योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
[ १८ ] के दस विषयों का उद्भावक है। बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण और अन्तर्दशार चक्रों की चार किरणों तथा बहिर्दशार चक्र की दस किरणों के मिलने पर चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है। यहाँ टकार से भकार पर्यन्त वर्णों की तथा दस बाह्य करण और चार अन्तः- करण—इस प्रकार चतुर्दश इन्द्रियों की निष्पत्ति होती है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि पृथिवी आदि तत्त्वों की रचना शिव के अंश से और वर्णों की रचना शक्ति के अंश से होती है। इस प्रकार पांच शक्ति चक्रों और चार वह्नि (शिव) चक्रों से निष्पन्न ये अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार नामक तीन चक्र रौद्री शक्ति की प्रभा से उन्मीलित होते हैं। यहाँ तक छः चक्रों की निष्पत्ति पूरी होती है। षोडशदल और अष्टदल चक्रों की निष्पत्ति वामा शक्ति से तथा चतुरस्र चक्र की ज्येष्ठा शक्ति से होती है। इस प्रकार अम्बिका, रौद्री, वामा और ज्येष्ठा शक्ति की सहायता से इस परिपूर्ण श्रीचक्र का विस्तार होता है। इनमें से बिन्दु और त्रिकोण चित्कलामय हैं। अष्टकोण शान्त्यतीता से, अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार शान्ति कला से, अष्टदल विद्या कला से, षोडशदल प्रतिष्ठा कला से और चतुरस्र चक्र निवृत्ति कला से प्रकट होते हैं। श्रीचक्र का यह स्वरूप सृष्टिक्रम कहलाता है। इससे उलटा है संहारक्रम। इन दोनों ही क्रमों से श्रीचक्र की भावना और पूजा की जाती है। सृष्टिक्रम जैसे बिन्दु से प्रारंभ होता है, उसी तरह से संहारक्रम चतुरस्र, अर्थात् त्रैलोक्यमोहन चक्र से। इस संहारक्रम से इन नौ चक्रों में क्रमशः नाद, बिन्दु, कला, ज्येष्ठा, रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी और सर्वानन्दा नामक नौ शक्तियां निवास करती हैं। इनमें से नाद और बिन्दु शान्ताशक्तिमय, कला इच्छाशक्तिमय, ज्येष्ठा ज्ञानशक्तिमय तथा बाकी की पाँच शक्तियां क्रियाशक्ति का विलास मानी जाती हैं। परमार्थतः कामकला के ही प्रसार से श्रीचक्र का यह वर्णमय, तत्त्वमय और शक्तिमय स्वरूप उन्मीलित होता है। इन नौ चक्रों की क्रमशः अकुल, विषु, शाक्त, वह्नि, नाभि, अनाहत शुद्ध, लम्बिकाग्र और भ्रूमध्य में एवं बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना में तथा महाबिन्दु में त्रिविध भावना की जाती है। इनमें से प्रथम भावना सकल, दूसरी भावना सकलनिष्कल तथा तीसरी भावना निष्कल कही जाती है। महाबिन्दु में निष्कल भावना में प्रविष्ट योगी जब ऊपर उठता है, तो उसको देश, काल, आकार आदि से रहित उस परम महान् स्वभावसुन्दर तत्त्व का साक्षात्कार होता है, जो सदा परमानन्द से परिपूर्ण है। यह पहले बताया जा चुका है कि विश्वोत्तीर्ण तत्त्व जब विश्वमय बनना चाहता है, तो उसमें अनोखी स्फुरत्ता का उद्भव होता है। वह्नि के सम्पर्क से जैसे घी पिघलने लगता है, वैसे ही उस परम शिव के सम्पर्क से विमर्श-शक्ति स्यन्दित हो उठती है और
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इसी से विश्वलहरी स्थान, मातृत्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्राकट्य होता है। उस समय विमर्शमयी परमा कला सर्वप्रथम शान्ता और अम्बिका शक्ति का रूप धारण कर लेती है। इसी को परा वाक् भी कहा जाता है। यह परा वाणी अपने में बीज रूप से स्थित विश्व को जब प्रकट करना चाहती है, तब विश्व का वमन करने के कारण अंकुश सदृश वामा शक्ति का रूप धारण कर लेती है। यह वामा शक्ति ही इच्छा शक्ति के साथ मिल कर पश्यन्ती वाक् के रूप में परिणत हो जाती है। इसी तरह से ज्येष्ठा शक्ति और ज्ञान शक्ति के मिलन से मध्यमा वाक् अभिव्यक्त होती है। शृंगाट (त्रिकोण) की सीधी रेखा इसका बोध कराती है। वामा शक्ति के द्वारा सृष्ट विश्व की स्थिति में यह कारणभूत है, उसका पालन करती है। विश्व का संहार करने की इच्छा होने पर वह शक्ति अपने बैन्दव स्वरूप में पुनः प्रविष्ट हो जाती है। तब शृंगाट की दक्षिण रेखा के निर्माण के साथ इसका स्वरूप पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है। यह रौद्री शक्ति का व्यापार है। क्रिया शक्ति के साथ मिल कर यह वाणी के विस्तार को मुखरित करने वाली वैखरी वाक् बन जाती है। इस प्रकार बैन्दव (बिन्दु और त्रिकोण) चक्र में अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि चार-चार शक्तियों तथा परा आदि चार वाणियों की भावना तथा पूजा की जाती है, इनको तन्मय माना जाता है। शिव (प्रकाशांश) से आविर्भूत अम्बिका आदि तथा शक्ति (विमर्शांश) से आविर्भूत शान्ता आदि शक्तियों में यह सारा विश्व बीज में वृक्ष की भांति छिपा रहता है। इन्हीं शक्तियों से कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्याण नामक पीठों की सृष्टि होती है। ये पीठ कन्द, पद, रूप और रूपातीत नामक आन्तर स्थानों में स्थित हैं। कन्द या पिण्ड को आधार, पद या हंस को हृदय, रूप या बिन्दु को भ्रूमध्य तथा रूपातीत को ब्रह्मरन्ध्र कहा जाता है। यह चिन्मय स्थान है। इन पीठों का आकार क्रमशः चतुरस्र, षड्बिन्दुमयं, अर्धचन्द्र और त्रिकोण जैसा होता है, क्योंकि ये क्रमशः पृथिवी, वायु, जल और तेज तत्त्व के प्रतीक हैं। इनका वर्ण क्रमशः पीत, धूम्र, श्वेत और रक्त है। इन पीठों में क्रमशः स्वयंभू, बाण, इतर और पर लिंग स्थित हैं। स्वयंभू लिंग का वर्ण पीत है। यह त्रिकूटाकार है तथा अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वरों से आवृत्त है। बाण लिंग का वर्ण बन्धूक पुष्प के जैसा है। यह त्रिकोणाकार है और ककार से टकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। इतर लिंग का वर्ण श्वेत है। इसका आकार कदम्बफल के समान गोल है और यह थकार से सकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। पर- तेजोमय पर लिंग का कोई आकार नहीं होता। इन्द्रियों से इसको देखा नहीं जा सकता, अतः बिन्दु से इसका बोध कराया जाता है। यह अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त वर्णों से आवृत्त है। यह परमानन्द का सार तथा नित्योदित स्वरूप वाला है।
