भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ २० ] बिन्दु सहित त्रिकोण में स्थित अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि शक्तिचतुष्टय, मातृका(वाणी)चतुष्टय, पीठचतुष्टय और लिंगचतुष्टय—ये सभी वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज तथा इनकी समष्टि तुरीय विद्या के वाच्य रूप हैं, अर्थात् बीजत्रया- त्मिका तुरीय श्रीविद्या से इनका बोध होता है। मेय, मान और माता की त्रिपुटी को कुल और इनकी समष्टि को कौल कहा जाता है। ऊपर निर्दिष्ट सभी चार संख्या वाले पदार्थ कुल और कौल विभाग में समाविष्ट हैं और क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुर्य (तुरीय) दशा वाले हैं। सभी प्राणियों में संवित्ति के रूप में भासमान विश्वोत्तीर्ण अनुत्तर (प्रकाशात्मक) परम तत्त्व इन सबसे ऊपर है। अपनी इच्छा से वह स्वात्मभित्ति में स्वेच्छा-तूलिका से विश्वमय चित्र बना डालता है, स्वयं विश्वमय हो जाता है। वह परप्रकाशात्मक स्वरूप इस तरह से विमर्श शक्ति से सम्पन्न होकर सहज आनन्द की सृष्टि का कारण बन कर सबके लिये स्पृहणीय हो जाता है। वह मेय, माता, प्रमा और प्रमाण के रूप में बँट जाता है और इच्छा, ज्ञान एवं क्रियात्मक शृंगाट (त्रिकोण) का स्वरूप धारण कर लेता है। विमर्श शक्ति विश्व का आकार ग्रहण करती है, किन्तु उसका अपना स्वरूप तो प्रकाशात्मक शिव में स्थित है। कामेश्वर के अंक रूपी पर्यंक में विश्राम करने वाला विमर्श शक्ति का यह स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है। इच्छाशक्तिमय पाश, ज्ञानशक्तिमय अंकुश और क्रियाशक्तिमय धनुष-बाण को धारण करने से कामेश्वर और कामेश्वरी के इस युगल स्वरूप की शोभा और भी बढ़ जाती है। कामेश्वर-कामेश्वरी का यह युगल स्वरूप आश्रय और आश्रयी के भेद से आठ आयुध वाला हो जाता है। यही मिथुन स्वरूप बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण आदि के क्रम से विकसित नवचक्रात्मक श्रीचक्र में विविध रूपों में अपना विस्तार कर लेता है और इस तरह से अपने श्रीचक्र रूपी शरीर में अपनी अवयव शक्तियों के साथ यह परम तेज अवतरित हो जाता है, विश्वोत्तीर्णता का परित्याग कर विश्वमय बन जाता है। यहाँ प्रकाशात्मक परमेश्वर (कामेश्वर) समुद्र स्थानीय, विमर्शमयी शक्ति (कामे- श्वरी) जलस्थानीय और उसकी अवयव शक्तियाँ तरंग स्थानीय हैं। जैसे समुद्र के जल से उठी लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी तरह से ३६ तत्त्वों वाला यह सारा विश्व- मय शक्तिचक्र इस युगल स्वरूप से ही उदित होता है और उसी में विलीन हो जाता है। चिति शक्ति स्वात्मस्वरूप भित्ति में जब स्वेच्छा से विश्व की रचना के लिये परिपूर्ण इच्छा शक्ति से सम्पन्न हो प्रकाश और विमर्श का सहारा लेती है, तो उस समय उसकी क्रिया शक्ति विश्व के मोदन और द्रावण व्यापार में प्रवृत्त हो मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की दस मुद्राएँ यहाँ वर्णित हैं। इनमें से पहली मुद्रा का विनियोग