योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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आवाहन के लिये होता है। शेष मुद्राएँ एक-एक चक्र की पूजा में विनियुक्त हैं। ¹मुद्रा शब्द तन्त्रशास्त्र में अनेक अर्थों में प्रयुक्त है, किन्तु यहाँ दोनों हाथों की अंगुलियों के संयोग से बनने वाली मुद्राओं के लिये आया है। दाहिने हाथ की अंगुलियाँ प्रकाशात्मक तथा बायें हाथ की अंगुलियाँ विमर्शात्मक मानी जाती हैं। ये अंगुलियाँ क्रमशः वामा आदि तथा इच्छा आदि चार-चार शक्तियों की प्रतीक हैं। इन दसों मुद्राओं का बाह्य और आन्तर स्वरूप यहाँ (१।५७-७१) बताया गया है। इस तरह इस विश्वमय परा शक्ति की ज्ञानशक्ति से श्रीचक्र का और क्रियाशक्ति से मुद्राओं का आविर्भाव होता है। स्वयं विश्वमय परा देवता इच्छाशक्तिस्वरूप है। उसमें विविकीर्षा उत्पन्न होने पर ही सृष्टि का विस्तार होता है। इस श्रीचक्र की त्रिविध और नवविध भावना की जाती है। बिन्दु, त्रिकोण और वसु- कोण की एक प्रकार से; दो दशार और चतुर्दशार की दूसरे प्रकार से; अष्टदल, षोडश- दल और चतुरस्र की तीसरे प्रकार से, अर्थात् क्रमशः सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम से पूजा की जाती है। दीपिकाकार ने संकेतपद्धति के प्रमाण से इनका विवरण दिया है (१।७७)। बिन्दु से लेकर चतुरस्रपर्यन्त उद्धार सृष्टिक्रम तथा चतुरस्र से बिन्दुपर्यन्त उद्धार संहारक्रम कहलाता है। इन सबकी समष्टि का ही नाम त्रिपुरा चक्र है। इस चक्र के स्वरूप को जो ठीक से जान लेता है, उसको अपने आप भगवती त्रिपुरा का स्वरूप भासित हो जाता है। चक्र की नवविध भावना में नौ चक्रों की अलग-अलग उपासना की जाती है। इन नौ चक्रों के नाम यहाँ संहारक्रम से इस प्रकार बताये गये हैं—त्रैलोक्यमोहन, सर्वाशा- परिपूरक, सर्वसंक्षोभण, सर्वसौभाग्यदायक, सर्वार्थसाधक, सर्वरक्षाकर, सर्वरोगहर, सर्वसिद्धिमय और सर्वानन्दमय। इन शब्दों की लुभावनी पदव्याख्या दीपिकाकार ने की है (१।८२-८४)। इस श्रीचक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना की जाती है। इस परिपूर्ण चक्र की उपासना से साधक अजर और अमर हो जाता है। मन्त्रसंकेत प्रथम चक्रसंकेत प्रकरण में भगवती त्रिपुरसुन्दरी के अवतार-स्थान श्रीचक्र का स्वरूप बताने के बाद द्वितीय मन्त्रसंकेत प्रकरण में श्रीविद्या का स्वरूप और उसके षड्विध अर्थों का निरूपण किया गया है। यहाँ बताया गया है कि इस दिव्य मन्त्रसंकेत को जानने १. नित्याषोडशिकार्णव, उपोद्घात, पृ० ७५-७८ द्रष्टव्य। कर्णिका, रुचक आदि कापालिक मत संमत छः मुद्राएं (अथवा पाँच मुद्राएं) बौद्ध तन्त्रों में भी स्वीकृत हैं। शाक्त तन्त्रों में मुद्रा शब्द का प्रयोग चना-चबैना के लिये किया जाता है। बौद्ध तन्त्रों में कर्ममुद्रा, धर्ममुद्रा, ज्ञानमुद्रा और महामुद्रा के रूप में भी मुद्राओं का वर्णन मिलता है।