७   ,,   सं० १७९२ घ   २५...   १-...   ,,   सं० १७९६   अपूर्ण

[ २ ] ङ २५९८५ ५-९ बंग मूलमात्र, अपूर्ण च ८५१८४ १-१४ देवनागरी सं० १८४१ मूलमात्र छ ८६०५६ १-१४ " " ज ९००३१ १-५६ " सं० १९०० झ ९१०३६ १-९० " गायकवाड़ शोधसंस्थान, बड़ोदरा ३४९० ६४ देवनागरी अपूर्ण ५७२९ ३८ " प्रथम तथा तृतीय पटल ५७९३ १०४ " सं० १८०९ १०६९६ २०५ " सं० १९२६ रतलामनगरीया १०८५५ १३६ " श० १६६७ प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, उदयपुर ६२४ १-१०० देवनागरी सं० १७८६ दीपिका, अशुद्ध प्रति ११०-११५ " मूलमात्र " ६२५ १-१८ " " " ३७९४ १-१५ " चक्रसंकेतमात्र, शुद्ध " ३८०२ १-२० " मूलमात्र " " इनके अतिरिक्त सरस्वतीभवन की दो तथा हिन्दू विश्वविद्यालय की जिन मातृकाओं का इच्छा रहते हुए भी हम उपयोग न कर सके, उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है— सरस्वती भवन पुस्तकालय ९०८७३ २-१४, १८-२१, ३७-५४, देवनागरी १-१८, २२-२४, २६-२८, ३०-३१ ९१३३६ २६-२९, ३४-३७ " हि० वि० वि० पुस्तकालय बी ११४ ६३ देवनागरी बी १२५ ९५ " बी ११५ २२ " बी १११ ५६ " सं० १७१६ सी ४४६४ १३ शारदा बी २४१९ १९ देवनागरी बी २४२० २१ "

[ ३ ] बी २४१७ ११ देवनागरी सं० १६६४ सी ४५४६ ५८ शारदा सी ४४२९ २० ,, सी ४८२८ २७ देवनागरी सरस्वती भवन पुस्तकालय वाराणसी, ओरियण्टल इंस्टीट्यूट बड़ोदरा, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान उदयपुर शाखा तथा हिन्दू विश्वविद्यालय की सूचियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वहाँ ऊपर दी गई संख्याओं के आधार पर इन मातृकाओं का विशेष परिचय प्राप्त किया जा सकता है। भारत के प्रायः प्रत्येक ग्रन्थालय में इन दोनों ग्रन्थों के एक-दो हस्तलेख अवश्य मिल जाते हैं। हमें खेद है कि न तो हम उनका परिचय प्राप्त कर सके और न उनका उपयोग ही कर सके। प्रस्तुत संस्करण उपर्युक्त तीनों संस्करण प्रधानतः क. (शंकरमठ) मातृका पर आधारित हैं, जबकि प्रस्तुत संस्करण में ख. और झ. मातृकाओं के आधार पर पाठों को संशोधित किया गया है। जैसे कि यहाँ कामकलाविलास के उद्धरण को छोड़कर अन्यत्र सभी जगह 'अस्मद्- गुरुक्त' के स्थान पर 'अस्मदुक्त' पाठ रखा गया है, क्योंकि ये सभी वचन अमृतानन्द द्वारा रचित ग्रन्थों के हैं। प्रथम संस्करण के स्वरूप को अधिक से अधिक बनाये रखने के लिये क. मातृका के पाठ में कोई त्रुटि न रहने पर उसी को मूल में रखा गया है और अन्य अनेक मातृकाओं से संवादित पाठ भी टिप्पणी में ही दिया गया है। क. मातृका में कहीं-कहीं अधिक पाठ मिलता है। अन्य किसी भी मातृका में उसके न मिलने पर उसको छोटे अक्षरों में कोष्ठक के अन्दर दिखाया गया है। कहीं-कहीं यह हटा भी दिया गया है। जैसे कि २.५६ की व्याख्या में चार श्लोकों के स्थान पर केवल एक ही श्लोक रखा गया है। चक्रसंकेत की पुष्पिका में आया 'वामकेश्वरतन्त्र' पाठ भी हटा दिया गया है, क्योंकि यह पृ० १०६ की व्याख्या के विपरीत पड़ता है। इस पर हम आगे विचार करेंगे। इसी तरह से २.६० की टीका के अंश को मूल टीकाग्रन्थ में रहने दिया है, किन्तु वहाँ आये 'याकिनी' पद को हटा दिया गया है। इसके लिये पृ० १९० की टिप्पणी अवलोकनीय है। यहाँ ३.३२ के स्थान पर ३.३० पढ़ना चाहिये। नि० बो० (३।१९-२०) में भी छः ही योगिनियाँ वर्णित हैं। इसी तरह की समस्याओं के समाधान के लिये यहाँ स्थान-स्थान पर टिप्पणियाँ दी गई हैं। जैसे कि अष्टधा अनाहत नाद की नवनादपरक व्याख्या के लिये पृ० १२३ और १९३ की पहली टिप्पणी देखी जा सकती है। ख. मातृका के पाठ को ही अधिकांश मातृकाओं का समर्थन मिलता है और इनकी त्रुटियों का संशोधन झ मातृका से हो जाता है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि

[ ४ ] प्रस्तुत संस्करण प्रधानतः इन दो मातृकाओं के आधार पर संशोधित है। इस विषय की चर्चा हम पृ० २२४ की टिप्पणी में भी कर चुके हैं। बड़ोदरा और उदयपुर की मातृकाओं का अलग-अलग उल्लेख नहीं किया जा सका है। क. मातृका से इनकी कहाँ कहाँ असहमति है, केवल इतना ही यहाँ दिखाया गया है। समय की कमी के कारण बड़ोदरा की तीन मातृकाओं का उपयोग तो मात्र कुछ संदिग्ध स्थलों के संशोधन में किया गया है। दीपिका के सभी हस्तलेखों में योगिनीहृदय के श्लोकों के केवल प्रतीक को न देकर पूरा व्याख्येय अंश उद्धृत कर अन्त में 'इति' पद जोड़ा गया है। इस संस्करण में श्लोकों के उसी क्रम को और उतने ही अंश को दिया गया है और टीका के 'इति' पद को हटा दिया गया है। दीपिका में उद्धृत वचनों का स्थलनिर्देश करने का भरसक प्रयत्न किया गया है। तब भी कुछ वचनों के मूल स्थानों को खोजने में हम असफल रहे हैं। परापंचाशिका की मातृकाएँ दीपिका और कामकलाविलास की १चिद्वल्ली टीका में परापंचाशिका के अनेक श्लोक उद्धृत हैं। यह कश्मीर संस्कृत ग्रन्थावलि, ग्रन्थांक १३ में अनुत्तरप्रकाशपंचा- शिका के नाम से छप चुकी है, किन्तु वह संस्करण त्रुटिपूर्ण है। इसकी एक मातृका हमें सरस्वती भवन में मिली। सन् ६८ की अपनी अध्ययन यात्रा के प्रसंग में मद्रास स्थित अड्यार पुस्तकालय की इसकी चार मातृकाओं से हमने पाठ-संकलन किया था। लखनऊ की अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् में भी इसकी एक मातृका मिली। सन् १९८५ में हमने भगवान् आशुतोष शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पूरी की। उसी वर्ष जुलाई मास में मैसूर से प्रकाशित हो रहे संस्कृत दैनिक 'सुधर्मा' द्वारा आयोजित पत्रकार- गोष्ठी में 'गाण्डीवम्' के प्रतिनिधि के रूप में संमिलित होने के लिये की गई यात्रा के प्रसंग में मैसूर में भी इसकी एक मातृका मिली। इन सातों हस्तलेखों से पाठ संकलित किया हुआ था। प्रस्तुत संस्करण के मुद्रण के समय २५वें फर्मे के छः पृष्ठों को बचा हुआ देखकर इसके भी परिष्कृत संस्करण को यहाँ दे देने की इच्छा हुई और इस तरह से योगिनीहृदय और दीपिका के साथ परापञ्चाशिका का भी परिष्कृत संस्करण विज्ञ पाठकों की सेवा में प्रस्तुत हो सका है। इसके संशोधन में प्रयुक्त मातृकाओं का परिचय इस प्रकार है— अड्यार पुस्तकालय, मद्रास अक. टी, आर ८४६ तेलुगु लिपि अख. ६६५३४ ” १. चिद्वल्ली के पृ. ५-६ में उद्धृत श्लोक परापंचाशिका के न होकर अभिनवगुप्त की बोधपञ्चदशिका के हैं।

