योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २४ ] करने का कारण बताया गया है। बाकी वर्ण द्वितीय तथा तृतीय बीज में प्रथम बीज के समान ही हैं। यहाँ वर्णों की पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी अवस्थाओं का भी वर्णन है। पश्यन्ती और मध्यमा वाणी का स्वरूप कामकलाविलास (श्लो० २३-२७) में वर्णित है और वैखरी वाणी का स्वरूप दीपिका (२।६३-६४) और अर्थरत्नावली (पृ० ३६-३७) में उद्धृत संकेतपद्धति के वचनों में अधिक स्पष्ट है। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका—ये चार शक्तियाँ प्रकाशात्मक अनुत्तर अकार की तथा इच्छा, ज्ञान, क्रिया और शान्ता शक्तियाँ विमर्शात्मक हकार की अंशभूत हैं। इन अंशों (आठ) और अंशियों (दो) की व्यष्टि रूप में संख्या १० हो जाती है। इन सबका समष्ट्यात्मक भी एक रूप है और ये सभी मिल कर पश्यन्ती वाणी को एकादशधा विभक्त कर देते हैं। सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या (तुरीय) अवस्थाओं की प्रतीक वामा आदि और इच्छा आदि चार-चार शक्तियों के व्यष्ट्यात्मक आठ और एक समष्ट्यात्मक स्वरूप मिल कर नवविध नादरूपा और भूतलिपिमयी मध्यमा वाणी के स्वरूप को प्रस्फुटित करते हैं। स्थूल और सूक्ष्म के भेद से यह दो प्रकार का है। इसका सूक्ष्म रूप नवनादमय तथा स्थूल स्वरूप नौ वर्ग वाली भूतलिपि¹ से बनता है। वैखरी वाणी के ४७ भेदों में आकार से सकार पर्यन्त वर्णों की गणना की जाती है। अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता के कारण समष्टि और व्यष्टि रूप में इनका समावेश परा और पश्यन्ती वाणी में किया जाता है। ककार और षकार के संयोग से बने क्षकार की अलग से गणना नहीं की जाती और ळकार का लकार में अन्तर्भाव कर लिया जाता है। इस प्रकार यहाँ वैखरी वाणी के वर्णों की संख्या ४७ मानी जाती है। पश्यन्ती के ग्यारह, मध्यमा के नौ और वैखरी वाणी के ४७ वर्णों को मिलाकर इस मत में मातृका-पीठ में ६७ वर्ण माने जाते हैं। व्यष्टिरूप में तीन बीजों वाली इस सौभाग्यविद्या का समष्ट्यात्मक एक तुरीय (अनाख्य) स्वरूप भी है। यह परा वाणीमय है। परा देवी का परम आनन्द से ओत-प्रोत स्पन्दात्मक स्वभावसुन्दर स्वरूप इसी में छिपा हुआ है। प्रकाश और विमर्श का सामरस्य- मय यह स्वरूप शाश्वत ब्रह्म के ज्ञानमय स्वरूप में उसकी आराधना (मनन) करने वाले साधक की रक्षा करता है, अतः इसको मन्त्र² भी कहा जाता है। १. नौ वर्ग वाली भूतलिपि का परिचय पृ० ३२५ की टिप्पणी में दिया गया है। २. पुरुष-देवता के मनु को मन्त्र तथा स्त्री-देवता के मन्त्र को विद्या कहा जाता है। देखिये ऋजुविमर्शिनी - "पुंरूपवाच्याध्यासिता मन्त्राः····स्त्रीरूपवाच्याध्यासिताश्च विद्याः" (पृ० ४२-४३)। "मन्त्राः पुंरूपवाच्याधिष्ठिताः, विद्याः स्त्रीरूपवाच्याधिष्ठिताः" दीपिका (३।१५१)। भास्करराय ने गुरु(नाथ)नवरत्नमाला की व्याख्या में यह श्लोक उद्धृत किया है—"स्त्रीदैवत्याः स्मृता विद्याः पुंदैवत्यास्तु मन्त्रकाः" (पृ० ६)।