[ २० ] बिन्दु सहित त्रिकोण में स्थित अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि शक्तिचतुष्टय, मातृका(वाणी)चतुष्टय, पीठचतुष्टय और लिंगचतुष्टय—ये सभी वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज तथा इनकी समष्टि तुरीय विद्या के वाच्य रूप हैं, अर्थात् बीजत्रया- त्मिका तुरीय श्रीविद्या से इनका बोध होता है। मेय, मान और माता की त्रिपुटी को कुल और इनकी समष्टि को कौल कहा जाता है। ऊपर निर्दिष्ट सभी चार संख्या वाले पदार्थ कुल और कौल विभाग में समाविष्ट हैं और क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुर्य (तुरीय) दशा वाले हैं। सभी प्राणियों में संवित्ति के रूप में भासमान विश्वोत्तीर्ण अनुत्तर (प्रकाशात्मक) परम तत्त्व इन सबसे ऊपर है। अपनी इच्छा से वह स्वात्मभित्ति में स्वेच्छा-तूलिका से विश्वमय चित्र बना डालता है, स्वयं विश्वमय हो जाता है। वह परप्रकाशात्मक स्वरूप इस तरह से विमर्श शक्ति से सम्पन्न होकर सहज आनन्द की सृष्टि का कारण बन कर सबके लिये स्पृहणीय हो जाता है। वह मेय, माता, प्रमा और प्रमाण के रूप में बँट जाता है और इच्छा, ज्ञान एवं क्रियात्मक शृंगाट (त्रिकोण) का स्वरूप धारण कर लेता है। विमर्श शक्ति विश्व का आकार ग्रहण करती है, किन्तु उसका अपना स्वरूप तो प्रकाशात्मक शिव में स्थित है। कामेश्वर के अंक रूपी पर्यंक में विश्राम करने वाला विमर्श शक्ति का यह स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है। इच्छाशक्तिमय पाश, ज्ञानशक्तिमय अंकुश और क्रियाशक्तिमय धनुष-बाण को धारण करने से कामेश्वर और कामेश्वरी के इस युगल स्वरूप की शोभा और भी बढ़ जाती है। कामेश्वर-कामेश्वरी का यह युगल स्वरूप आश्रय और आश्रयी के भेद से आठ आयुध वाला हो जाता है। यही मिथुन स्वरूप बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण आदि के क्रम से विकसित नवचक्रात्मक श्रीचक्र में विविध रूपों में अपना विस्तार कर लेता है और इस तरह से अपने श्रीचक्र रूपी शरीर में अपनी अवयव शक्तियों के साथ यह परम तेज अवतरित हो जाता है, विश्वोत्तीर्णता का परित्याग कर विश्वमय बन जाता है। यहाँ प्रकाशात्मक परमेश्वर (कामेश्वर) समुद्र स्थानीय, विमर्शमयी शक्ति (कामे- श्वरी) जलस्थानीय और उसकी अवयव शक्तियाँ तरंग स्थानीय हैं। जैसे समुद्र के जल से उठी लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी तरह से ३६ तत्त्वों वाला यह सारा विश्व- मय शक्तिचक्र इस युगल स्वरूप से ही उदित होता है और उसी में विलीन हो जाता है। चिति शक्ति स्वात्मस्वरूप भित्ति में जब स्वेच्छा से विश्व की रचना के लिये परिपूर्ण इच्छा शक्ति से सम्पन्न हो प्रकाश और विमर्श का सहारा लेती है, तो उस समय उसकी क्रिया शक्ति विश्व के मोदन और द्रावण व्यापार में प्रवृत्त हो मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की दस मुद्राएँ यहाँ वर्णित हैं। इनमें से पहली मुद्रा का विनियोग
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आवाहन के लिये होता है। शेष मुद्राएँ एक-एक चक्र की पूजा में विनियुक्त हैं। ¹मुद्रा शब्द तन्त्रशास्त्र में अनेक अर्थों में प्रयुक्त है, किन्तु यहाँ दोनों हाथों की अंगुलियों के संयोग से बनने वाली मुद्राओं के लिये आया है। दाहिने हाथ की अंगुलियाँ प्रकाशात्मक तथा बायें हाथ की अंगुलियाँ विमर्शात्मक मानी जाती हैं। ये अंगुलियाँ क्रमशः वामा आदि तथा इच्छा आदि चार-चार शक्तियों की प्रतीक हैं। इन दसों मुद्राओं का बाह्य और आन्तर स्वरूप यहाँ (१।५७-७१) बताया गया है। इस तरह इस विश्वमय परा शक्ति की ज्ञानशक्ति से श्रीचक्र का और क्रियाशक्ति से मुद्राओं का आविर्भाव होता है। स्वयं विश्वमय परा देवता इच्छाशक्तिस्वरूप है। उसमें विविकीर्षा उत्पन्न होने पर ही सृष्टि का विस्तार होता है। इस श्रीचक्र की त्रिविध और नवविध भावना की जाती है। बिन्दु, त्रिकोण और वसु- कोण की एक प्रकार से; दो दशार और चतुर्दशार की दूसरे प्रकार से; अष्टदल, षोडश- दल और चतुरस्र की तीसरे प्रकार से, अर्थात् क्रमशः सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम से पूजा की जाती है। दीपिकाकार ने संकेतपद्धति के प्रमाण से इनका विवरण दिया है (१।७७)। बिन्दु से लेकर चतुरस्रपर्यन्त उद्धार सृष्टिक्रम तथा चतुरस्र से बिन्दुपर्यन्त उद्धार संहारक्रम कहलाता है। इन सबकी समष्टि का ही नाम त्रिपुरा चक्र है। इस चक्र के स्वरूप को जो ठीक से जान लेता है, उसको अपने आप भगवती त्रिपुरा का स्वरूप भासित हो जाता है। चक्र की नवविध भावना में नौ चक्रों की अलग-अलग उपासना की जाती है। इन नौ चक्रों के नाम यहाँ संहारक्रम से इस प्रकार बताये गये हैं—त्रैलोक्यमोहन, सर्वाशा- परिपूरक, सर्वसंक्षोभण, सर्वसौभाग्यदायक, सर्वार्थसाधक, सर्वरक्षाकर, सर्वरोगहर, सर्वसिद्धिमय और सर्वानन्दमय। इन शब्दों की लुभावनी पदव्याख्या दीपिकाकार ने की है (१।८२-८४)। इस श्रीचक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना की जाती है। इस परिपूर्ण चक्र की उपासना से साधक अजर और अमर हो जाता है। मन्त्रसंकेत प्रथम चक्रसंकेत प्रकरण में भगवती त्रिपुरसुन्दरी के अवतार-स्थान श्रीचक्र का स्वरूप बताने के बाद द्वितीय मन्त्रसंकेत प्रकरण में श्रीविद्या का स्वरूप और उसके षड्विध अर्थों का निरूपण किया गया है। यहाँ बताया गया है कि इस दिव्य मन्त्रसंकेत को जानने १. नित्याषोडशिकार्णव, उपोद्घात, पृ० ७५-७८ द्रष्टव्य। कर्णिका, रुचक आदि कापालिक मत संमत छः मुद्राएं (अथवा पाँच मुद्राएं) बौद्ध तन्त्रों में भी स्वीकृत हैं। शाक्त तन्त्रों में मुद्रा शब्द का प्रयोग चना-चबैना के लिये किया जाता है। बौद्ध तन्त्रों में कर्ममुद्रा, धर्ममुद्रा, ज्ञानमुद्रा और महामुद्रा के रूप में भी मुद्राओं का वर्णन मिलता है।
