योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २७ ] और लोहे की गोलियाँ जुड़ी रहती हैं, उसी तरह से इस सौभाग्यविद्या में सब कुछ ओतप्रोत हैं। इस प्रकार यहाँ सौभाग्यविद्या का जो अर्थ बताया गया है, वह गुरु- (सम्प्रदाय) परम्परा से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिये इसे सम्प्रदायार्थ कहा जाता है। ३. निगर्भार्थ सौभाग्यविद्या के निगर्भार्थ के अनुसार शिव, गुरु और आत्मा की अभिन्नता, एकता का अनुसन्धान किया जाता है। यहाँ पहले शिव के निष्कल (निरवयव) स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। इसके बाद गुरु की भी उसी रूप में भावना की जाती है। ऐसा करने से अन्ततः शिष्य की आत्मा भी गुरुमय और शिवमय हो जाती है। ४—कौलिकार्थ कौलिक अर्थ में चक्र, देवता, विद्या, गुरु और आत्मा की एकता का अनुसन्धान किया जाता है। विद्यागत लकार से चतुरस्र की, शाक्त (सकार) से वृत्तत्रय और तदन्तर्गत षोडशदल एवं अष्टदल पद्म की अभिव्यक्ति होती है। तीन हृल्लेखाओं के तीन-तीन, अर्थात् नौ अक्षरों से नवयोनि चक्र निष्पन्न होता है। चतुर्दशार, बाह्यदशार और अन्तर्दशार की निष्पत्ति विद्यागत हकारों से होती है। विद्यागत ककार से महाबिन्दु- मय सदाशिवासन बनता है। इस तरह से चक्र और मन्त्र की अभिन्नता की भावना की जाती है। इसी चक्र से १११ आवरण देवताओं¹ वाली समष्ट्यात्मक परदेवता का दिव्य शरीर बनता है। नि० षो० (१।१) में देवी को गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी और राशि स्वरूपिणी कहा है। ऊपर बताये गये आवरण देवताओं के गण की अधीश्वरी होने से यह गणेश कहलाती है। सोम, सूर्य, अग्नि; इच्छा, ज्ञान, क्रिया और सत्त्व, रज, तम नामक गुणों के योग से यह ग्रहस्वरूपिणी है। ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनके विषय, चार अन्तःकरण, प्रकृति, गुण और आत्मा के भेद से यह नक्षत्रस्वरूपिणी है। त्वक् आदि छः धातुओं की अधिष्ठात्री डाकिनी आदि योगिनियाँ तथा आठ वर्गों की अधिष्ठात्री ब्राह्मी आदि देवियाँ इसी शक्ति का विलास हैं। इनके कारण यह योगिनी कहलाती है। प्राण आदि दस वायु, जीवात्मा और परमात्मा के भेद से यह राशिस्वरूपिणी है। सौभाग्यदेवता जैसे गणेश आदि भेदों से अलंकृत हैं, उसी तरह से परा, पश्यन्ती आदि चतुर्विध वाणी का स्वरूप धारण करने वाली सौभाग्यविद्या भी आदि, कादि और थादि के क्रम से विभक्त बीजों की स्वामिनी होने से गणेश कही जाती है। तीन कूटों में विद्यमान बीज, बिन्दु और ध्वनि (नाद) की नवात्मकता के कारण वह ग्रहात्मिका है। तीन हृल्लेखाओं के पन्द्रह तथा अन्य बारह अक्षरों के होने से यह नक्षत्रस्वरूपिणी है। विद्यागत तीन हृल्लेखाओं और १. पृ० १८३-१८४ मूल और टीका देखिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)