[ ५ ] अग. ६७४५५ तेलुगु लिपि अघ. ६७५९७ " सरस्वती भवन पुस्तकालय, वाराणसी स २३४६२ पत्र १-३ देवनागरी स्तोत्रविषयक सूची में चिद्विलासस्तव के साथ अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, लखनऊ ल १२८ पत्र ५७-६५ देवनागरी प्राच्य विद्या संशोधनालय, मैसूर म ७९८२/४९ पत्र २४७-२४९ नन्दीनागरी मु० मुद्रित पुस्तक, कश्मीर ग्रन्थावलि, श्रीनगर परापंचाशिका का परिचय परापंचाशिका के विषय में पृ० ८२ पर हमने एक टिप्पणी दी है। सौभाग्य से इसी संस्करण (३९५-४००) में इसका परिष्कृत संस्करण प्रकाशित किया जा सका है। परापंचाशिका के १८-२५ श्लोक शिवपुराण की कैलाससंहिता के १६।७०-८४ श्लोकों से बहुत मिलते-जुलते हैं। हम अन्यत्र¹ बता चुके हैं कि शिवपुराण में शिवसूत्र (६।१६। ४४ तथा ४६), शिवसूत्रवार्त्तिक (६।१६।४६) तथा विरूपाक्षपंचाशिका (६।१९।४४) उद्धृत हैं। दो स्थलों पर (३।४।११, ३।१२।१८) पुष्पदन्त रचित शिवमहिम्नस्तोत्र भी उद्धृत हुआ है। यह ध्यान देने की बात है कि परापंचाशिका से संबद्ध सामग्री भी उसी अध्याय में है, जिसमें कि शिवसूत्र और शिवसूत्रवार्त्तिक उद्धृत हैं। परापंचाशिका के १५ से १८ तक के श्लोकों की छः पंक्तियों की तथा ३८-४० श्लोकों की तुलना परात्रिंशिका के ६-९ श्लोकों से भी की जा सकती है। इसी तरह से ३२-३७ श्लोकों की विषय-प्रतिपादन प्रक्रिया अभिनवगुप्त के तन्त्रसार (पृ० १२-१५) में वर्णित प्रक्रिया से मिलती-जुलती है। इतना सब होते हुए भी यह छोटा-सा ग्रन्थ अपने आप में परिपूर्ण है। दीपिका (पृ० ३३३) में उद्धृत वचन इसका मंगल श्लोक लगता है, किन्तु उपलब्ध मातृकाओं में से किसी में भी यह नहीं मिलता। यहाँ प्रारम्भ में प्रकाश और विमर्शस्वरूप शिव और शक्ति की तथा उनसे जगत् की भी अभिन्नता युक्तियों के सहारे सिद्ध की गई है। यहाँ बताया गया है कि भेद और जड़ता ये दोनों अतात्त्विक हैं। वह सारा जगत् चिदेकमात्रसार है। प्रकाश के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। जैसे सूर्य को प्रकाशित करने के लिये दीपक की आवश्यकता नहीं १. तन्त्रयात्रा में प्रकाशित “शिवपुराणीयं दर्शनम्” शीर्षक निबन्ध (पृ. ५०-५१) देखिये।

[ ६ ] पड़ती, उसी तरह से इस प्रकाश की भी सत्ता और स्फुरत्ता को प्रकाशित करने के लिये किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। निर्मल दर्पण में जैसे प्रतिबिम्ब प्रकाशित होता है, उसी तरह से यह सारा विश्व इसी प्रकाशरूपी दर्पण में प्रतिभासित होता है। इस भूमिका-बन्ध के साथ यहाँ पहले आदि-क्षान्त वर्णमाला की तथा शिवादि- क्षित्यन्त तत्त्वों की सृष्टि का क्रम वर्णित है। इसके बाद यहाँ अनुत्तर से विसर्ग पर्यन्त स्वरों की सृष्टि का क्रम बता कर स्वरों को 'बीज' तथा व्यंजनों की 'योनि' संज्ञा दी गई है। यहाँ बताया गया है कि वट के बीज में जैसे हरा-भरा विशाल वृक्ष छिपा हुआ है, उसी तरह से शृंगाट स्थित (अकार-हकार सामरस्यमय) बिन्दु में यह वर्ण और तत्त्वात्मक, शब्दमय और अर्थमय सारा संसार छिपा हुआ है। इसी से उसका उद्भव होता है और इसी में वह लीन भी हो जाता है। अन्त में यहाँ लय की प्रक्रिया को बताते हुए कहा गया है कि इदन्ता को अहन्ता में विलीन कर देने वाला वीर साधक ही अशिव का नाश करने वाले शिवपद को प्राप्त कर पाता है। इस श्लोक को (अहमि प्रलयं कुर्वन्) दीपिकाकार ने तीन बार उद्धृत किया है। ल० मातृका परापंचाशिका को रुद्रयामल का अंश मानती है। विज्ञानभैरव को रुद्रयामलसार कहा जाता है। परात्रिंशिका और उत्तरषट्क को भी रुद्रयामल का ही सार या भाग माना गया है। रुद्रयामल की विशिष्टता की ²हमने कई बार चर्चा की है। ³डॉ० तून गान्द्रियान ने भी इस ग्रन्थ के विषय में अनेक सूचनाएँ दी हैं। इस ग्रन्थ के भी परिष्कृत संस्करण की अतीव आवश्यकता है। तभी परात्रिंशिका, विज्ञानभैरव, उत्तरषट्क, नित्याषोडशिकार्णव जैसे प्राचीन ग्रन्थों का सही रूप में तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जा सकेगा। श्रीकुल (त्रिपुरा सम्प्रदाय) का साहित्य योगिनीहृदय और उसकी टीका दीपिका के कर्ता अमृतानन्द के विषय में ⁴हम बहुत कुछ लिख चुके हैं। दीपिका में उद्धृत ग्रन्थों और ग्रन्थकारों के विषय में भी प्रसङ्गतः नित्याषोडशिकार्णव और लुप्तागमसंग्रह के उपोद्घात में लिखा जा चुका है। इधर १. "सत्तावाचिनि बीजेऽस्मिन् सादिमायान्तिमं जगत्" (श्लो. ४४) यह पाठ मूल में रहना चाहिये। तन्त्रालोक में यही पाठ है—"तद्वत् सानुत्तरादीनां कादिसान्ततया स्थितिः" (३।१४९)। माया शब्द से ककार का ग्रहण किया जाता है, इसकी चर्चा हम पृ. ३२८ की टिप्पणी में कर चुके हैं। २. देखिये—विज्ञानभैरव उपोद्घात पृ. १ टि., नि. षो. उपोद्घात, पृ. ४४-४५ ३. हिन्दु तान्त्रिक लिटरेचर इन् संस्कृत, पृ. ४० टि. ४७, ७८ टि. । ४. द्रष्टव्य—तन्त्रयात्रा, पृ. ३५-४०, आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ. ७६-८८