[ २२ ] वाला वीरचक्रेश्वर, अर्थात् परशिव स्वरूप हो जाता है। यहाँ सर्वप्रथम नौ नित्याओं के नौ मन्त्रों (विद्याओं) के नाम बताये गये हैं और सातवीं मूर्तिविद्या का उद्धार भी किया गया है, क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य आठ विद्याओं का उद्धार नि० षो० में ही बता दिया गया है। नौ विद्याओं के नामों से ही उनका कहाँ विनियोग होता है, यह भी ज्ञात हो जाता है। प्रसंगवश यहाँ इन विद्याओं के बाह्य और आन्तर न्यास का विधान कर नौ नित्याओं के नाम गिनाये गये हैं और कहा गया है कि पूर्व वर्णित नौ चक्रों में इन नौ नित्याओं का पूजन करना चाहिये। आद्या शक्ति ही पूजा के समय नौ रूप धारण कर लेती है। वस्तुतः यह शक्ति एक ही है और यह साधक को अजर और अमर, अर्थात् परम शिवस्वरूप बना देती है। अर्थरत्नावली (पृ० १०७) में उद्धृत संकेतपद्धति के वचन में और शिवानन्द मुनि के सुभगोदय (श्लो० ४९) में आठ ही नित्याओं के नाम हैं, ऐसा प्रतीत होता है, किन्तु वहाँ (पृ० १०७) उद्धृत संकेतपद्धति के अन्य श्लोकों से ज्ञात होता है कि सातवीं विद्या त्रिपुरासिद्धा तथा आठवीं त्रिपुराम्बिका है। अतः सुभगोदय के ऊपर चर्चित वचन में सिद्धाम्बा शब्द में समास मानकर सिद्धा और अम्बा शब्दों को अलग-अलग मानना चाहिये। इस तरह से नित्याओं की संख्या नौ हो जाती है। संकेतपद्धति के अनुसार आठ अंग- नित्याओं के साथ नवीं अंगी (प्रधान) मूलविद्या को मिलाने से इनकी संख्या नौ हो जायगी। नवनित्याविधान नामक ग्रन्थ का एक वचन जयरथ द्वारा तन्त्रालोकविवेक (१५। २८१) में उद्धृत है। ग्रन्थ के इस नाम से भी नौ नित्याओं की प्रतीति होती है। अतः इस स्पष्टीकरण के आधार पर वहाँ (पृ० १०५ में) दी गई टिप्पणी में आवश्यक संशोधन कर लेना चाहिये। योगसूत्रकार¹ भगवान् पतंजलि ने मन्त्र के जप के साथ अर्थ की भावना का भी विधान किया है। निरुक्त² में अर्थ को बिना जाने वेद मन्त्रों का पाठ मात्र करने वाले की निन्दा और वेद मन्त्रों के अर्थ को जानने वाले की प्रशंसा की गई है। इसी बात को ³भास्करराय ने भी प्रकारान्तर से वरिवस्यारहस्य में कहा है। इसीलिये योगिनीहृदय के मन्त्रसंकेत प्रकरण में सामान्य पीठिका-बन्ध के बाद सौभाग्यविद्या के षड्विध अर्थों का १. तज्जपस्तदर्थभावनम् (१।२८) । २. स्थाणुरयं भारहारः किलाऽभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥ यद् गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥ (६।१) ३. नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति । भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥
[ २३ ] विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके नाम ये हैं—भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, सर्वरहस्यार्थ और महातत्त्वार्थ । यहाँ १६ से २५ श्लोक तक भावार्थ का, २६ से ४८ पर्यन्त सम्प्रदायार्थ का, ४८ से ५१ पर्यन्त निगर्भार्थ का, ५१ से ६८ तक कौलि- कार्थ का, ६९ से ७२ पर्यन्त सर्वरहस्यार्थ का और ७३ से ८० श्लोक पर्यन्त महातत्त्वार्थ का निरूपण किया गया है। षड्विध अर्थों का यह पूरा प्रकरण पारिभाषिक शब्दों, काम- कला के स्वरूप को स्पष्ट करने वाली दार्शनिक और यौगिक प्रक्रियाओं से भरा हुआ है। बहुत सावधानी से दो-चार बार पढ़ने के बाद ही यह विषय हृदयंगम हो सकता है। हम १कहीं लिख चुके हैं कि नि० षो० में कादिविद्या का तथा यो० हृ० में हादि- विद्या का उद्धार हुआ है। यो० हृ० का यह पूरा प्रकरण हादिविद्या के साथ ही संगत होता है, कादिविद्या के साथ जोड़ने में खीचातानी करनी पड़ती है। अतः यही मानना उचित है कि यो० हृ० में हादिविद्या का षड्विध अर्थ बताया गया है। कादिविद्या के पन्द्रह प्रकार के अर्थों का वर्णन भास्करराय ने वरिवस्यारहस्य के द्वितीय अंश में किया है। वे यो० हृ० की भी व्याख्या कादिविद्यापरक ही करते हैं। हम यहाँ कादिविद्या और हादिविद्या का स्वरूप प्रदर्शित कर रहे हैं। इनको देख कर पाठक स्वयं अपना निर्णय कर सकते हैं। पंचदशाक्षरी कादिविद्या—क ए ई ल ह्रीँ ह स क ह ल ह्रीँ स क ल ह्रीँ पंचदशाक्षरी हादिविद्या—ह स क ल ह्रीँ ह स क ह ल ह्रीँ स क ल ह्रीँ १. भावार्थ मन्त्र के अक्षरों से जो अर्थ निकलता है, उसको भावार्थ कहते हैं। सौभाग्यविद्या का स्वरूप योगिनी, वीर और वीरेन्द्रों का शिव और शक्ति के साथ समयोग होने पर बनता है। इन शब्दों का अर्थ संस्कृत व्याख्या के आधार पर भाषानुवाद में कर दिया गया है। यहाँ इनके द्वारा पंचदशाक्षरी श्रीविद्या के तीनों बीजों का उद्धार किया है। इस विषय को स्पष्ट करने के लिये टीकाकार ने अपने ही ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय के पूरे द्वितीय प्रपंच को यहाँ उद्धृत किया है। यहाँ ८ से १४ श्लोक पर्यन्त वाग्भव बीज का, १५-१६ श्लोकों में कामराज बीज का तथा १७-१८ श्लोकों में शक्ति बीज का उद्धार बताया गया है, जिसका कि स्वरूप हम ऊपर दे चुके हैं। १०वें श्लोक में ‘हस्यार्थः’ के स्थान पर ‘सस्यार्थः’ पाठ सही लगता है, किन्तु मूल ग्रन्थ में कोई पाठभेद न होने से हमने उसको छोड़ दिया है। द्वितीय बीज के केवल क और ल वर्ण के बीच में स्थित हकार का उद्धार किया गया है और इसी तरह तृतीय बीज के प्रथम हकार को ग्रहण न अर्थमजानानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् । उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ (२।५४-५५) १. द्रष्टव्य—नि० षो० उपोद्घात, पृ० १०० की १ टि० ।
