योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २२ ] वाला वीरचक्रेश्वर, अर्थात् परशिव स्वरूप हो जाता है। यहाँ सर्वप्रथम नौ नित्याओं के नौ मन्त्रों (विद्याओं) के नाम बताये गये हैं और सातवीं मूर्तिविद्या का उद्धार भी किया गया है, क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य आठ विद्याओं का उद्धार नि० षो० में ही बता दिया गया है। नौ विद्याओं के नामों से ही उनका कहाँ विनियोग होता है, यह भी ज्ञात हो जाता है। प्रसंगवश यहाँ इन विद्याओं के बाह्य और आन्तर न्यास का विधान कर नौ नित्याओं के नाम गिनाये गये हैं और कहा गया है कि पूर्व वर्णित नौ चक्रों में इन नौ नित्याओं का पूजन करना चाहिये। आद्या शक्ति ही पूजा के समय नौ रूप धारण कर लेती है। वस्तुतः यह शक्ति एक ही है और यह साधक को अजर और अमर, अर्थात् परम शिवस्वरूप बना देती है। अर्थरत्नावली (पृ० १०७) में उद्धृत संकेतपद्धति के वचन में और शिवानन्द मुनि के सुभगोदय (श्लो० ४९) में आठ ही नित्याओं के नाम हैं, ऐसा प्रतीत होता है, किन्तु वहाँ (पृ० १०७) उद्धृत संकेतपद्धति के अन्य श्लोकों से ज्ञात होता है कि सातवीं विद्या त्रिपुरासिद्धा तथा आठवीं त्रिपुराम्बिका है। अतः सुभगोदय के ऊपर चर्चित वचन में सिद्धाम्बा शब्द में समास मानकर सिद्धा और अम्बा शब्दों को अलग-अलग मानना चाहिये। इस तरह से नित्याओं की संख्या नौ हो जाती है। संकेतपद्धति के अनुसार आठ अंग- नित्याओं के साथ नवीं अंगी (प्रधान) मूलविद्या को मिलाने से इनकी संख्या नौ हो जायगी। नवनित्याविधान नामक ग्रन्थ का एक वचन जयरथ द्वारा तन्त्रालोकविवेक (१५। २८१) में उद्धृत है। ग्रन्थ के इस नाम से भी नौ नित्याओं की प्रतीति होती है। अतः इस स्पष्टीकरण के आधार पर वहाँ (पृ० १०५ में) दी गई टिप्पणी में आवश्यक संशोधन कर लेना चाहिये। योगसूत्रकार¹ भगवान् पतंजलि ने मन्त्र के जप के साथ अर्थ की भावना का भी विधान किया है। निरुक्त² में अर्थ को बिना जाने वेद मन्त्रों का पाठ मात्र करने वाले की निन्दा और वेद मन्त्रों के अर्थ को जानने वाले की प्रशंसा की गई है। इसी बात को ³भास्करराय ने भी प्रकारान्तर से वरिवस्यारहस्य में कहा है। इसीलिये योगिनीहृदय के मन्त्रसंकेत प्रकरण में सामान्य पीठिका-बन्ध के बाद सौभाग्यविद्या के षड्विध अर्थों का १. तज्जपस्तदर्थभावनम् (१।२८) । २. स्थाणुरयं भारहारः किलाऽभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥ यद् गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥ (६।१) ३. नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति । भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