[ ७ ] नीदरलैण्ड के तन्त्रशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० तून गान्द्रियान और डॉ० संयुक्ता गुप्ता के संयुक्त प्रयास से "हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर" नामक ग्रन्थ निकला है। इसके तीसरे अध्याय (पृ० ५७-७४) में श्रीकुल शीर्षक के अन्तर्गत त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। अतः यहाँ हम बहुत संक्षेप में कुछ नई बातों की ही चर्चा करेंगे। १श्रीकुल और २कालीकुल नाम के ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है और सम्प्रदाय- विशेष के लिये भी ये शब्द प्रयुक्त हैं। हमारे एक मित्र का कहना है कि श्रीकुल ३पश्चिमा- म्नाय से संबद्ध है, अतः त्रिपुरा सम्प्रदाय के लिये इसका प्रयोग उचित नहीं है, क्योंकि यह दक्षिणाम्नाय से संबद्ध है। विद्यानन्द और अमृतानन्द कहते हैं कि श्रीविद्या ४चारों आम्नायों से संबद्ध है, तो भी दक्षिण आम्नाय के प्रति इसका विशेष अनुराग है। चूँकि श्रीविद्या चारों आम्नायों से संबद्ध है, अतः श्रीकुल शीर्षक के अन्तर्गत त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों का परिचय देना हमारी दृष्टि में अनुचित नहीं है। आगे हम गुजराती भाषा में लिखित "शाक्त साहित्य" नामक ग्रन्थ की चर्चा करेंगे। वहाँ भी श्रीकुल और काली- कुल विभाग के अन्तर्गत ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। तन्त्रशास्त्र के फ्रांसीसी विद्वान् डॉ० आन्द्रे पाद्यु के इस कथन को हम सही मानते हैं कि शाक्त साहित्य के स्रोतस्, आम्नाय, मत आदि विभाग ५अस्पष्ट हैं। इस सम्प्रदाय के प्राचीन साहित्य के, जो बहुत कुछ अप्रकाशित है, सामने आने पर ही इस विषय में निश्चित रूप से कुछ कहा जा सकता है। लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० ११) में हमने अनेक नित्या-तन्त्रों के नाम दिये हैं और यथास्थान इनका परिचय भी दिया है। इनमें से अनेक ग्रन्थों को अमृतानन्द ने उद्धृत किया है। नि० बो० उपोद्घात (पृ० ३१-४९) में इनका परिचय दिया जा चुका है। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है उत्तरषट्क । इसको रुद्रयामल का अंश १. द्रष्टव्य - परमार्थसार की योगराजकृत विवृति, पृ. १८६ २. लुप्तागमसंग्रह द्वितीय भाग, उपोद्घात, पृ. २६ द्रष्टव्य । ३. श्रीकुल, श्रीक्रमकुल, श्रीकुलक्रम, श्रीक्रम आदि नामों में अभिहित होने वाला सम्प्रदाय पश्चिमशासन अथवा पश्चिमाम्नाय से संबद्ध है, इसकी सूचना आदिनाथ कृत कुलरत्नोद्योत से मिलती है। कालीकुल उत्तराम्नाय से संबद्ध है। इस विषय में विशेष विचार अपेक्षित है। ४. "इयं च विद्या चतुराम्नायसाधारण्यपि दक्षिणपक्षपातिनी" (अर्थरत्नावली, पृ. ४१), "दक्षिणस्रोतःपक्षपातिन्याः सौभाग्यदेवतायाः" (दीपिका, पृ. १३३-१३४) । ५. श्री गोपालचन्द्र सिंह स्मृत्यंक, ऋतम्, अखिल भारतीय संस्कृत परिषत् पत्रिका, भा. १६-१८, सन् १९८४-८६, पृ. १५१

[ ८ ] माना गया है। रुद्रयामल के ही समान उसका यह अंश भी नि० षो० से प्राचीन हो सकता है। त्रिपुरासारसमुच्चय नागभट्ट की विशिष्ट रचना है। इसमें (२।२५) त्रिपुरार्णव का प्रमाण दिया गया है। संभवतः त्रिपुरार्णव की मातृका सरस्वती भवन में विद्यमान है । आजकल उसके बन्द रहने से इस विषय में हम निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कह सकते । विद्यानन्द की ज्ञानदीपविमर्शिनी में उदयाकरपद्धति और त्रिपुरसुन्दरीकल्पलता विशेष रूप से उद्धृत हैं। ऋजुविमर्शिनी में भी यह इसी नाम से उद्धृत है और अर्थरत्नावली में इसको महात्रिपुरसुन्दरीकल्पलता के नाम से याद किया गया है। ज्ञानदीपविमर्शिनी की १नेपाल मातृका में इसको अनन्तभट्टारक की कृति माना है। यहाँ का श्लोक २बड़ोदरा मातृका में अनन्तशक्तिभट्टारक का कहा गया है। दीपिका (२।९६) में उद्धृत ‘कस्तूरीघुसृण’ इत्यादि वचन उदयाकरपद्धति का है। संकेतपद्धति के महत्त्व के विषय में हम ३अन्यत्र लिख चुके हैं। ४लघुस्तव ही नहीं, पूरी पञ्चस्तवी धर्माचार्य की रचना है और त्रिपुर- सुन्दरीदण्डक के रचयिता दीपकाचार्य को ५जयरथ नि० षो० का प्रथम टीकाकार मानते हैं। प्रपञ्चसार में सामान्य तान्त्रिक विषयों का वर्णन करने के बाद पंचायतन पूजा का आरंभ करते हुए सर्वप्रथम नवम पटल में त्रिपुरा पूजा की विधि बतायी गई है । हंस- पारमेश्वर एवं रससारसंग्रह में भी त्रिपुरा सम्प्रदाय में संबद्ध विषय वर्णित हैं। त्रिपुरा सम्प्रदाय के अन्य प्राचीन आचार्यों के विषय में भी ६हम लिख चुके हैं। श्रीकुल (त्रिपुरा सम्प्रदाय) के साहित्य का परिचय देते समय इन सबकी चर्चा अपेक्षित हैं, क्योंकि समय-समय पर प्रादुर्भूत अन्य अनेक आगमों की अपेक्षा इस सम्प्रदाय के प्राचीन स्वरूप और विशेषताओं को समझने के लिये इन ग्रन्थों का अपना महत्त्व है। डॉ० कान्तिचन्द्र७ पाण्डेय ने कौल तन्त्रों की चर्चा के प्रसंग में कुछ नित्या-तन्त्रों की भी चर्चा की है। वहाँ उन्होंने ८ज्ञानार्णव को नित्याषोडशिकार्णव से प्राचीन माना है।


१. द्रष्टव्य—मातृका संख्या ५-४९०४, पत्र ४७ क । २. द्रष्टव्य—मातृका संख्या १९६१, पत्र ३८ क । ३. नित्याषोडशिकार्णव, उपोद्घात, पृ. ४६-४७ ४. आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ. ८६-८७, तन्त्रयात्रा, पृ. ७४ ५. “आ श्रीदीपकनाथतो ह्यगणितैरद्यापि वृत्तिः कृता” (वामकेश्वरीमतविवरण, पृ. ११५) । ६. तन्त्रयात्रा में प्रकाशित "त्रिपुरादर्शनस्यापरिचिता आचार्याः कृतयश्च" शीर्षक निबन्ध देखिये (पृ. ७२-७५) । ७. अभिनवगुप्त एन हिस्टोरिकल एण्ड फिलासफिक्ल स्टडी, पृ. ५६५-५९०, द्वितीय संस्करण, सन् १९६३ देखिये । ८. वही पुस्तक, पूर्वोक्त पृष्ठ देखिये ।

[ ९ ] यह उचित नहीं है। डॉ० ¹तून गान्द्रियान ने इसको सही जगह पर रखा है। नि० षो० के टीकाकारों में ²उन्होंने लक्ष्मण, गौरीकान्त, शंकरानन्दनाथ, श्रीहर्ष दीक्षित आदि के नाम भी गिनाये हैं। यह भी ठीक नहीं है। लक्ष्मण (लक्ष्मीधर) और गौरीकान्त सौन्दर्य- लहरी के और श्रीहर्ष दीक्षित शारदातिलक के टीकाकार हैं, नि० षो० के नहीं। शंकरानन्दनाथ पद्धतिकार हैं। ये ज्ञानार्णव तन्त्र के व्याख्याकार हैं, इस ³उक्ति की भी परीक्षा करनी होगी। डॉ० गान्द्रियान (पृ० १५२) ने बताया है कि इन्होंने अपनी पद्धति ज्ञानार्णव तन्त्र को आधार मानकर लिखी। वामकेश्वर तन्त्र के प्राचीन व्याख्याता दीपक- नाथ हैं, दीपिकानाथ नहीं। योगिनीहृदय और वामकेश्वर तन्त्र डॉ० आन्द्रे पाडु का " 'वामकेश्वरतन्त्रान्तर्गतं योगिनीहृदयम्' "⁴ शीर्षक निबन्ध अभी प्रकाशित हुआ है। जैसा कि शीर्षक से ही ज्ञात होता है, विद्वान् लेखक ने यहाँ यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि नित्याषोडशिकार्णव की तरह योगिनीहृदय भी वामकेश्वर तन्त्र का ही एक भाग है। इसमें उन्होंने दो प्रमुख प्रमाण दिये हैं। पहला शिवानन्द का "मध्ये शास्त्रस्य तस्याऽस्ति नित्याषोडशिकार्णवः" (पृ० ३) यह श्लोक तथा दूसरा योगिनीहृदय के दूसरे संस्करण के प्रथम पटल के अन्त की पुष्पिका का यह वाक्य—"वामकेश्वरतन्त्रयोगिनीहृदयदीपिकायाम्" (पृ. ८९)। यह पाठ उसी संस्करण की ख. मातृका को मान्य नहीं है, तथा अन्य सभी मातृकाएँ ख. मातृका का ही अनुसरण करती हैं। क. मातृका में भी केवल प्रथम पटल की पुष्पिका में यह मिलता है, अतः प्रस्तुत संस्करण में इस पाठ को मान्यता नहीं दी गई है। अमृता- नन्द स्वयं एक जगह लिखते हैं—"वामकेश्वरशास्त्र एवासामुद्धारः, अत्र त्वज्ञातार्थप्रति- पादनपरत्वादस्य शास्त्रस्येति" (पृ० १०६)। इस वाक्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे वामकेश्वर शास्त्र (तन्त्र) से योगिनीहृदय को भिन्न मानते हैं। वामकेश्वर शास्त्र से उनका अभिप्राय चतुःशती शास्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) से है। यह विषय उनके ही एक अन्य उद्धरण से भी स्पष्ट हो जाता है—" 'नन्वयं कौलिकार्थो वामकेश्वरतन्त्रे कुत्र सूचितः ?....गणेश (नि० षो० १।१) इत्यत्र सूचितं कौलिकार्थं विवृणोति" (२।५७)। स्पष्ट है कि अमृतानन्द की दृष्टि में नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय दो भिन्न शास्त्र हैं। १. हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर, पृ. ६७ २. अभिनवगुप्त, पृ. ५७० देखिये । ३. वहीं, पृ. ५६७ देखिये । ४. ऊपर निर्दिष्ट पत्रिका का विशेषांक (पृ. २५१–२५७) द्रष्टव्य ।