[ २४ ] करने का कारण बताया गया है। बाकी वर्ण द्वितीय तथा तृतीय बीज में प्रथम बीज के समान ही हैं। यहाँ वर्णों की पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी अवस्थाओं का भी वर्णन है। पश्यन्ती और मध्यमा वाणी का स्वरूप कामकलाविलास (श्लो० २३-२७) में वर्णित है और वैखरी वाणी का स्वरूप दीपिका (२।६३-६४) और अर्थरत्नावली (पृ० ३६-३७) में उद्धृत संकेतपद्धति के वचनों में अधिक स्पष्ट है। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका—ये चार शक्तियाँ प्रकाशात्मक अनुत्तर अकार की तथा इच्छा, ज्ञान, क्रिया और शान्ता शक्तियाँ विमर्शात्मक हकार की अंशभूत हैं। इन अंशों (आठ) और अंशियों (दो) की व्यष्टि रूप में संख्या १० हो जाती है। इन सबका समष्ट्यात्मक भी एक रूप है और ये सभी मिल कर पश्यन्ती वाणी को एकादशधा विभक्त कर देते हैं। सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या (तुरीय) अवस्थाओं की प्रतीक वामा आदि और इच्छा आदि चार-चार शक्तियों के व्यष्ट्यात्मक आठ और एक समष्ट्यात्मक स्वरूप मिल कर नवविध नादरूपा और भूतलिपिमयी मध्यमा वाणी के स्वरूप को प्रस्फुटित करते हैं। स्थूल और सूक्ष्म के भेद से यह दो प्रकार का है। इसका सूक्ष्म रूप नवनादमय तथा स्थूल स्वरूप नौ वर्ग वाली भूतलिपि¹ से बनता है। वैखरी वाणी के ४७ भेदों में आकार से सकार पर्यन्त वर्णों की गणना की जाती है। अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता के कारण समष्टि और व्यष्टि रूप में इनका समावेश परा और पश्यन्ती वाणी में किया जाता है। ककार और षकार के संयोग से बने क्षकार की अलग से गणना नहीं की जाती और ळकार का लकार में अन्तर्भाव कर लिया जाता है। इस प्रकार यहाँ वैखरी वाणी के वर्णों की संख्या ४७ मानी जाती है। पश्यन्ती के ग्यारह, मध्यमा के नौ और वैखरी वाणी के ४७ वर्णों को मिलाकर इस मत में मातृका-पीठ में ६७ वर्ण माने जाते हैं। व्यष्टिरूप में तीन बीजों वाली इस सौभाग्यविद्या का समष्ट्यात्मक एक तुरीय (अनाख्य) स्वरूप भी है। यह परा वाणीमय है। परा देवी का परम आनन्द से ओत-प्रोत स्पन्दात्मक स्वभावसुन्दर स्वरूप इसी में छिपा हुआ है। प्रकाश और विमर्श का सामरस्य- मय यह स्वरूप शाश्वत ब्रह्म के ज्ञानमय स्वरूप में उसकी आराधना (मनन) करने वाले साधक की रक्षा करता है, अतः इसको मन्त्र² भी कहा जाता है। १. नौ वर्ग वाली भूतलिपि का परिचय पृ० ३२५ की टिप्पणी में दिया गया है। २. पुरुष-देवता के मनु को मन्त्र तथा स्त्री-देवता के मन्त्र को विद्या कहा जाता है। देखिये ऋजुविमर्शिनी - "पुंरूपवाच्याध्यासिता मन्त्राः····स्त्रीरूपवाच्याध्यासिताश्च विद्याः" (पृ० ४२-४३)। "मन्त्राः पुंरूपवाच्याधिष्ठिताः, विद्याः स्त्रीरूपवाच्याधिष्ठिताः" दीपिका (३।१५१)। भास्करराय ने गुरु(नाथ)नवरत्नमाला की व्याख्या में यह श्लोक उद्धृत किया है—"स्त्रीदैवत्याः स्मृता विद्याः पुंदैवत्यास्तु मन्त्रकाः" (पृ० ६)।
[ २५ ] इस तरह से चिह्न के समान श्रीविद्या में भी परा आदि चारों वाणियां निहित हैं। ऋग्वेद के "चत्वारि वाक्" प्रभृति मन्त्र का अर्थ इन चार वाणियों की तान्त्रिक व्याख्या में ही अधिक संगत लगता है, क्योंकि वाणी के परा, पश्यन्ती और मध्यमा नामक तीन स्वरूप छिपे हुए हैं और चौथी वैखरी वाणी को ही मनुष्य बोलते हैं। निरुक्त¹ अथवा महाभाष्य में प्रदर्शित व्याख्याओं में यह संगति बैठ नहीं पाती। मूल चक्र में स्थित परा वाक् से ही नाभिस्थान में पश्यन्ती और हृदय स्थान में मध्यमा वाणी तथा आगे कण्ठ आदि स्थानों में वैखरी वाणी की अभिव्यक्ति होती है। अमृतानन्द ने सौभाग्य- सुधोदय (१।६) में अनाहत, हृत और उत्तीर्ण पदों से मध्यमा, वैखरी और पश्यन्ती वाणी का क्रमशः बोध कराया है और कहा है कि परा वाणी से ही ये तीनों स्वरूप प्रकट होते हैं। यह बताया जा चुका है कि कामबिन्दु और उसकी विसर्गात्मक कला के मध्य में स्थित बिन्दु परा वाक् का निवास-स्थान है। इस कामकला में अकुल और कुल कुण्ड- लिनी रूप अकार एवं हकार समरस रूप में स्थित हैं। कामकला में स्थित इन दो अक्षरों में से हकार की स्थिति द्वितीय कामराज बीज में स्पष्टतया तथा अकार की स्थिति तृतीय शक्ति बीज में अस्पष्ट रूप से मानी गई है। वाग्भव बीज में ये समरस रूप में स्थित हैं। इसी समरस बिन्दु में जब स्पन्दन उठता है, विष (संसार) और अमृत (मोक्ष)- मय धर्म (शिव) और अधर्म (शक्ति) रूपी वाच्य अर्थ जब वाचक अक्षरों से संवलित हो जाते हैं, तब यह विश्वोत्तीर्ण महाविद्या विश्वरूप बन जाती है। उस समय तीन-तीन संख्या वाले सभी पदार्थों की समष्टिरूपिणी यह परा मातृका तीन कूटों का स्वरूप धारण कर व्यष्टिरूपिणी बन जाती है। इस प्रकार समष्टि और व्यष्टि रूपिणी इस आद्या शक्ति की पंचदशाक्षरी विद्या के अक्षरों में विविध रूपों में भावना करना ही भावार्थ कहलाता है। २. सम्प्रदायार्थ सम्प्रदाय (ज्ञान की परम्परा) गुरुमुख से ही जाना जा सकता है। यह विश्वातीत तत्त्व कैसे विश्वमय हो जाता है, इस विषय की जानकारी भी हमें इसी तरह से मिलती है। शिव और शक्ति, अकार और हकार के समरस स्वरूप से स्फुरित मूलविद्या से सारा जगत् किस तरह से व्याप्त है, सम्प्रदायार्थ में इसी विषय को स्पष्ट किया जाता है। यह विश्व पंचभूतमय है, सौभाग्यदेवता और उसकी मूलविद्या भी पंचभूतमय है। हकार से आकाश, ककार से वायु, रेफ से अग्नि, सकार से जल तथा लकार से पृथिवी की उत्पत्ति होती है। इस तरह से यह विश्वातीता शक्ति विश्वमय हो जाती है। इन भूतों में सब मिला कर जैसे पन्द्रह गुण होते हैं, उसी तरह से इस मूलविद्या में भी पन्द्रह अक्षर हैं। १. पृ० १२९ की टिप्पणी देखिये।
