योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 28, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २६ ] इस पंचदशाक्षरी विद्या के पाँच वर्ण वाग्भव बीज में, छः कामराज बीज में और चार शक्ति बीज में स्थित हैं। स्वर और व्यंजन के भेद से इसके ३७ अवयव हो जाते हैं। ३६ तत्त्व इसके व्यष्टि रूप से बनते हैं और इसका ३७वां भेद समष्टिमय है। इस तरह से यहाँ भी इस विद्या की विश्वातीत और विश्वमय रूप में भावना की जाती है। विश्वातीत तत्त्व किस तरह से विश्वमय ३६ तत्त्वों का रूप धारण कर लेता है, इसका सुन्दर विश्लेषण टीकाकार ने अपने ही ग्रन्थ 'सौभाग्यसुधोदय के प्रथम प्रपंच के विस्तृत उद्धरण को देकर किया है। वस्तुतः जगत् का प्रत्येक पदार्थ और उसमें निहित शक्तियां शिव और शक्ति के समरस रूप परम तत्त्व से ही स्वात्मलाभ करते हैं। सौभाग्यविद्या में छः हकार हैं। हकार आकाश का बीज है, अतः इन हकारों में से पाँच हकार आकाश के पाँच गुणों के और छठा नादात्मक हकार इन सबका कारण है। विद्या स्थित तीन ईकार तथा कामकला का कारणभूत समरस बिन्दु वायु स्थित चार गुणों की उत्पत्ति में कारण हैं। तीन रेफ तीन रूपों के अभिव्यंजक हैं। २विद्या स्थित तीन सकारों में से दो जल और पृथिवी के रस के तथा तीसरा अमृत रस का जनक है। लकार से पृथिवीगत गुण की उत्पत्ति होती है। श्रीविद्या में तीन लकार हैं। ये तीनों तीन भुवनों में स्थित गन्ध गुण के द्योतक हैं। विद्या स्थित तीन ककारों में अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रकार के प्रमाताओं की अभिव्यक्ति होती है। यहाँ अशुद्ध सकल, शुद्ध विज्ञानाकल और मिश्र प्रमाता प्रलयाकल कहलाते हैं। श्रीविद्यागत बारह अकारों में से दस जीव के, ११वां प्राण का और १२वां परम शिव का सूचक है। यद्यपि एक ही अकार से जीव तत्त्व का द्योतन हो सकता है, किन्तु एक ही तत्त्व जीवों के रूप में बहुधा विभक्त हो जाता है, इस बात को सूचित करने के लिये यहाँ दस अकारों की योजना की गई है। विद्यागत तीन बिन्दु रुद्र, ईश्वर और सदाशिव के तथा तीन नाद ३शान्ति, शक्ति तथा शंभु के बोधक हैं। मछली पकड़ने के जाल के लोहे के कड़े में जैसे सारे धागे १. पृ० १४५-१४६ की टिप्पणी देखिये। २. "विद्यास्थैश्चन्द्रबीजैः" (२।४१) यहाँ भास्करराय ने बहुवचन को द्विवचनपरक माना है, क्योंकि कादिविद्या में दो ही सकार हैं। ३. शान्ति शब्द से यहाँ बिन्दु का ग्रहण मानना चाहिये। शक्ति तत्त्व के पाँच भुवनों में से एक का नाम शान्ति है। इसको बैन्दव पुर भी कहा जाता है। श्रीकण्ठ सूरि ने रत्नत्रयपरीक्षा में बिन्दु की शिव और शक्ति के अतिरिक्त तृतीय रत्न के रूप में प्रतिष्ठा की है। इसी को वहाँ (श्लो० ७०-७१) महामाया और कुण्डलिनी भी कहा गया है। ब्रह्मरन्ध्र की अवसान भूमि में यह विश्राम करती है। पृ० १६९ की टिप्पणी में उठाई चर्चा इससे समाहित हो जाती है।