भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तीन लकारों की शाक्त संज्ञा है। इसके कारण विद्या योगिनी कहलाती है और अन्तिम हृल्लेखाओं को छोड़ देने पर यह राशिस্বরূপिणी हो जाती है। सौभाग्यविद्या और सौभाग्यदेवता के समान श्रीचक्र में भी गणेश आदि की स्थिति है, इसका प्रकार दीपिका- कार (२।६७) ने बताया है। देवी के देह में जैसे गणेश आदि रूपों की योजना बताई गई है, उसी तरह से गुरु के देह में भी इस सब की भावना की जाती है। अन्ततः गुरु के प्रसाद से शिष्य में भी इन सब स्वरूपों की अभिव्यक्ति हो जाती है। यह सब श्रीविद्या के इस कौलिक अर्थ की भावना से होता है। ५. सर्वरहस्यार्थ बिजली के समान कान्ति वाले वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत मूलाधार में अड़तीस ¹कलाओं से युक्त पचास वर्णों का शरीर धारण करने वाली विद्या कुण्डलिनी के रूप में विराजमान है। तीन मण्डलों का भेदन करने वाली, करोड़ों विद्युत्पुंजों के समान कान्ति वाली, कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली यह कुण्डलिनी शक्ति जब शून्यगगन में चन्द्रमण्डल से संयुक्त होती है, तो अमृत रस झरने लगता है। सदा आनन्दस्वरूपिणी यह शक्ति अपने इस अमृत रस से सारे संसार को आप्यायित किये रहती है। यह शक्ति स्वयं मेरी आत्मा है, ऐसी बुद्धि ही रहस्यार्थ के नाम से यहाँ प्रसिद्ध है। ६. महातत्त्वार्थ निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर देने का ही नाम महा- तत्त्वार्थ है। इस परम स्वरूप के प्रकाश से ही तेज और तम जैसे विरोधी स्वभाव वाले भाव भी प्रकाशित होते हैं। इसीलिये यह सारा विश्व इसमें अभिन्न रूप से स्थित है। यह महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है। इसके प्रकाश के लिये किसी दूसरे प्रकाश (तत्त्व) की आवश्यकता नहीं है। इस अर्थ की भावना से साधक समस्त संकल्पविकल्पात्मक स्थितियों से ऊपर उठ जाता है। इसका वर्णन महाज्ञानार्णव तन्त्र तथा विद्यापीठ संबन्धी आगमों में किया गया है। कौलाचार का पालन करने वाले, गुरु की पादुका की सेवा तथा योगिनीमेलन में उद्युक्त, विधिपूर्वक अभिषिक्त, समस्त शंकाओं से उन्मुक्त, सदा प्रसन्न चित्त रहने वाले व्यक्ति को ही गुरु-परम्परा से ज्ञान का सारा रहस्य प्राप्त होता है। ऐसा ही साधक इस सर्वरहस्यार्थ की भावना करने में समर्थ होता है।

१. पञ्चमन्त्रतनु शिव के अघोर आदि पाँच मुखों की स्वच्छन्दतन्त्र (१।५३-५९), नेत्र- तन्त्र (२२।२६-३४) आदि में वर्णित ३८ कलाओं का भी यहाँ ग्रहण किया जा सकता है।