[ २६ ] इस पंचदशाक्षरी विद्या के पाँच वर्ण वाग्भव बीज में, छः कामराज बीज में और चार शक्ति बीज में स्थित हैं। स्वर और व्यंजन के भेद से इसके ३७ अवयव हो जाते हैं। ३६ तत्त्व इसके व्यष्टि रूप से बनते हैं और इसका ३७वां भेद समष्टिमय है। इस तरह से यहाँ भी इस विद्या की विश्वातीत और विश्वमय रूप में भावना की जाती है। विश्वातीत तत्त्व किस तरह से विश्वमय ३६ तत्त्वों का रूप धारण कर लेता है, इसका सुन्दर विश्लेषण टीकाकार ने अपने ही ग्रन्थ 'सौभाग्यसुधोदय के प्रथम प्रपंच के विस्तृत उद्धरण को देकर किया है। वस्तुतः जगत् का प्रत्येक पदार्थ और उसमें निहित शक्तियां शिव और शक्ति के समरस रूप परम तत्त्व से ही स्वात्मलाभ करते हैं। सौभाग्यविद्या में छः हकार हैं। हकार आकाश का बीज है, अतः इन हकारों में से पाँच हकार आकाश के पाँच गुणों के और छठा नादात्मक हकार इन सबका कारण है। विद्या स्थित तीन ईकार तथा कामकला का कारणभूत समरस बिन्दु वायु स्थित चार गुणों की उत्पत्ति में कारण हैं। तीन रेफ तीन रूपों के अभिव्यंजक हैं। २विद्या स्थित तीन सकारों में से दो जल और पृथिवी के रस के तथा तीसरा अमृत रस का जनक है। लकार से पृथिवीगत गुण की उत्पत्ति होती है। श्रीविद्या में तीन लकार हैं। ये तीनों तीन भुवनों में स्थित गन्ध गुण के द्योतक हैं। विद्या स्थित तीन ककारों में अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रकार के प्रमाताओं की अभिव्यक्ति होती है। यहाँ अशुद्ध सकल, शुद्ध विज्ञानाकल और मिश्र प्रमाता प्रलयाकल कहलाते हैं। श्रीविद्यागत बारह अकारों में से दस जीव के, ११वां प्राण का और १२वां परम शिव का सूचक है। यद्यपि एक ही अकार से जीव तत्त्व का द्योतन हो सकता है, किन्तु एक ही तत्त्व जीवों के रूप में बहुधा विभक्त हो जाता है, इस बात को सूचित करने के लिये यहाँ दस अकारों की योजना की गई है। विद्यागत तीन बिन्दु रुद्र, ईश्वर और सदाशिव के तथा तीन नाद ३शान्ति, शक्ति तथा शंभु के बोधक हैं। मछली पकड़ने के जाल के लोहे के कड़े में जैसे सारे धागे १. पृ० १४५-१४६ की टिप्पणी देखिये। २. "विद्यास्थैश्चन्द्रबीजैः" (२।४१) यहाँ भास्करराय ने बहुवचन को द्विवचनपरक माना है, क्योंकि कादिविद्या में दो ही सकार हैं। ३. शान्ति शब्द से यहाँ बिन्दु का ग्रहण मानना चाहिये। शक्ति तत्त्व के पाँच भुवनों में से एक का नाम शान्ति है। इसको बैन्दव पुर भी कहा जाता है। श्रीकण्ठ सूरि ने रत्नत्रयपरीक्षा में बिन्दु की शिव और शक्ति के अतिरिक्त तृतीय रत्न के रूप में प्रतिष्ठा की है। इसी को वहाँ (श्लो० ७०-७१) महामाया और कुण्डलिनी भी कहा गया है। ब्रह्मरन्ध्र की अवसान भूमि में यह विश्राम करती है। पृ० १६९ की टिप्पणी में उठाई चर्चा इससे समाहित हो जाती है।
[ २७ ] और लोहे की गोलियाँ जुड़ी रहती हैं, उसी तरह से इस सौभाग्यविद्या में सब कुछ ओतप्रोत हैं। इस प्रकार यहाँ सौभाग्यविद्या का जो अर्थ बताया गया है, वह गुरु- (सम्प्रदाय) परम्परा से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिये इसे सम्प्रदायार्थ कहा जाता है। ३. निगर्भार्थ सौभाग्यविद्या के निगर्भार्थ के अनुसार शिव, गुरु और आत्मा की अभिन्नता, एकता का अनुसन्धान किया जाता है। यहाँ पहले शिव के निष्कल (निरवयव) स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। इसके बाद गुरु की भी उसी रूप में भावना की जाती है। ऐसा करने से अन्ततः शिष्य की आत्मा भी गुरुमय और शिवमय हो जाती है। ४—कौलिकार्थ कौलिक अर्थ में चक्र, देवता, विद्या, गुरु और आत्मा की एकता का अनुसन्धान किया जाता है। विद्यागत लकार से चतुरस्र की, शाक्त (सकार) से वृत्तत्रय और तदन्तर्गत षोडशदल एवं अष्टदल पद्म की अभिव्यक्ति होती है। तीन हृल्लेखाओं के तीन-तीन, अर्थात् नौ अक्षरों से नवयोनि चक्र निष्पन्न होता है। चतुर्दशार, बाह्यदशार और अन्तर्दशार की निष्पत्ति विद्यागत हकारों से होती है। विद्यागत ककार से महाबिन्दु- मय सदाशिवासन बनता है। इस तरह से चक्र और मन्त्र की अभिन्नता की भावना की जाती है। इसी चक्र से १११ आवरण देवताओं¹ वाली समष्ट्यात्मक परदेवता का दिव्य शरीर बनता है। नि० षो० (१।१) में देवी को गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी और राशि स्वरूपिणी कहा है। ऊपर बताये गये आवरण देवताओं के गण की अधीश्वरी होने से यह गणेश कहलाती है। सोम, सूर्य, अग्नि; इच्छा, ज्ञान, क्रिया और सत्त्व, रज, तम नामक गुणों के योग से यह ग्रहस्वरूपिणी है। ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनके विषय, चार अन्तःकरण, प्रकृति, गुण और आत्मा के भेद से यह नक्षत्रस्वरूपिणी है। त्वक् आदि छः धातुओं की अधिष्ठात्री डाकिनी आदि योगिनियाँ तथा आठ वर्गों की अधिष्ठात्री ब्राह्मी आदि देवियाँ इसी शक्ति का विलास हैं। इनके कारण यह योगिनी कहलाती है। प्राण आदि दस वायु, जीवात्मा और परमात्मा के भेद से यह राशिस्वरूपिणी है। सौभाग्यदेवता जैसे गणेश आदि भेदों से अलंकृत हैं, उसी तरह से परा, पश्यन्ती आदि चतुर्विध वाणी का स्वरूप धारण करने वाली सौभाग्यविद्या भी आदि, कादि और थादि के क्रम से विभक्त बीजों की स्वामिनी होने से गणेश कही जाती है। तीन कूटों में विद्यमान बीज, बिन्दु और ध्वनि (नाद) की नवात्मकता के कारण वह ग्रहात्मिका है। तीन हृल्लेखाओं के पन्द्रह तथा अन्य बारह अक्षरों के होने से यह नक्षत्रस्वरूपिणी है। विद्यागत तीन हृल्लेखाओं और १. पृ० १८३-१८४ मूल और टीका देखिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
[ २८ ]
तीन लकारों की शाक्त संज्ञा है। इसके कारण विद्या योगिनी कहलाती है और अन्तिम हृल्लेखाओं को छोड़ देने पर यह राशिस্বরূপिणी हो जाती है। सौभाग्यविद्या और सौभाग्यदेवता के समान श्रीचक्र में भी गणेश आदि की स्थिति है, इसका प्रकार दीपिका- कार (२।