भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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में सृष्टिक्रम (श्लो० ६९-८१) से यह किया जाता है। इसके बाद करशुद्ध्यादि न्यास, विद्या न्यास, श्रीकण्ठादि न्यास, तत्त्व न्यास और व्यापक न्यास का विधान है (श्लो० ८१-८६)। अन्त में (श्लो० ८६) परा न्यास का विधान कर तीन श्लोकों (८७-८९) में न्यास प्रकरण का उपसंहार करते हुए चतुर्विध न्यास का कालभेद से विनियोग बताया गया है। परा न्यास में देवी को सौम्य, आग्नेय और अमृतमय द्रव्यों से तृप्त किया जाता है। यह परापरा पूजा का अंग है। इन चतुर्विध न्यासों से देवमय बना साधक देवी के आसन के रूप में श्रीचक्र की रचना करता है और फिर इसी में देवी की आन्तर और बाह्य वरिवस्या करता है। बाह्य पूजा से पहले आन्तर वरिवस्या करनी चाहिये, इस सिद्धान्त को स्वीकार कर ज्ञान- दीपविमर्शिनी आदि प्राचीन पद्धति ग्रन्थों में सूर्योपस्थान, सन्ध्या, तर्पण आदि प्रकरणों की दो प्रकार की व्याख्या की गई है। यहाँ भी सर्वप्रथम बाह्य और आन्तर विघ्नों के अपसारण की विधि बताई गई है। तब सामान्य अर्घ्य से ग्रह आदि परिवार के साथ आन्तर और बाह्य सूर्यपूजा का विधान है। श्रीचक्र का निर्माण कपूर, केसर, रोचना, अगुरु, कुंकुम आदि के घोल से किया जाता है। श्रीचक्र और साधक के बीच के स्थान में सामान्य और विशेष अर्घ्य के पात्रों की प्रतिष्ठा की जाती है और इनमें सूर्य, चन्द्र और वह्नि की ३८ कलाओं की पूजा की जाती है। अर्घ्यशुद्धि के बाद उसको पहले गुरु- पंक्ति को निवेदित कर मूलविद्या का जप करते हुए साधक स्वात्मयजन के लिये स्वयं भी ग्रहण करता है। इसके बाद श्रीचक्र का पूजन आरम्भ होता है। सबसे पहले गणेश और दूतरी, क्षेत्रेश और दूतिका का पूजन किया जाता है। बाह्य द्वार पर स्वस्तिका आदि देवियों की पूजा की जाती है। त्रिकोण चक्र में दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ क्रम से विभक्त त्रिविध गुरुपंक्ति का पूजन और मध्य बिन्दु में कामेश्वर-कामेश्वरी के युगल स्वरूप की आराधना की जाती है। त्रिकोण में ही काम्य कर्म के अनुसार तिथि-नित्याओं का पूजन किया जाता है। आगे (३।१६७) बताया गया है कि इनकी पूजा चतुरस्र में भी की जा सकती है। इसके बाद संहार क्रम से नौ चक्रों में प्रकटा आदि नौ योगिनियों की आरा- धना की जाती है। इन्हीं के साथ नि० षो० में प्रदर्शित नौ चक्रों के आवरण देव- ताओं का भी पूजन किया जाता है। इसका प्रकार यहाँ ११३-१६७ श्लोकों में बताया गया है। इस प्रकरण में प्रकटा आदि, त्रिपुरा आदि और करशुद्धिकरी आदि का निर्वचन भी बताया गया है। षोडशदल चक्र की वासना के प्रसंग में यहाँ (३।१२७) षोडश प्राणों का उल्लेख किया गया है। दीपिकाकार का कहना है कि दस प्राण तो प्रसिद्ध हैं। बाकी