योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २५ ] इस तरह से चिह्न के समान श्रीविद्या में भी परा आदि चारों वाणियां निहित हैं। ऋग्वेद के "चत्वारि वाक्" प्रभृति मन्त्र का अर्थ इन चार वाणियों की तान्त्रिक व्याख्या में ही अधिक संगत लगता है, क्योंकि वाणी के परा, पश्यन्ती और मध्यमा नामक तीन स्वरूप छिपे हुए हैं और चौथी वैखरी वाणी को ही मनुष्य बोलते हैं। निरुक्त¹ अथवा महाभाष्य में प्रदर्शित व्याख्याओं में यह संगति बैठ नहीं पाती। मूल चक्र में स्थित परा वाक् से ही नाभिस्थान में पश्यन्ती और हृदय स्थान में मध्यमा वाणी तथा आगे कण्ठ आदि स्थानों में वैखरी वाणी की अभिव्यक्ति होती है। अमृतानन्द ने सौभाग्य- सुधोदय (१।६) में अनाहत, हृत और उत्तीर्ण पदों से मध्यमा, वैखरी और पश्यन्ती वाणी का क्रमशः बोध कराया है और कहा है कि परा वाणी से ही ये तीनों स्वरूप प्रकट होते हैं। यह बताया जा चुका है कि कामबिन्दु और उसकी विसर्गात्मक कला के मध्य में स्थित बिन्दु परा वाक् का निवास-स्थान है। इस कामकला में अकुल और कुल कुण्ड- लिनी रूप अकार एवं हकार समरस रूप में स्थित हैं। कामकला में स्थित इन दो अक्षरों में से हकार की स्थिति द्वितीय कामराज बीज में स्पष्टतया तथा अकार की स्थिति तृतीय शक्ति बीज में अस्पष्ट रूप से मानी गई है। वाग्भव बीज में ये समरस रूप में स्थित हैं। इसी समरस बिन्दु में जब स्पन्दन उठता है, विष (संसार) और अमृत (मोक्ष)- मय धर्म (शिव) और अधर्म (शक्ति) रूपी वाच्य अर्थ जब वाचक अक्षरों से संवलित हो जाते हैं, तब यह विश्वोत्तीर्ण महाविद्या विश्वरूप बन जाती है। उस समय तीन-तीन संख्या वाले सभी पदार्थों की समष्टिरूपिणी यह परा मातृका तीन कूटों का स्वरूप धारण कर व्यष्टिरूपिणी बन जाती है। इस प्रकार समष्टि और व्यष्टि रूपिणी इस आद्या शक्ति की पंचदशाक्षरी विद्या के अक्षरों में विविध रूपों में भावना करना ही भावार्थ कहलाता है। २. सम्प्रदायार्थ सम्प्रदाय (ज्ञान की परम्परा) गुरुमुख से ही जाना जा सकता है। यह विश्वातीत तत्त्व कैसे विश्वमय हो जाता है, इस विषय की जानकारी भी हमें इसी तरह से मिलती है। शिव और शक्ति, अकार और हकार के समरस स्वरूप से स्फुरित मूलविद्या से सारा जगत् किस तरह से व्याप्त है, सम्प्रदायार्थ में इसी विषय को स्पष्ट किया जाता है। यह विश्व पंचभूतमय है, सौभाग्यदेवता और उसकी मूलविद्या भी पंचभूतमय है। हकार से आकाश, ककार से वायु, रेफ से अग्नि, सकार से जल तथा लकार से पृथिवी की उत्पत्ति होती है। इस तरह से यह विश्वातीता शक्ति विश्वमय हो जाती है। इन भूतों में सब मिला कर जैसे पन्द्रह गुण होते हैं, उसी तरह से इस मूलविद्या में भी पन्द्रह अक्षर हैं। १. पृ० १२९ की टिप्पणी देखिये।