६७) ने बताया है। देवी के देह में जैसे गणेश आदि रूपों की योजना बताई गई है, उसी तरह से गुरु के देह में भी इस सब की भावना की जाती है। अन्ततः गुरु के प्रसाद से शिष्य में भी इन सब स्वरूपों की अभिव्यक्ति हो जाती है। यह सब श्रीविद्या के इस कौलिक अर्थ की भावना से होता है। ५. सर्वरहस्यार्थ बिजली के समान कान्ति वाले वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत मूलाधार में अड़तीस ¹कलाओं से युक्त पचास वर्णों का शरीर धारण करने वाली विद्या कुण्डलिनी के रूप में विराजमान है। तीन मण्डलों का भेदन करने वाली, करोड़ों विद्युत्पुंजों के समान कान्ति वाली, कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली यह कुण्डलिनी शक्ति जब शून्यगगन में चन्द्रमण्डल से संयुक्त होती है, तो अमृत रस झरने लगता है। सदा आनन्दस्वरूपिणी यह शक्ति अपने इस अमृत रस से सारे संसार को आप्यायित किये रहती है। यह शक्ति स्वयं मेरी आत्मा है, ऐसी बुद्धि ही रहस्यार्थ के नाम से यहाँ प्रसिद्ध है। ६. महातत्त्वार्थ निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर देने का ही नाम महा- तत्त्वार्थ है। इस परम स्वरूप के प्रकाश से ही तेज और तम जैसे विरोधी स्वभाव वाले भाव भी प्रकाशित होते हैं। इसीलिये यह सारा विश्व इसमें अभिन्न रूप से स्थित है। यह महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है। इसके प्रकाश के लिये किसी दूसरे प्रकाश (तत्त्व) की आवश्यकता नहीं है। इस अर्थ की भावना से साधक समस्त संकल्पविकल्पात्मक स्थितियों से ऊपर उठ जाता है। इसका वर्णन महाज्ञानार्णव तन्त्र तथा विद्यापीठ संबन्धी आगमों में किया गया है। कौलाचार का पालन करने वाले, गुरु की पादुका की सेवा तथा योगिनीमेलन में उद्युक्त, विधिपूर्वक अभिषिक्त, समस्त शंकाओं से उन्मुक्त, सदा प्रसन्न चित्त रहने वाले व्यक्ति को ही गुरु-परम्परा से ज्ञान का सारा रहस्य प्राप्त होता है। ऐसा ही साधक इस सर्वरहस्यार्थ की भावना करने में समर्थ होता है।
१. पञ्चमन्त्रतनु शिव के अघोर आदि पाँच मुखों की स्वच्छन्दतन्त्र (१।५३-५९), नेत्र- तन्त्र (२२।२६-३४) आदि में वर्णित ३८ कलाओं का भी यहाँ ग्रहण किया जा सकता है।
[ २९ ]
इन षड्विध अर्थों की भावना करने वाला साधक गुरु की कृपा होने पर पूर्ण बोध- भाव को प्राप्त कर लेता है, निर्मल स्वात्मस्वरूप को १पहचान लेता है। वह स्वयं परशिव स्वरूप हो जाता है। पूजासंकेत तृतीय पूजासंकेत में सर्वप्रथम परा, अपरा और परापरा नाम की त्रिविध पूजा की परिभाषा दी गई है। इन्द्रियों के समस्त व्यापारों में एकमात्र अद्वय शिवतत्त्व को ही देखना, पहली परा पूजा है। श्रीचक्र की बाह्य उपादानों से की गई पूजा अपरा कहलाती है। बाह्य विषयों में संलिप्त अपने विमर्शमय स्वरूप को प्रकाशमय स्वरूप में समेट लेना २परापरा पूजा है। विकल्पों की शुद्धि के लिये इसमें आत्मयजन किया जाता है। परा पूजा उत्तम, अपरा अधम और परापरा पूजा मध्यम कोटि की मानी जाती है। इस त्रिविध पूजा की व्याख्या हम शांभव, शाक्त और आणव उपायों के रूप में कर सकते हैं। त्रिविध पूजा परा पूजा में महापद्मवन (ब्रह्मरन्ध्र) में विद्यमान अधोमुख अकुल कमल में अमृत की वर्षा करने वाली गुरुपादुका का ध्यान किया जाता है। ऐसा करने से साधक को अद्वैत भावना का नशा चढ़ जाता है। वह दहराकाश में ध्वनित हो रहे नाद को सावधानी से सुनने लगता है और जागतिक विकल्प जाल से, नाना प्रकार के बाह्य वैखरी वर्णों से घटित नामों के उच्चारण से विमुख हो जाता है। तब वह सदा सदा के लिये अन्तर्मुख हो जाता है। अपने में चित्कला के उल्लास को भर कर और संकोच बुद्धि को दूर भगा कर वह परम सुन्दर भगवती त्रिपुरसुन्दरी के स्वरूप में विलीन हो जाता है। ऐसे साधक को अपने विकल्पों की शुद्धि के लिये स्वात्मदेवता प्रीत्यर्थ इन्द्रियों को तृप्त करने वाले द्रव्यों से परापरा पूजा का अधिकार प्राप्त हो सकता है। अपरा अथवा परापरा पूजा का साधक सर्वप्रथम अपने शरीर की शुद्धि के लिये, उसको देवमय बनाने के लिये षड्विध न्यास का अनुष्ठान करता है। यह न्यास गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि और पीठ के नाम से प्रसिद्ध है ( श्लो० ८-४० ) । षोढा न्यास के बाद श्रीचक्रन्यास किया जाता है। यह न्यास साधक के शरीर के बाह्य और आन्तर अवयवों को पवित्र कर देता है। पहले संहारक्रम ( श्लो० ४१-६९ ) और बाद
१. प्रत्यभिज्ञा पद के अर्थ के लिये देखिये - ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी भास्करी टीका, प्रथम संस्करण, पृ० ३६-३८, सर्वदर्शनसंग्रह (मूलमात्र) आनन्दाश्रम पूना, द्वितीय संस्करण, पृ० ७४. २. परापरा पूजा का विवरण यहाँ अलग से न देकर परा और अपरा के साथ ही संक्षेप में दे दिया गया है। इसके विशेष विवरण के लिये 'सारस्वती सुषमा' का म० म० गोपीनाथ कविराज शताब्दी विशेषांक, पृ० १२७-१३९ देखिये।
[ ३० ]
में सृष्टिक्रम (श्लो० ६९-८१) से यह किया जाता है। इसके बाद करशुद्ध्यादि न्यास, विद्या न्यास, श्रीकण्ठादि न्यास, तत्त्व न्यास और व्यापक न्यास का विधान है (श्लो० ८१-८६)। अन्त में (श्लो० ८६) परा न्यास का विधान कर तीन श्लोकों (८७-८९) में न्यास प्रकरण का उपसंहार करते हुए चतुर्विध न्यास का कालभेद से विनियोग बताया गया है। परा न्यास में देवी को सौम्य, आग्नेय और अमृतमय द्रव्यों से तृप्त किया जाता है। यह परापरा पूजा का अंग है। इन चतुर्विध न्यासों से देवमय बना साधक देवी के आसन के रूप में श्रीचक्र की रचना करता है और फिर इसी में देवी की आन्तर और बाह्य वरिवस्या करता है। बाह्य पूजा से पहले आन्तर वरिवस्या करनी चाहिये, इस सिद्धान्त को स्वीकार कर ज्ञान- दीपविमर्शिनी आदि प्राचीन पद्धति ग्रन्थों में सूर्योपस्थान, सन्ध्या, तर्पण आदि प्रकरणों की दो प्रकार की व्याख्या की गई है। यहाँ भी सर्वप्रथम बाह्य और आन्तर विघ्नों के अपसारण की विधि बताई गई है। तब सामान्य अर्घ्य से ग्रह आदि परिवार के साथ आन्तर और बाह्य सूर्यपूजा का विधान है। श्रीचक्र का निर्माण कपूर, केसर, रोचना, अगुरु, कुंकुम आदि के घोल से किया जाता है। श्रीचक्र और साधक के बीच के स्थान में सामान्य और विशेष अर्घ्य के पात्रों की प्रतिष्ठा की जाती है और इनमें सूर्य, चन्द्र और वह्नि की ३८ कलाओं की पूजा की जाती है। अर्घ्यशुद्धि के बाद उसको पहले गुरु- पंक्ति को निवेदित कर मूलविद्या का जप करते हुए साधक स्वात्मयजन के लिये स्वयं भी ग्रहण करता है। इसके बाद श्रीचक्र का पूजन आरम्भ होता है। सबसे पहले गणेश और दूतरी, क्षेत्रेश और दूतिका का पूजन किया जाता है। बाह्य द्वार पर स्वस्तिका आदि देवियों की पूजा की जाती है। त्रिकोण चक्र में दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ क्रम से विभक्त त्रिविध गुरुपंक्ति का पूजन और मध्य बिन्दु में कामेश्वर-कामेश्वरी के युगल स्वरूप की आराधना की जाती है। त्रिकोण में ही काम्य कर्म के अनुसार तिथि-नित्याओं का पूजन किया जाता है। आगे (३।