[ १० ] शिवानन्द इस शब्द का प्रयोग विस्तृत अर्थ में करते हैं। कादिमत ( तन्त्रराज )¹ में ९ नित्यातन्त्रों का उल्लेख किया गया है और उसके टीकाकार ²सुभगानन्दनाथ ने अपनी टीका में इनके नाम दिये हैं। इन ९ नित्यातन्त्रों में सुन्दरीहृदय (योगिनीहृदय) भी एक है। हम समझते हैं कि इन अथवा इनसे भी प्राचीन त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों का समावेश वामकेश्वर शास्त्र के नाम से किया जाता होगा, जिनके कि बीच में नित्या- षोडशिकार्णव की विशेष स्थिति मानी जाती होगी। बहुरूपाष्टक की गणना ६४ तन्त्रों में की गई है और विद्यानन्द का कहना है कि चतुःशती शास्त्र (नि० षो०) ³बहुरूपाष्टक शास्त्र का संक्षेप है। बहुरूपाष्टक के विषय में अभी हम नि० षो० उपोद्घात (पृ० २५) में दिये गये विवरण से अधिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। फलतः नि० षो० और यो० हृ० की भिन्नता ही माननी पड़ेगी। शिवानन्द के प्रमाण से वामकेश्वर शास्त्र के अन्तर्गत इन दोनों की स्थिति मान सकते हैं, किन्तु उस स्थिति में प्रश्न उठेगा कि नि० षो० से पहले के वामकेश्वर शास्त्र के उस भाग का नाम क्या है ? इस विषय को अभी हमें अनिर्णीत ही छोड़ना पड़ेगा। योगिनीहृदय की टीकाएँ योगिनीहृदय की दो टीकाओं से हम सभी परिचित हैं। संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित हुए योगिनीहृदय के द्वितीय तथा तृतीय संस्करण में इन दोनों टीकाओं का समावेश किया गया है। इनमें से पहली का नाम दीपिका तथा दूसरी का सेतुबन्ध है। दीपिकाकार (पृ० ३) का कहना है कि उनकी टीका से पहले इस पर कोई टीका नहीं लिखी गई थी। भास्करराय ने नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय को एक ही ग्रन्थ मानकर आठ पटलों वाले नित्याषोडशिकार्णव पर सेतुबन्ध व्याख्या लिखी। उनके कथन के अनुसार इस पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गई थी (पृ० ८)। यह सही है कि पाँच पटल वाले नित्याषोडशिकार्णव पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गईं, किन्तु योगिनी- हृदय पर किसी प्राचीन टीका की उपलब्धि की सूचना हमें अभी तक नहीं मिली है। इन दो टीकाओं के अतिरिक्त तीसरी टीका इस ग्रन्थ पर काशीनाथ भट्ट की है। एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता की ६१४४ संख्या की मातृका का नाम चक्रसंकेत- चन्द्रिका है। डॉ० चिन्ताहरण चक्रवर्ती ने "जर्नल आफ दी रायल एशियाटिक सोसाइटी १. "नित्यानां षोडशानां च नव तन्त्राणि कृत्स्नशः" (१।२) । २. "नवतन्त्राणि सुन्दरीहृदय-नित्याषोडशिकार्णव-चन्द्रज्ञान-मातृकातन्त्र-संमोहनतन्त्र- वामकेश्वर-बहुरूपाष्टक-प्रस्तारचिन्तामणि-मेरुप्रस्ताराख्यानि" ( मनोरमाव्याख्या, पृ. २)। ३. "बहुरूपाष्टकं शास्त्रं संक्षिप्य चतुश्शतीसंख्यापरिमितैर्ग्रन्थैस्तत्सारमुद्धर्तुकाम····" (अर्थरत्नावली, पृ. ४)।

[ ११ ] आफ बंगाल” (लेटर्स) के भा. ४, अ. ३, सन् १९३८ पृ. ४५५-४६५ पर छपे अपने “काशीनाथ भट्ट एण्ड हिज वर्क्स” शीर्षक निबन्ध में इसका परिचय दिया है। वे कहते हैं कि इसमें योगिनीहृदय के कुछ चुने हुए श्लोकों की व्याख्या की गई है और यह अमृतानन्द की दीपिका व्याख्या का अनुसरण करती है। १डॉ० तून गान्द्रियान ने भी यही बात कही है। मूल और टीका में स्मृत ग्रन्थ-ग्रन्थकार नि० बो० (पृ० ९९, २५३-२५४) में रुद्रयामल उद्धृत है, किन्तु यो० हृ० में उसका कोई उल्लेख नहीं है। यहाँ महाज्ञानार्णव (२।७७) और विद्यापीठनिबन्ध (२।७८) की चर्चा है। भास्करराय महाज्ञानार्णव को तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ मानते हैं, जब कि अमृतानन्द इस शब्द की यौगिक व्याख्या कर देते हैं। “तान्त्रिक साहित्य” अथवा आफ्रेक्ट की सूची में इस ग्रन्थ का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु वामकेश्वरीमत के विवरणकार जयरथ महाज्ञानार्णव को षड्विध मन्त्रार्थ के प्रसंग में (पृ० १३९) उद्धृत करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि महाज्ञानार्णव एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और इसके आधार पर ही योगिनीहृदय में यह विषय प्रतिपादित है। बहुत संभावना है कि महाज्ञानार्णव के समान ही विद्यापीठ सम्बन्धी तन्त्रों में भी षड्विध अर्थ का प्रतिपादन हो। ‘विद्यापीठ- निबन्ध’ पद का भी अमृतानन्द ने यौगिक अर्थ ही किया है, जब कि भास्करराय विद्यापीठ का काशी, काश्मीर आदि पीठ तथा निबन्ध का ‘ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थ’ अर्थ करते हैं। तन्त्रों के पीठ विभाग की चर्चा हम नि० षो० उपो० (पृ० ५६-५७) में कर चुके हैं। ब्रह्मयामल के प्रमाण से डॉ० प्रबोधचन्द्र बागची ने २योगिनीहृदय आदि को विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्र कहा है। विद्या, मन्त्र, मुद्रा और मण्डल के प्रतिपादक भिन्न- भिन्न तन्त्रों की स्थिति उसी प्रकार की होनी चाहिये, जैसे कि बौद्ध तन्त्रों में क्रिया, चर्या, योग और अनुत्तर तन्त्रों की अलग-अलग उपलब्धि होती है। क्षेमराज ने ३‘स्वच्छन्दतन्त्र को चतुष्पीठ महातन्त्र कहा है। इससे ऐसा लगता है कि इन विषयों के स्वतन्त्र तन्त्र-ग्रन्थों के ही समान सिद्धान्त शैवागमों की पद्धति पर सभी विषयों का एक साथ वर्णन करने वाले तन्त्र-ग्रन्थ भी आविर्भूत होने लगे थे। विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्रों अथवा निबन्ध ग्रन्थों में महातत्त्वार्थ आदि विषय प्रतिपादित हुए होंगे। यहीं (२।८५) विद्यार्णवगम शब्द प्रयुक्त हुआ है। हमारी दृष्टि में यहाँ भी विद्यापीठ सम्बन्धी आगम ग्रन्थों का उल्लेख है। १. हिन्दू तान्त्रिक लिटरेचर इन संस्कृत, पृ. ६२ की १७ संख्या की टिप्पणी देखिये। २. स्टडीज इन दी तन्त्राज, पृ. १०४-१०५ ३. ‘चतुष्पीठं महातन्त्रम्’ (स्व० तं० १. १) की उद्योत-टिप्पणी देखिये।

