योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २३ ] विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके नाम ये हैं—भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, सर्वरहस्यार्थ और महातत्त्वार्थ । यहाँ १६ से २५ श्लोक तक भावार्थ का, २६ से ४८ पर्यन्त सम्प्रदायार्थ का, ४८ से ५१ पर्यन्त निगर्भार्थ का, ५१ से ६८ तक कौलि- कार्थ का, ६९ से ७२ पर्यन्त सर्वरहस्यार्थ का और ७३ से ८० श्लोक पर्यन्त महातत्त्वार्थ का निरूपण किया गया है। षड्विध अर्थों का यह पूरा प्रकरण पारिभाषिक शब्दों, काम- कला के स्वरूप को स्पष्ट करने वाली दार्शनिक और यौगिक प्रक्रियाओं से भरा हुआ है। बहुत सावधानी से दो-चार बार पढ़ने के बाद ही यह विषय हृदयंगम हो सकता है। हम १कहीं लिख चुके हैं कि नि० षो० में कादिविद्या का तथा यो० हृ० में हादि- विद्या का उद्धार हुआ है। यो० हृ० का यह पूरा प्रकरण हादिविद्या के साथ ही संगत होता है, कादिविद्या के साथ जोड़ने में खीचातानी करनी पड़ती है। अतः यही मानना उचित है कि यो० हृ० में हादिविद्या का षड्विध अर्थ बताया गया है। कादिविद्या के पन्द्रह प्रकार के अर्थों का वर्णन भास्करराय ने वरिवस्यारहस्य के द्वितीय अंश में किया है। वे यो० हृ० की भी व्याख्या कादिविद्यापरक ही करते हैं। हम यहाँ कादिविद्या और हादिविद्या का स्वरूप प्रदर्शित कर रहे हैं। इनको देख कर पाठक स्वयं अपना निर्णय कर सकते हैं। पंचदशाक्षरी कादिविद्या—क ए ई ल ह्रीँ ह स क ह ल ह्रीँ स क ल ह्रीँ पंचदशाक्षरी हादिविद्या—ह स क ल ह्रीँ ह स क ह ल ह्रीँ स क ल ह्रीँ १. भावार्थ मन्त्र के अक्षरों से जो अर्थ निकलता है, उसको भावार्थ कहते हैं। सौभाग्यविद्या का स्वरूप योगिनी, वीर और वीरेन्द्रों का शिव और शक्ति के साथ समयोग होने पर बनता है। इन शब्दों का अर्थ संस्कृत व्याख्या के आधार पर भाषानुवाद में कर दिया गया है। यहाँ इनके द्वारा पंचदशाक्षरी श्रीविद्या के तीनों बीजों का उद्धार किया है। इस विषय को स्पष्ट करने के लिये टीकाकार ने अपने ही ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय के पूरे द्वितीय प्रपंच को यहाँ उद्धृत किया है। यहाँ ८ से १४ श्लोक पर्यन्त वाग्भव बीज का, १५-१६ श्लोकों में कामराज बीज का तथा १७-१८ श्लोकों में शक्ति बीज का उद्धार बताया गया है, जिसका कि स्वरूप हम ऊपर दे चुके हैं। १०वें श्लोक में ‘हस्यार्थः’ के स्थान पर ‘सस्यार्थः’ पाठ सही लगता है, किन्तु मूल ग्रन्थ में कोई पाठभेद न होने से हमने उसको छोड़ दिया है। द्वितीय बीज के केवल क और ल वर्ण के बीच में स्थित हकार का उद्धार किया गया है और इसी तरह तृतीय बीज के प्रथम हकार को ग्रहण न अर्थमजानानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् । उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ (२।५४-५५) १. द्रष्टव्य—नि० षो० उपोद्घात, पृ० १०० की १ टि० ।