१६७) बताया गया है कि इनकी पूजा चतुरस्र में भी की जा सकती है। इसके बाद संहार क्रम से नौ चक्रों में प्रकटा आदि नौ योगिनियों की आरा- धना की जाती है। इन्हीं के साथ नि० षो० में प्रदर्शित नौ चक्रों के आवरण देव- ताओं का भी पूजन किया जाता है। इसका प्रकार यहाँ ११३-१६७ श्लोकों में बताया गया है। इस प्रकरण में प्रकटा आदि, त्रिपुरा आदि और करशुद्धिकरी आदि का निर्वचन भी बताया गया है। षोडशदल चक्र की वासना के प्रसंग में यहाँ (३।१२७) षोडश प्राणों का उल्लेख किया गया है। दीपिकाकार का कहना है कि दस प्राण तो प्रसिद्ध हैं। बाकी
[ ३१ ]
के छः प्राणों की आगमान्तर में खोज करनी चाहिये । संभव है ये नाम 'बौद्ध तन्त्रों में उपलब्ध हों । तृतीय चक्र की वासना में पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत की चर्चा है । इन शब्दों के विषय में हम अन्यत्र² लिख चुके हैं । चतुर्थ चक्र की वासना में बारह ग्रन्थियों का उल्लेख है । यहाँ छः चक्रों में प्रत्येक के ऊपर और नीचे दो-दो ग्रन्थियाँ मानी गई हैं । इनके नाम नेत्रतन्त्र ( ७।२२-२५ ) में मिलते हैं । यहीं आगे (३।१८४) बताया गया है कि इन बारह ग्रन्थियों के भेदन से साधक को सुषुम्ना नाडी में प्रवेश मिलता है । चतुर्दशार, बहिर्दशार, अन्तर्दशार और वसुकोण चक्र में यहाँ ९ वर्ग और ४२ वर्ण वाली भूतलिपि का विन्यास बताया गया है । हम अभी बता चुके हैं कि भूत- लिपि मध्यमा वाणी का स्थूल रूप है । पंचम चक्र की वासना में नौ नाद और नौ रन्ध्रों की चर्चा है । नौ नादों की चर्चा हम ³अन्यत्र कर चुके हैं । दीपिकाकार ( ३।१४२ ) ने नवरन्ध्र पद की व्याख्या नवाधारपरक करके उनके नाम गिनाये हैं और इसके लिये स्वच्छन्दसंग्रह को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है । यहाँ दीपिकाकार द्वारा दिये गये नामों और स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में परिगणित नामों में समानता नहीं है । इस तरह के नामों का उल्लेख हमें अभी तक कहीं नहीं मिला । अतः इस विषय की हम अभी विशेष चर्चा करने में असमर्थ हैं । नवम चक्र की वासना में महात्रिपुरसुन्दरी को पुनः महाकामकला स्वरूप बताया गया है । इस विषय की चर्चा हम यहीं कर चुके हैं । दीपिकाकार ने बताया है कि कामबीज का उद्धार नि० षो० ( १।१८४ ) में बताई गई विधि से किया जाता है । नौ चक्रों और नौ नित्याओं के पूजन के बाद देवी को कुलदीप निवेदित किया जाता है । यहाँ ( ३।१६९-१८९ ) जप का एक विशिष्ट प्रकार बताया गया है, जो कि हमारी जानकारी में अन्य किसी ⁴ग्रन्थ में नहीं मिलता ।
जप श्रीविद्या में वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज नाम के तीन कूट हैं । ⁵आधार
१. "स्थितः पादतले वायुर्वैरम्भो धनुराकृतिः" वसन्ततिलक ( ८।५ ) का यह श्लोक इस ओर इंगित करता हुआ लगता है । झ. मातृका में 'प्राणादिषोडश' के स्थान पर 'प्राणादिदश' ( पृ० ३१८ ) पाठ है । पृ० ३१७ की टिप्पणी भी देखिये । २. देखिये-नि० षो० उपोद्घात, पृ० १०८ की तीसरी टिप्पणी । ३. द्रष्टव्य-नि० षो० उपोद्घात, पृ० ६३-६५ तथा टिप्पणियां । ४. इस विषय का विशेष परिचय "तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि" नामक ग्रन्थ के 'जपविज्ञान' और 'नादतत्व' शीर्षक निबन्धों से प्राप्त किया जा सकता है । स्वच्छन्दतन्त्र ( ४।२५४-३३४ ) में प्रकारान्तर से यह विषय वर्णित है । ५. आधार शब्द यहाँ मूलाधारपरक है । सौन्दर्यलहरी की लक्ष्मीधरा ( पृ० ६९ )
[ ३२ ] हृदय और बिन्दुस्थान (भ्रूमध्य) में तीन कुण्डलिनियां स्थित हैं। वह्नि, सूर्य और सोम कुण्डलिनी के नाम से ये प्रसिद्ध हैं। तीन बीजों के अन्त में विद्यमान हृल्लेखाओं (ह्रींकार) के कामकला नामक अवयव में वर्तमान हार्धकलाओं में ये कुण्डलिनियाँ स्थित हैं। अकुल से ¹भ्रूमध्य पर्यन्त नौ स्थानों में भावित त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में से तीन तीन चक्रों की एक एक बीज और कुण्डलिनी में नाद रूप से भावना ही जप कहलाती है। इस जपविधि में त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों की तथा वाग्भव बीज की मूलाधार स्थित वह्निमण्डल में स्थिति मानी जाती है। वाग्भव बीज के अन्त में स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी वह्निकुण्डलिनी जब हृदय स्थित कामराज बीज तक उठती है, उस समय उसकी ऊपर उठते हुए नाद के रूप में भावना की जाती है। इसी को वाग्भव बीज जप कहा जाता है। इसी तरह से सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों की तथा कामराज बीज की हृदय स्थित सूर्यमण्डल में स्थिति मानी जाती है। कामराज बीज के शिखर पर स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी सूर्यकुण्डलिनी जब भ्रूमध्य स्थित शक्ति बीज तक उठती है, उस समय उसकी भी ऊपर उठते हुए नाद के रूप में भावना की जाती है। इसको कामराज बीज जप कहा जाता है। सर्वरोगहर आदि तीन चक्रों की तथा शक्ति बीज की स्थिति भ्रूमध्य स्थित सोम- (इन्दु)मण्डल में मानी जाती है। शक्ति बीज के शिखर पर स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी सोमकुण्डलिनी जब भ्रूमध्य से उठ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त पहुँचती है, उस समय समना की सीमा को लाँघ कर नाद उन्मना में प्रविष्ट हो रहा है, इस प्रकार की भावना की जाती है। इसी को शक्ति बीज जप कहा जाता है। और अरुणामोदिनी (पृ० ७२) टीका में रुद्ररहस्य के प्रमाण से मूलाधार को