[ १२ ] अभियुक्तवचन के अन्तर्गत दीपिका में शिवानन्द के सुभगोदय, सुभगोदयवासना और सौभाग्यहृदय स्तोत्र¹ के वचन, प्रपंचसार, भट्ट गंगाधर, कुलार्णव, अम्बास्तव, काव्यप्रकाश, परापंचाशिका, भास्कररायसंमत नित्याषोडशिकार्णव तथा उद्याकरपद्धति के वचन उद्धृत हैं। भास्करराय नि० षो० के पंचम पटल के अन्त में कुछ अधिक श्लोकों का सन्निवेश कर उनकी व्याख्या करते हैं। ऐसे स्थलों पर हमने टिप्पणियाँ दी हैं। इन वचनों की ही तरह अमृतानन्द कुलार्णव और परापंचाशिका के वचनों को भी अभियुक्त वचन मानते हैं। स्पष्ट है कि उन्होंने इन वचनों को कुलार्णव तन्त्र से न लेकर किसी अभियुक्त द्वारा रचित ग्रन्थ से लिया है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि परापंचा- शिका के कर्ता आद्यनाथ कोई व्यक्ति है, शिव नहीं। परापंचाशिका का यहाँ (पृ. ३३३) उद्धृत एक श्लोक परापंचाशिका की किसी भी मातृका में नहीं मिलता। अस्मदुक्त शब्द से अमृतानन्द ने अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुभगोदय, चिद्विलासस्तव और तत्त्वविमर्शिनी को उद्धृत किया है। आगमशास्त्र और चतुःशतीशास्त्र के नाम से यहाँ नित्याषोडशिकार्णव उद्धृत है। आगमान्तर से दीपिकाकार एक जगह (पृ० ३२९) शारदातिलक का ग्रहण करते हैं। अन्यत्र वे किस आगम को लेते हैं, इसका पता नहीं चलता। तन्त्रान्तर के नाम से उन्होंने कुसुमांजलिकारिका, न्यायभाष्य, दशरूपक, ब्रह्मसिद्धि, शारदातिलक, व्याकरणशास्त्र तथा सर्वमङ्गलाशास्त्र के वचनों को उद्धृत किया है। न्यायभाष्य का वचन यहाँ चार बार उद्धृत है। पृ० ३३२ का उद्धरण कुछ लम्बा है और इसका आगे वाला अंश वहाँ उपलब्ध नहीं है। शारदातिलक के दो वचन यहाँ उद्धृत हैं। इससे ज्ञात होता है कि शारदातिलक की रचना अमृतानन्द से पहले हो चुकी थी। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अमृतानन्द शारदातिलक को आगमान्तर अथवा तन्त्रान्तर के नाम से उद्धृत करते हैं, अतः वह श्रीशास्त्र का ग्रन्थ नहीं हो सकता, जैसा कि ²कुछ लोगों का मानना है। निघण्टु के नाम से दो वचन अमरकोश के हैं। बाकी एक वचन किस कोश का है, हम पता नहीं पा सके। कुछ अन्य उद्धरणों के भी मूलस्थान की खोज पाने में हम असफल रहे हैं। प्रमाणवचन कहाँ के हैं, इसका भी हम पता नहीं चला सके, किन्तु प्रामाणिकवचन के अन्तर्गत शिवानन्द का सौभाग्यहृदयस्तोत्र, स्तोत्रावली, भास्कररायसंमत नित्या- षोडशिकार्णव, कुलार्णव और ज्ञानकारिका ? के श्लोक उद्धृत हैं। स्तोत्रावली का वचन भट्ट उत्पल की शिवस्तोत्रावली में उपलब्ध नहीं हुआ। भास्कररायसंमत नि० षो० तथा कुलार्णव के विषय में ऊपर लिखा जा चुका है। हमारा अनुमान है कि ये वचन १. शिवानन्द के इन तीन ग्रन्थों पर किये गये शोध कार्य पर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दिल्ली की डॉ० मधु खन्ना को अभी डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई है। २. लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग, उपोद्घात, पृ. ४६ की टिप्पणी देखिये।

[ १३ ] संकेतपद्धति के हो सकते हैं। यह विषय भी टिप्पणियों में अंकित किया गया है। १ज्ञानकारिका डॉ० प्रबोधचन्द्र बागची के कौलज्ञाननिर्णय के संस्करण में समाविष्ट है। वेदरहस्य के नाम से उपनिषद् के वचन उद्धृत हैं और महाकवि के नाम से कालिदास के रघुवंश और कुमारसंभव के। त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के विषय में शिवानन्द का कहना है कि पहले इसकी उत्पत्ति २कश्मीर में हुई, किन्तु कश्मीरी विद्वान् जयरथ३ कहते हैं कि ईश्वरशिव और विश्वावर्त प्रथमतः इस सिद्धान्त को कश्मीर ले आये। ४हम बता चुके हैं कि लघुस्तव(स्तुति) के रचयिता धर्माचार्य भृगुकच्छ के निवासी थे और (त्रिपुरीसुन्दरी)- दण्डक५ के कर्ता दीपकनाथ के प्रभाव को राजा भोज ने देखा था। जयरथ ६दीपक- नाथ को नि० षो० का प्रथम व्याख्याकार मानते हैं। हमारा विचार है कि गुजरात और मध्यप्रदेश से यह सम्प्रदाय कश्मीर में पहुँचा और फिर वहाँ से दक्षिण देश में। हम देखते हैं कि दक्षिण देश के निवासी गुरुनाथपरामर्श के रचयिता मधुराज योगी अभिनवगुप्त के जीवनकाल में ही कश्मीर पहुँचे थे। वे वहाँ से अर्जित ज्ञान को दक्षिण में ले गये और बाद में दक्षिण में इस ज्ञान का विस्तार हुआ। दक्षिण के शिवानन्द आदि आचार्य अपने को धर्माचार्य, दीपकनाथ आदि सिद्धों की परम्परा से प्राप्त ज्ञान, जो कि ओघ या ओवल्ली के नाम से जाना जाता है, उत्तराधिकारी मानते हैं। लगता है यह परम्परा उनको कश्मीर से प्राप्त हुई। इसीलिये वे इस सम्प्रदाय की उत्पत्ति कश्मीर में मानते हैं। पुण्‍यानन्द और अमृतानन्द भी शिवानन्द, विद्यानन्द आदि की परम्परा में आते हैं। अतः इनकी स्थिति दक्षिण देश में ही माननी चाहिये, कश्मीर में नहीं। पुण्‍यानन्द और अमृतानन्द को कश्मीरी मानने की मान्यता का पुनरीक्षण अपेक्षित है। आज अद्वैतवादी शैवदर्शन को कश्मीर से तथा द्वैतवादी शैवदर्शन को दक्षिण से जोड़ने की प्रवृत्ति काम कर रही है। यह सही है कि अद्वैतवादी प्रत्यभिज्ञा दर्शन के १. दीपिका (पृ. ३२३) में उद्धृत “पिण्डे मुक्ताः” आदि श्लोक ज्ञानकारिका (११४-५) का बताया गया है, किन्तु यह वहाँ उपलब्ध नहीं है। २. "सम्प्रदायस्य कश्मीरोद्भूतत्वात्" (ऋजुविमर्शिनी, पृ. ११४)। ३. "वस्तुतो ह्यस्य दर्शनस्यैतदेवाचार्यद्वयं कश्मीरेष्ववतारकम्" (वाम. विव., पृ. ४८)। ४. द्रष्टव्य—आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ. ८६-८७ ५. “भोजदेवदृष्टचमत्कारो महादेशिकप्रवरः श्रीमान् दीपकाचार्यो दण्डककर्ता” (ऋजु. पृ. २२३)। ६. पृ. ८ की पांचवी टिप्पणी देखिये।

