योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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इसी से विश्वलहरी स्थान, मातृत्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्राकट्य होता है। उस समय विमर्शमयी परमा कला सर्वप्रथम शान्ता और अम्बिका शक्ति का रूप धारण कर लेती है। इसी को परा वाक् भी कहा जाता है। यह परा वाणी अपने में बीज रूप से स्थित विश्व को जब प्रकट करना चाहती है, तब विश्व का वमन करने के कारण अंकुश सदृश वामा शक्ति का रूप धारण कर लेती है। यह वामा शक्ति ही इच्छा शक्ति के साथ मिल कर पश्यन्ती वाक् के रूप में परिणत हो जाती है। इसी तरह से ज्येष्ठा शक्ति और ज्ञान शक्ति के मिलन से मध्यमा वाक् अभिव्यक्त होती है। शृंगाट (त्रिकोण) की सीधी रेखा इसका बोध कराती है। वामा शक्ति के द्वारा सृष्ट विश्व की स्थिति में यह कारणभूत है, उसका पालन करती है। विश्व का संहार करने की इच्छा होने पर वह शक्ति अपने बैन्दव स्वरूप में पुनः प्रविष्ट हो जाती है। तब शृंगाट की दक्षिण रेखा के निर्माण के साथ इसका स्वरूप पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है। यह रौद्री शक्ति का व्यापार है। क्रिया शक्ति के साथ मिल कर यह वाणी के विस्तार को मुखरित करने वाली वैखरी वाक् बन जाती है। इस प्रकार बैन्दव (बिन्दु और त्रिकोण) चक्र में अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि चार-चार शक्तियों तथा परा आदि चार वाणियों की भावना तथा पूजा की जाती है, इनको तन्मय माना जाता है। शिव (प्रकाशांश) से आविर्भूत अम्बिका आदि तथा शक्ति (विमर्शांश) से आविर्भूत शान्ता आदि शक्तियों में यह सारा विश्व बीज में वृक्ष की भांति छिपा रहता है। इन्हीं शक्तियों से कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्याण नामक पीठों की सृष्टि होती है। ये पीठ कन्द, पद, रूप और रूपातीत नामक आन्तर स्थानों में स्थित हैं। कन्द या पिण्ड को आधार, पद या हंस को हृदय, रूप या बिन्दु को भ्रूमध्य तथा रूपातीत को ब्रह्मरन्ध्र कहा जाता है। यह चिन्मय स्थान है। इन पीठों का आकार क्रमशः चतुरस्र, षड्बिन्दुमयं, अर्धचन्द्र और त्रिकोण जैसा होता है, क्योंकि ये क्रमशः पृथिवी, वायु, जल और तेज तत्त्व के प्रतीक हैं। इनका वर्ण क्रमशः पीत, धूम्र, श्वेत और रक्त है। इन पीठों में क्रमशः स्वयंभू, बाण, इतर और पर लिंग स्थित हैं। स्वयंभू लिंग का वर्ण पीत है। यह त्रिकूटाकार है तथा अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वरों से आवृत्त है। बाण लिंग का वर्ण बन्धूक पुष्प के जैसा है। यह त्रिकोणाकार है और ककार से टकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। इतर लिंग का वर्ण श्वेत है। इसका आकार कदम्बफल के समान गोल है और यह थकार से सकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। पर- तेजोमय पर लिंग का कोई आकार नहीं होता। इन्द्रियों से इसको देखा नहीं जा सकता, अतः बिन्दु से इसका बोध कराया जाता है। यह अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त वर्णों से आवृत्त है। यह परमानन्द का सार तथा नित्योदित स्वरूप वाला है।