भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ १८ ] के दस विषयों का उद्भावक है। बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण और अन्तर्दशार चक्रों की चार किरणों तथा बहिर्दशार चक्र की दस किरणों के मिलने पर चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है। यहाँ टकार से भकार पर्यन्त वर्णों की तथा दस बाह्य करण और चार अन्तः- करण—इस प्रकार चतुर्दश इन्द्रियों की निष्पत्ति होती है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि पृथिवी आदि तत्त्वों की रचना शिव के अंश से और वर्णों की रचना शक्ति के अंश से होती है। इस प्रकार पांच शक्ति चक्रों और चार वह्नि (शिव) चक्रों से निष्पन्न ये अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार नामक तीन चक्र रौद्री शक्ति की प्रभा से उन्मीलित होते हैं। यहाँ तक छः चक्रों की निष्पत्ति पूरी होती है। षोडशदल और अष्टदल चक्रों की निष्पत्ति वामा शक्ति से तथा चतुरस्र चक्र की ज्येष्ठा शक्ति से होती है। इस प्रकार अम्बिका, रौद्री, वामा और ज्येष्ठा शक्ति की सहायता से इस परिपूर्ण श्रीचक्र का विस्तार होता है। इनमें से बिन्दु और त्रिकोण चित्कलामय हैं। अष्टकोण शान्त्यतीता से, अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार शान्ति कला से, अष्टदल विद्या कला से, षोडशदल प्रतिष्ठा कला से और चतुरस्र चक्र निवृत्ति कला से प्रकट होते हैं। श्रीचक्र का यह स्वरूप सृष्टिक्रम कहलाता है। इससे उलटा है संहारक्रम। इन दोनों ही क्रमों से श्रीचक्र की भावना और पूजा की जाती है। सृष्टिक्रम जैसे बिन्दु से प्रारंभ होता है, उसी तरह से संहारक्रम चतुरस्र, अर्थात् त्रैलोक्यमोहन चक्र से। इस संहारक्रम से इन नौ चक्रों में क्रमशः नाद, बिन्दु, कला, ज्येष्ठा, रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी और सर्वानन्दा नामक नौ शक्तियां निवास करती हैं। इनमें से नाद और बिन्दु शान्ताशक्तिमय, कला इच्छाशक्तिमय, ज्येष्ठा ज्ञानशक्तिमय तथा बाकी की पाँच शक्तियां क्रियाशक्ति का विलास मानी जाती हैं। परमार्थतः कामकला के ही प्रसार से श्रीचक्र का यह वर्णमय, तत्त्वमय और शक्तिमय स्वरूप उन्मीलित होता है। इन नौ चक्रों की क्रमशः अकुल, विषु, शाक्त, वह्नि, नाभि, अनाहत शुद्ध, लम्बिकाग्र और भ्रूमध्य में एवं बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना में तथा महाबिन्दु में त्रिविध भावना की जाती है। इनमें से प्रथम भावना सकल, दूसरी भावना सकलनिष्कल तथा तीसरी भावना निष्कल कही जाती है। महाबिन्दु में निष्कल भावना में प्रविष्ट योगी जब ऊपर उठता है, तो उसको देश, काल, आकार आदि से रहित उस परम महान् स्वभावसुन्दर तत्त्व का साक्षात्कार होता है, जो सदा परमानन्द से परिपूर्ण है। यह पहले बताया जा चुका है कि विश्वोत्तीर्ण तत्त्व जब विश्वमय बनना चाहता है, तो उसमें अनोखी स्फुरत्ता का उद्भव होता है। वह्नि के सम्पर्क से जैसे घी पिघलने लगता है, वैसे ही उस परम शिव के सम्पर्क से विमर्श-शक्ति स्यन्दित हो उठती है और