[ १४ ] विकास में सर्वाधिक योगदान कश्मीर का तथा द्वैतवादी शैवदर्शन के संरक्षण और संव- र्धन में दक्षिण का रहा है, किन्तु यह प्रक्रिया एकान्ततः वहीं तक सीमित नहीं रही और कालक्रम से इसका संबन्ध अन्य प्रदेशों से भी रहा है। हम कह सकते हैं कि प्रत्यभिज्ञा दर्शन का प्रथमतः विकास कश्मीर में हुआ और फिर वह पूरे देश में फैल गया। इसी तरह से द्वैतवादी शैवदर्शन का विकास पहले मध्यदेश में हुआ और बाद में यह दक्षिण देश तक सीमित रह गया । १अभिनवगुप्त ने मध्यदेश को सभी शास्त्रों का सदन (घर) बताया है। उसके पूर्वज यहीं से कश्मीर गये थे। द्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी और अद्वैतवादी दर्शनों की प्रवृत्ति उनके अनुसार आमर्दक आदि मठों के माध्यम से हुई। डॉ० वासुदेव विष्णु मिराशी२ ने अनेक शिलालेखों के प्रमाण से द्वैतवादी शैवाचार्यों की मठीय परम्परा पर पर्याप्त प्रकाश डाला है कि उन्होंने किस प्रकार मध्यदेश में प्रसूत इस ज्ञान का सर्वत्र प्रसार किया। डॉ० वी० एस० पाठक३ ने त्रिलोचन शिवाचार्य की सिद्धान्तसारावली के वचन को उद्धृत कर यह बताया है कि यात्रा के प्रसंग में आये काँची के राजा राजेन्द्र चोल इनको काशी से अपने साथ ले गये। द्वैतवादी शैवसिद्धान्त के १८ पद्धतिकारों की सूचना देने वाले दो श्लोक४ उपलब्ध हैं। इनमें प्रारम्भ के कुछ आचार्य कश्मीर के हैं और १. "निःशेषशास्त्रसदनं किल मध्यदेशः" (तन्त्रालोक, ३७।३८) । त्र्यम्बकामर्दकाभिख्यश्रीनाथा अद्वये द्वये । द्वयाद्वये च निपुणाः क्रमेण शिवशासने ।। (तन्त्रा. ३६।१२) २. द्रष्टव्य—प्राच्यविद्या निबन्धावली, खण्ड ४ में प्रकाशित "पतंगशंभु का ग्वालियर संग्रहालय शिलालेख" शीर्षक निबन्ध, पृ. १७२-१८२, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, प्रथम संस्करण, सन् १९७४ ३. राजेन्द्रचोल इत्याख्यश्चोलभूपो महीं वसन् । गङ्गास्नानार्थमागत्य दृष्ट्वा शैवान् वरांस्तदा ।। स्नात्वा प्रतिनिवृत्तः सन् तान् समादाय शैवकान् । स्वराज्ये स्थापयामास शैवाचार्यवरांस्तदा ।। काञ्चीमध्ये चोलभूमौ सर्वत्रैव प्रविस्तराः । शैव कल्ट इन नार्दनं इण्डिया, पृ. ३८ टिप्पणी । ४. उग्रोत्तरज्योतिरथोपसद्यः श्रीरामकण्ठोऽपि च वैद्यकण्ठः । नारायणश्चापि विभूतिकण्ठः श्रीनीलकण्ठोऽपि च सोमशम्भुः ।। ईशानशम्भुर्हृदयादिना स्याद् विरञ्चिवैराग्यकयुग्मवाच्यौ । ज्ञानस्त्रिणेत्रो बहुणेश्वरी ज्ञावित्यादयस्ते स्युरघोरशम्भुः ।। द्रष्टव्य—शैवभूषण ।

[ १५ ] बाद के आचार्य मध्यदेश के। दक्षिण के आचार्यों का नाम अन्त में है। इससे हमारी यह मान्यता बनती है कि त्रिलोचन शिवाचार्य से दक्षिण भारत के पद्धतिकारों की परम्परा प्रारम्भ हुई और वहाँ द्वैतवादी शैवदर्शन की प्रतिष्ठा हुई। त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के प्रसंग में अद्वैतवादी प्रत्यभिज्ञादर्शन तथा द्वैतवादी शैवसिद्धान्त की चर्चा हमने इसलिये की कि ज्ञान की इन धाराओं के विकास में पूरे देश का योगदान रहा है। त्रिपुरा सम्प्रदाय के विषय में यह विशेष रूप से कहा जा सकता है। त्रिपुरा मत के अन्दर विकसित कश्मीर, केरल और गौडीय सम्प्रदाय की चर्चा हम 'अन्यत्र कर चुके हैं। ये सम्प्रदाय पूरे देश को अपने में समेटे हुए हैं। इस ज्ञान का विकास केवल संस्कृत भाषा में ही नहीं, लौकिक भाषाओं में भी हुआ। "हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर" नामक ग्रन्थ की चर्चा हम कर चुके हैं। इस ग्रन्थ के दूसरे भाग का शीर्षक है—"तान्त्रिक शाक्त लिटरेचर इन मार्डन इण्डियन लैंग्वेजेज"। इस भाग में बंगला भाषा में रचित शाक्त साहित्य का कुछ विस्तार से तथा मैथिली, राज- स्थानी, व्रजभाषा और पंजाबी भाषा में रचित साहित्य का कुछ संक्षेप में वर्णन किया गया है। सौभाग्य से हमें इधर बड़ोदरा संस्कृत महाविद्यालय के प्राध्यापक शास्त्री श्री उदयन हरिशंकर शुक्ल से गुजराती भाषा में लिखी "शाक्त सम्प्रदाय"२ नामक पुस्तक मिली। इसमें गुजराती भाषा में निबद्ध शाक्त साहित्य पर पूरा एक प्रकरण है (पृ० १११- १४४)। यहाँ नाथ भवान, वल्लभ भट्ट, मीठू, जनो बाई, कवि बाल और नृसिंहाचार्य की जीवनी तथा उनके साहित्य पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इनमें से मीठू ३हंस- विलास के रचयिता हंसमिट्ठु से अभिन्न हैं। "शाक्त सम्प्रदाय" नामक उक्त ग्रन्थ की यह विशेषता है कि इनमें बौद्ध और जैन धर्म में समाविष्ट शाक्त तत्त्वों की भी अलग अलग प्रकरणों में चर्चा की गई है। बौद्ध धर्म के विषय में लेखक बहुत ही उदारवादी हैं। उनका कहना है कि आधुनिक हिन्दू धर्म की स्वरूप-रचना में बौद्ध धर्म और तत्त्व- ज्ञान की बहुत बड़ी देन रही है (पृ० १५६)। बौद्ध और जैन धर्म के प्रति श्रद्धेय श्री श्री गोपीनाथ कविराज का भी यही दृष्टिकोण रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि बौद्ध और जैन धर्म के साथ हिन्दू धर्म की बात उठाने पर जो विरोध भावना जगती है, वह वैष्णव, शैव या शाक्त सम्प्रदायों की चर्चा करने पर नहीं उठती। इसका कारण यह १. शक्तिसंगम तन्त्र, छिन्नमस्ता चतुर्थ खण्ड, उपोद्घात पृ. ३०-३२, गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज, बड़ोदरा, सन् १९७८ २. श्री फार्बस गुजराती सभा, बम्बई द्वारा सन् १९३२ में प्रकाशित, श्री नर्मदाशंकर देवशंकर महेता द्वारा लिखित इस ग्रन्थ में शाक्त सम्प्रदाय के सिद्धान्तों, गुजरातमें उनके प्रचार और गुजराती साहित्य पर उनके प्रभाव पर विचार किया गया है। ३. यह ग्रन्थ गायकवाड़ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, बड़ोदरा से सन् १९३० में प्रकाशित हो चुका है।

