योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 31, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २९ ]
इन षड्विध अर्थों की भावना करने वाला साधक गुरु की कृपा होने पर पूर्ण बोध- भाव को प्राप्त कर लेता है, निर्मल स्वात्मस्वरूप को १पहचान लेता है। वह स्वयं परशिव स्वरूप हो जाता है। पूजासंकेत तृतीय पूजासंकेत में सर्वप्रथम परा, अपरा और परापरा नाम की त्रिविध पूजा की परिभाषा दी गई है। इन्द्रियों के समस्त व्यापारों में एकमात्र अद्वय शिवतत्त्व को ही देखना, पहली परा पूजा है। श्रीचक्र की बाह्य उपादानों से की गई पूजा अपरा कहलाती है। बाह्य विषयों में संलिप्त अपने विमर्शमय स्वरूप को प्रकाशमय स्वरूप में समेट लेना २परापरा पूजा है। विकल्पों की शुद्धि के लिये इसमें आत्मयजन किया जाता है। परा पूजा उत्तम, अपरा अधम और परापरा पूजा मध्यम कोटि की मानी जाती है। इस त्रिविध पूजा की व्याख्या हम शांभव, शाक्त और आणव उपायों के रूप में कर सकते हैं। त्रिविध पूजा परा पूजा में महापद्मवन (ब्रह्मरन्ध्र) में विद्यमान अधोमुख अकुल कमल में अमृत की वर्षा करने वाली गुरुपादुका का ध्यान किया जाता है। ऐसा करने से साधक को अद्वैत भावना का नशा चढ़ जाता है। वह दहराकाश में ध्वनित हो रहे नाद को सावधानी से सुनने लगता है और जागतिक विकल्प जाल से, नाना प्रकार के बाह्य वैखरी वर्णों से घटित नामों के उच्चारण से विमुख हो जाता है। तब वह सदा सदा के लिये अन्तर्मुख हो जाता है। अपने में चित्कला के उल्लास को भर कर और संकोच बुद्धि को दूर भगा कर वह परम सुन्दर भगवती त्रिपुरसुन्दरी के स्वरूप में विलीन हो जाता है। ऐसे साधक को अपने विकल्पों की शुद्धि के लिये स्वात्मदेवता प्रीत्यर्थ इन्द्रियों को तृप्त करने वाले द्रव्यों से परापरा पूजा का अधिकार प्राप्त हो सकता है। अपरा अथवा परापरा पूजा का साधक सर्वप्रथम अपने शरीर की शुद्धि के लिये, उसको देवमय बनाने के लिये षड्विध न्यास का अनुष्ठान करता है। यह न्यास गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि और पीठ के नाम से प्रसिद्ध है ( श्लो० ८-४० ) । षोढा न्यास के बाद श्रीचक्रन्यास किया जाता है। यह न्यास साधक के शरीर के बाह्य और आन्तर अवयवों को पवित्र कर देता है। पहले संहारक्रम ( श्लो० ४१-६९ ) और बाद
१. प्रत्यभिज्ञा पद के अर्थ के लिये देखिये - ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी भास्करी टीका, प्रथम संस्करण, पृ० ३६-३८, सर्वदर्शनसंग्रह (मूलमात्र) आनन्दाश्रम पूना, द्वितीय संस्करण, पृ० ७४. २. परापरा पूजा का विवरण यहाँ अलग से न देकर परा और अपरा के साथ ही संक्षेप में दे दिया गया है। इसके विशेष विवरण के लिये 'सारस्वती सुषमा' का म० म० गोपीनाथ कविराज शताब्दी विशेषांक, पृ० १२७-१३९ देखिये।