[ १६ ] है कि हिन्दू शब्द हम पर आरोपित है और इस आरोपित विभ्रम के सहारे ही हम बाह्य आचारों के घरौंदों में बंटते चले जा रहे हैं। इसके विपरीत बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव, शाक्त आदि शब्द इसी धरती की उपज हैं और इन्होंने कालक्रम से कुछ मानों में अपने में एक समान दृष्टिकोण का उन्मीलन कर लिया है। शाक्त मत की इन सब पर बहुत गहरी छाप है। शाक्त मत की इस व्यापक दृष्टि का योगिनीहृदय में पूर्ण विकास हुआ है। इस व्यापक दृष्टिकोण को ही उजागर करने का अब हम लघु प्रयास कर रहे हैं। चक्रसंकेत क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञाहृदय के आठवें सूत्र की व्याख्या में कहा है कि 'तान्त्रिकों के मत में आत्मतत्त्व विश्वोत्तीर्ण है, कुल आदि आम्नायों के अनुसार वह विश्वमय है और त्रिक आदि दर्शन के ज्ञाताओं के मत से वह विश्वोत्तीर्ण भी है और विश्वमय भी। योगिनीहृदय और दीपिका में इस तृतीय मत को स्वीकार किया गया है। महातत्त्वार्थ का निरूपण करते हुए यहाँ (२।७३-७४) बताया गया है कि निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप, विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर लेना ही महातत्त्वार्थ है। विश्वोत्तीर्ण तत्त्व स्वेच्छा से स्वात्मभित्ति में विश्व का उन्मीलन कर विश्वमय बन जाता है और फिर अपने में ही विश्व को समेट भी लेता है, अतः यह विश्वमय भी है और विश्वोत्तीर्ण भी। यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व विश्वमय बनने के लिए कैसे श्रीचक्र का स्वरूप धारण कर लेता है, परदेवता श्रीचक्र के रूप में कैसे अवतरित होती है, प्रथम चक्रसंकेत प्रकरण में इसी का दार्शनिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। पाँच शक्ति त्रिकोणों और चार वह्नि त्रिकोणों के मिलने से श्रीचक्र का स्वरूप बनता है। यहाँ पाँच शक्ति त्रिकोणों को सृष्टि क्रम से, अर्थात् ऊर्ध्वमुख तथा चार वह्नि त्रिकोणों को लयक्रम से, अर्थात् अधोमुख रखना पड़ता है। श्रीचक्र के उद्धार की दो विधियाँ नित्याषोडशिकार्णव ( १।२९-४१, ५९-७५) में बता दी गई हैं, अतः उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है। यहाँ बताया गया है कि वह (विश्वोत्तीर्ण) आद्या शक्ति जब विश्वमय बनना चाहती है, तो उसमें स्पन्दन (स्फुरत्ता) होता है और इस स्पन्दन का प्रथम परिणाम है श्रीचक्र। यह चक्र कामकलारूप है। यहाँ (१।११) कामकला को प्रकाश-परमार्थ और श्रीचक्र को प्रसार-परमार्थ (१।२४) कहा गया है। प्रकाशविमर्श सामरस्यमय १. "विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वमिति तान्त्रिकाः। विश्वमयमिति कुलाद्याम्नायनिष्ठाः। विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं चेति त्रिकादिदर्शनविदः" (पृ. ५६)। ठाकुर जयदेवसिंह संस्करण, मोतीलाल बनारसीदास, सन् १९६३ (अंग्रेजी अनुवाद)। मूल ग्रन्थ के ३, ४ सूत्र भी द्रष्टव्य हैं।

[ १७ ]

बिन्दु में कामकला की अव्यक्त स्थिति तथा उसके उन्मीलन के प्रकार का वर्णन हम ग्रन्थभाग, पृ. १६-१७ की टिप्पणी में कर चुके हैं। इस कामकला के प्रसार से ही विश्वमय श्रीचक्र की निष्पत्ति होती है। नौ चक्रों की समष्टि को श्रीचक्र की संज्ञा दी गई है। उनमें से प्रथम बैन्दव चक्र में कामकला अव्यक्त रूप से तथा द्वितीय त्रिकोण चक्र में व्यक्त रूप से अवस्थित है। कामकला का यह व्यक्त स्वरूप शारदा लिपि के ईकार में स्पष्ट देखा जा सकता है। इस प्रथम त्रिकोण (मध्य त्र्यश्र) के ऊपर सृष्टि और संहार के क्रम से शक्ति और वह्नि (शिव) त्रिकोण की स्थापना की जाती है, तो उससे नवयोन्यात्मक वसु(अष्ट)कोण चक्र की निष्पत्ति होतो है। इस नवयोनि चक्र में धर्म, अधर्म, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा, माता, मेय और प्रमा की स्थिति मानी जाती है। मध्य त्र्यश्र में प्रमा की तथा उसके चारों तरफ फैले अन्य आठ त्रिकोणों में धर्म आदि की स्थिति रहती है। यह 'नवयोनि चक्र' (बिन्दु, त्रिकोण और वसुकोण की समष्टि) अम्बिका शक्ति का विलास है और यह सोलह स्वरों से आवृत है। नौ त्रिकोण और बैन्दव चक्र की चारों तरफ फैल रही दशविध प्रभा से अन्तर्दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। २यकार से लेकर ळ क्ष पर्यन्त दस वर्ण इसमें स्थित हैं और यह पाँच महाभूत एवं पाँच तन्मात्राओं का आलम्बन है। प्रथम दशार से ही द्वितीय दशार का स्फुरण होता है और यह ककार आदि दस वर्णों तथा ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों


१. "तत्राद्यं नवयोनि स्यात्" (१।७५) यहाँ नवयोनि पद बिन्दु, त्रिकोण और वसु- कोण—इन तीनों चक्रों का बोधक माना गया है। इन तीनों चक्रों की वासना यहाँ एक साथ बताई गई है और यह पूरा प्रकरण नवयोनि चक्र का ही निरूपक है। अतः "चक्रं नवात्मकम्" (१।१३) इस पंक्ति का भी अर्थ तदनुसार ही करना चाहिये। दीपिकाकार ने यहाँ त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों की तथा करशुद्धिकरी आदि नौ चक्रेश्वरों विद्याओं की चर्चा उठाई है। इसके विपरीत भास्करराय ने नवयोन्यात्मक चक्र की नवविध वासना का उल्लेख कर वशिनी आदि आठ विद्याओं को मूलविद्या के साथ मिलाकर उसकी नवमन्त्रात्मकता बताई है और कहा है कि नवयोनि चक्र के प्रकरण में त्रैलोक्यमोहन आदि चक्रों की तथा करशुद्धिकरी आदि विद्याओं की चर्चा अनावश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने प्रकारान्तर से दीपिका व्याख्या की संगति भी बैठा दी है। २. ग्रन्थभाग पृ. २६ की टिप्पणी देखिये। दीपिकाकार (१।४५-४७) ने आदि-अान्त पचास ही वैखरी वर्ण माने हैं। मूल ग्रन्थ (२।७०) में भी वैखरी वाणी के पचास वर्ण ही स्वीकृत हैं। ऐसी स्थिति में दीपिका का प्रस्तुत अंश समाधान-सापेक्ष है।

[ १८ ] के दस विषयों का उद्भावक है। बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण और अन्तर्दशार चक्रों की चार किरणों तथा बहिर्दशार चक्र की दस किरणों के मिलने पर चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है। यहाँ टकार से भकार पर्यन्त वर्णों की तथा दस बाह्य करण और चार अन्तः- करण—इस प्रकार चतुर्दश इन्द्रियों की निष्पत्ति होती है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि पृथिवी आदि तत्त्वों की रचना शिव के अंश से और वर्णों की रचना शक्ति के अंश से होती है। इस प्रकार पांच शक्ति चक्रों और चार वह्नि (शिव) चक्रों से निष्पन्न ये अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार नामक तीन चक्र रौद्री शक्ति की प्रभा से उन्मीलित होते हैं। यहाँ तक छः चक्रों की निष्पत्ति पूरी होती है। षोडशदल और अष्टदल चक्रों की निष्पत्ति वामा शक्ति से तथा चतुरस्र चक्र की ज्येष्ठा शक्ति से होती है। इस प्रकार अम्बिका, रौद्री, वामा और ज्येष्ठा शक्ति की सहायता से इस परिपूर्ण श्रीचक्र का विस्तार होता है। इनमें से बिन्दु और त्रिकोण चित्कलामय हैं। अष्टकोण शान्त्यतीता से, अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार शान्ति कला से, अष्टदल विद्या कला से, षोडशदल प्रतिष्ठा कला से और चतुरस्र चक्र निवृत्ति कला से प्रकट होते हैं। श्रीचक्र का यह स्वरूप सृष्टिक्रम कहलाता है। इससे उलटा है संहारक्रम। इन दोनों ही क्रमों से श्रीचक्र की भावना और पूजा की जाती है। सृष्टिक्रम जैसे बिन्दु से प्रारंभ होता है, उसी तरह से संहारक्रम चतुरस्र, अर्थात् त्रैलोक्यमोहन चक्र से। इस संहारक्रम से इन नौ चक्रों में क्रमशः नाद, बिन्दु, कला, ज्येष्ठा, रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी और सर्वानन्दा नामक नौ शक्तियां निवास करती हैं। इनमें से नाद और बिन्दु शान्ताशक्तिमय, कला इच्छाशक्तिमय, ज्येष्ठा ज्ञानशक्तिमय तथा बाकी की पाँच शक्तियां क्रियाशक्ति का विलास मानी जाती हैं। परमार्थतः कामकला के ही प्रसार से श्रीचक्र का यह वर्णमय, तत्त्वमय और शक्तिमय स्वरूप उन्मीलित होता है। इन नौ चक्रों की क्रमशः अकुल, विषु, शाक्त, वह्नि, नाभि, अनाहत शुद्ध, लम्बिकाग्र और भ्रूमध्य में एवं बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना में तथा महाबिन्दु में त्रिविध भावना की जाती है। इनमें से प्रथम भावना सकल, दूसरी भावना सकलनिष्कल तथा तीसरी भावना निष्कल कही जाती है। महाबिन्दु में निष्कल भावना में प्रविष्ट योगी जब ऊपर उठता है, तो उसको देश, काल, आकार आदि से रहित उस परम महान् स्वभावसुन्दर तत्त्व का साक्षात्कार होता है, जो सदा परमानन्द से परिपूर्ण है। यह पहले बताया जा चुका है कि विश्वोत्तीर्ण तत्त्व जब विश्वमय बनना चाहता है, तो उसमें अनोखी स्फुरत्ता का उद्भव होता है। वह्नि के सम्पर्क से जैसे घी पिघलने लगता है, वैसे ही उस परम शिव के सम्पर्क से विमर्श-शक्ति स्यन्दित हो उठती है और

[ १९ ]

इसी से विश्वलहरी स्थान, मातृत्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्राकट्य होता है। उस समय विमर्शमयी परमा कला सर्वप्रथम शान्ता और अम्बिका शक्ति का रूप धारण कर लेती है। इसी को परा वाक् भी कहा जाता है। यह परा वाणी अपने में बीज रूप से स्थित विश्व को जब प्रकट करना चाहती है, तब विश्व का वमन करने के कारण अंकुश सदृश वामा शक्ति का रूप धारण कर लेती है। यह वामा शक्ति ही इच्छा शक्ति के साथ मिल कर पश्यन्ती वाक् के रूप में परिणत हो जाती है। इसी तरह से ज्येष्ठा शक्ति और ज्ञान शक्ति के मिलन से मध्यमा वाक् अभिव्यक्त होती है। शृंगाट (त्रिकोण) की सीधी रेखा इसका बोध कराती है। वामा शक्ति के द्वारा सृष्ट विश्व की स्थिति में यह कारणभूत है, उसका पालन करती है। विश्व का संहार करने की इच्छा होने पर वह शक्ति अपने बैन्दव स्वरूप में पुनः प्रविष्ट हो जाती है। तब शृंगाट की दक्षिण रेखा के निर्माण के साथ इसका स्वरूप पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है। यह रौद्री शक्ति का व्यापार है। क्रिया शक्ति के साथ मिल कर यह वाणी के विस्तार को मुखरित करने वाली वैखरी वाक् बन जाती है। इस प्रकार बैन्दव (बिन्दु और त्रिकोण) चक्र में अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि चार-चार शक्तियों तथा परा आदि चार वाणियों की भावना तथा पूजा की जाती है, इनको तन्मय माना जाता है। शिव (प्रकाशांश) से आविर्भूत अम्बिका आदि तथा शक्ति (विमर्शांश) से आविर्भूत शान्ता आदि शक्तियों में यह सारा विश्व बीज में वृक्ष की भांति छिपा रहता है। इन्हीं शक्तियों से कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्याण नामक पीठों की सृष्टि होती है। ये पीठ कन्द, पद, रूप और रूपातीत नामक आन्तर स्थानों में स्थित हैं। कन्द या पिण्ड को आधार, पद या हंस को हृदय, रूप या बिन्दु को भ्रूमध्य तथा रूपातीत को ब्रह्मरन्ध्र कहा जाता है। यह चिन्मय स्थान है। इन पीठों का आकार क्रमशः चतुरस्र, षड्बिन्दुमयं, अर्धचन्द्र और त्रिकोण जैसा होता है, क्योंकि ये क्रमशः पृथिवी, वायु, जल और तेज तत्त्व के प्रतीक हैं। इनका वर्ण क्रमशः पीत, धूम्र, श्वेत और रक्त है। इन पीठों में क्रमशः स्वयंभू, बाण, इतर और पर लिंग स्थित हैं। स्वयंभू लिंग का वर्ण पीत है। यह त्रिकूटाकार है तथा अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वरों से आवृत्त है। बाण लिंग का वर्ण बन्धूक पुष्प के जैसा है। यह त्रिकोणाकार है और ककार से टकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। इतर लिंग का वर्ण श्वेत है। इसका आकार कदम्बफल के समान गोल है और यह थकार से सकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। पर- तेजोमय पर लिंग का कोई आकार नहीं होता। इन्द्रियों से इसको देखा नहीं जा सकता, अतः बिन्दु से इसका बोध कराया जाता है। यह अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त वर्णों से आवृत्त है। यह परमानन्द का सार तथा नित्योदित स्वरूप वाला है।

[ २० ] बिन्दु सहित त्रिकोण में स्थित अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि शक्तिचतुष्टय, मातृका(वाणी)चतुष्टय, पीठचतुष्टय और लिंगचतुष्टय—ये सभी वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज तथा इनकी समष्टि तुरीय विद्या के वाच्य रूप हैं, अर्थात् बीजत्रया- त्मिका तुरीय श्रीविद्या से इनका बोध होता है। मेय, मान और माता की त्रिपुटी को कुल और इनकी समष्टि को कौल कहा जाता है। ऊपर निर्दिष्ट सभी चार संख्या वाले पदार्थ कुल और कौल विभाग में समाविष्ट हैं और क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुर्य (तुरीय) दशा वाले हैं। सभी प्राणियों में संवित्ति के रूप में भासमान विश्वोत्तीर्ण अनुत्तर (प्रकाशात्मक) परम तत्त्व इन सबसे ऊपर है। अपनी इच्छा से वह स्वात्मभित्ति में स्वेच्छा-तूलिका से विश्वमय चित्र बना डालता है, स्वयं विश्वमय हो जाता है। वह परप्रकाशात्मक स्वरूप इस तरह से विमर्श शक्ति से सम्पन्न होकर सहज आनन्द की सृष्टि का कारण बन कर सबके लिये स्पृहणीय हो जाता है। वह मेय, माता, प्रमा और प्रमाण के रूप में बँट जाता है और इच्छा, ज्ञान एवं क्रियात्मक शृंगाट (त्रिकोण) का स्वरूप धारण कर लेता है। विमर्श शक्ति विश्व का आकार ग्रहण करती है, किन्तु उसका अपना स्वरूप तो प्रकाशात्मक शिव में स्थित है। कामेश्वर के अंक रूपी पर्यंक में विश्राम करने वाला विमर्श शक्ति का यह स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है। इच्छाशक्तिमय पाश, ज्ञानशक्तिमय अंकुश और क्रियाशक्तिमय धनुष-बाण को धारण करने से कामेश्वर और कामेश्वरी के इस युगल स्वरूप की शोभा और भी बढ़ जाती है। कामेश्वर-कामेश्वरी का यह युगल स्वरूप आश्रय और आश्रयी के भेद से आठ आयुध वाला हो जाता है। यही मिथुन स्वरूप बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण आदि के क्रम से विकसित नवचक्रात्मक श्रीचक्र में विविध रूपों में अपना विस्तार कर लेता है और इस तरह से अपने श्रीचक्र रूपी शरीर में अपनी अवयव शक्तियों के साथ यह परम तेज अवतरित हो जाता है, विश्वोत्तीर्णता का परित्याग कर विश्वमय बन जाता है। यहाँ प्रकाशात्मक परमेश्वर (कामेश्वर) समुद्र स्थानीय, विमर्शमयी शक्ति (कामे- श्वरी) जलस्थानीय और उसकी अवयव शक्तियाँ तरंग स्थानीय हैं। जैसे समुद्र के जल से उठी लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी तरह से ३६ तत्त्वों वाला यह सारा विश्व- मय शक्तिचक्र इस युगल स्वरूप से ही उदित होता है और उसी में विलीन हो जाता है। चिति शक्ति स्वात्मस्वरूप भित्ति में जब स्वेच्छा से विश्व की रचना के लिये परिपूर्ण इच्छा शक्ति से सम्पन्न हो प्रकाश और विमर्श का सहारा लेती है, तो उस समय उसकी क्रिया शक्ति विश्व के मोदन और द्रावण व्यापार में प्रवृत्त हो मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की दस मुद्राएँ यहाँ वर्णित हैं। इनमें से पहली मुद्रा का विनियोग