पृथिवी-तत्त्वात्मक माना है और उसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है—"मूले गुदस्थाने सर्वाधारभूतं चक्रं मूलाधारमिति" (पृ० ६९), "आ समन्ताद् ध्रियते शरीरमनेने- त्याधारः। मूले गुदस्थाने स्थित आधारो मूलाधारः। अथवा मूलं सर्वेषां चक्राणा- मादिकारणम्, स चासावाधारश्च मूलाधारः, तस्मिन् सर्वचक्राधारे चतुर्दलत्वेन कुण्डलिनीशक्तेर्नित्यनिवासत्वेन प्रसिद्धे मूलाधाराख्ये चक्रे" (पृ० ७२)। यहाँ बताया गया है कि पृथिवी-तत्त्वात्मक मूलाधार के अभाव में या तो देह गिर पड़ेगा अथवा ऊपर उठ जायगा। १. यहाँ (पृ० ३५९) दीपिकाकार ने अकुल से बिन्दु पर्यन्त स्थानों की चर्चा की है। पहले (पृ० ११३) भी उन्होंने यही व्याख्या की है। इसका कारण भी उन्होंने (पृ० ३६-३७) बताया है। इसके लिये पृ० ३६-३७ और पृ० ११३ की टिप्पणी देखिये। श्रीविद्यार्णव में दीपिकाकार के मत का ही अनुकरण है।
[ ३३ ] ऊपर बताये गये तीनों बीजों की हृल्लेखायों में हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना-ये बारह कलाएं रहती हैं। द्वादशान्त में जाकर इन सबका लय हो जाता है। वाग्भव बीज स्थित कलाओं का कामराज बीज स्थित नाद में और कामराज बीज की कलाओं का शक्ति बीज स्थित नाद में विलय हो जाता है। अतः इस नाद की बारह कलाओं की स्पष्ट भावना केवल अन्तिम शक्ति बीज में ही की जा सकती है। इस जप में छः शून्यों की, पाँच अवस्थाओं की और सात विषुवों की भी भावना की जाती है। ५० या ५१ पीठ योगिनीहृदय के पूजासंकेत के षोढान्यास प्रकरण में पीठों के नाम ( ३।३४-४०) गिनाये गये हैं। पीठ ५० हैं या ५१, इस विषय में अपनी व्याख्या में भास्करराय ने अन्तिम पक्ष का समर्थन किया है। हम नि० षो० के उपोद्घात (पृ० ७८-८३) में पीठ- विषयक विचार प्रस्तुत कर चुके हैं। वहाँ पीठों की संख्या से संबद्ध विभिन्न पक्षों की भी चर्चा की गई है। इनका उल्लेख शैव और बौद्ध तन्त्रों में भी मिलता है। उनमें चार पीठ प्रायः सर्वत्र मान्य हैं। प्राचीन ग्रन्थों में पीठों के पीठ, उपपीठ, क्षेत्र, उपक्षेत्र, सन्दोह, उपसन्दोह, श्मशान, उपश्मशान आदि विभाग मिलते हैं। तन्त्रालोक तथा कौलज्ञाननिर्णय में भी इनका उल्लेख मिलता है। बौद्ध तन्त्रों में ऊपर के विभागों के अतिरिक्त मेलापक, उपमेलापक को जोड़कर पीठों के, जिनको कि यहां ^१भूमि नाम भी दिया गया है, द स प्रकार वर्णित हैं। हेवज्रतन्त्र में पीलव, उपपीलव विभाग को मिलाकर भूमियों की संख्या ^२बारह मानी गई है। वसन्ततिलक आदि अनेक बौद्ध तन्त्रों में सब मिलाकर पीठों की संख्या २४ तथा हेवज्रतन्त्र में ३२ है। तन्त्रालोक और उसकी टीका में ३४ पीठ परिगणित हैं। ^३अर्बुद को अर्धपीठ माना गया है। तन्त्रालोक की और बौद्ध तन्त्रों की सूचियों के अनेक नाम एक सरीखे हैं। आजकल पीठों के ५१ विभाग वाला पक्ष ही बहुत प्रचलित है। भास्करराय के अनुसार योगिनीहृदय को भी यही पक्ष मान्य है। डॉ० डी० सी० सरकार ने "दी शाक्त पीठाज्" नामक ग्रन्थ में प्रधानतः 'पीठनिर्णय' अथवा 'महापीठनिरूपण' नामक ग्रन्थ के आधार पर पीठविषयक विचार प्रस्तुत किये हैं। यहाँ इस ग्रन्थ का उन्होंने सम्पादन भी किया है। उन्होंने इस ग्रन्थ का जो काल निर्धारित किया है (पृ० २३-२४), उससे ज्ञात होता है कि यह ग्रन्थ योगिनीहृदय से अर्वाचीन १. केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ की शोधपत्रिका 'धीः' का प्रथम अंक, पृ० १४०-१४१ देखिये। २. वहीं, पृ० १४२-१४३ देखिये। ३. "अर्बुदमर्धपीठं तु" (कौलज्ञाननिर्णय, ८।२२)। ३
१. प्रथम विश्राम: चक्र-संकेत (श्रीचक्र नव-आवरण रहस्य एवं बिन्दु-त्रिकोण विमर्श)
[ १४ ] है। पीठविषयक विचार प्रस्तुत करते हुए लेखक ने बौद्ध चतुष्पीठ तन्त्र का उल्लेख किया है, किन्तु इस ग्रन्थ का प्रस्तुत पीठ विभाग से कोई संबन्ध नहीं है। उनके द्वारा उद्धृत (पृ० ११) आत्मपीठ, परपीठ आदि नामों से ही यह स्पष्ट हो जाता है। डॉ० सरकार द्वारा उद्धृत ज्ञानार्णव, कुब्जिकातन्त्र, तन्त्रसार आदि ग्रन्थ कालिक दृष्टि से योगिनीहृदय से अर्वाचीन हैं। अतः प्रस्तुत पीठविषयक विचार हमारी दृष्टि में योगिनी- हृदय को केन्द्रबिन्दु मानकर किया जाना चाहिये। डॉ० सरकार का प्रयास अपने आप में महत्त्वपूर्ण होते हुए भी नूतन सामग्रियों की उपलब्धि के कारण अब कुछ पिछड़ गया है। यहाँ तन्त्रालोक और उसकी टीका में संगृहीत सामग्री का उपयोग नहीं किया गया। पीठों के सही नाम का निर्णय करना भी एक समस्या है। प्राचीन शैव, शाक्त तथा बौद्ध तन्त्रों की नामावलियों के सहारे ही इनका सही स्वरूप निश्चित किया जा सकता है। पीठविषयक सबसे बड़ी समस्या है, उनकी वर्तमान भौगोलिक स्थिति। कौन पीठ भारत के किस प्रदेश में किस स्थान पर है, इसका निर्णय करने के लिये भी अनेक प्रयास किये गये हैं, किन्तु यह कार्य इतना सरल नहीं है। मुख्य चार पीठों—कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओडियान—की अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थिति के विषय में भी हम कोई निर्विवाद समाधान नहीं प्रस्तुत कर पाये हैं। जालन्धर पीठ की भौगोलिक स्थिति को सुनिश्चित करने के लिये हालैण्ड की उचट्रेष्ट युनिवर्सिटी योजना बनाने का उपक्रम कर सकती है, किन्तु भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार अथवा विद्यासंस्थाएँ इस तरफ से उदासीन हैं। योगिनीहृदय के तीनों संकेतों का हमने यहाँ संक्षिप्त परिचय दिया है। दीपिका टीका, भाषानुवाद और स्थान स्थान पर दी गई टिप्पणियों के सहारे इनका विस्तृत विवरण जाना जा सकता है। दीपिका के सहारे हमें अनेक लुप्तप्राय विषयों का पता चलता है। अतः उसका अपना महत्त्व है। ऐसे कुछ स्थलों की हम यहाँ चर्चा करना चाहते हैं। नौ आधार वरिवस्यारहस्य की स्वोपज्ञ प्रकाश टीका (पृ० १६) में भास्करराय ने लिखा है कि सुषुम्ना नाडी के मूल और अग्र भाग में दो सहस्रदल कमल हैं और इन दोनों के बीच में अष्टदल, षड्दल आदि तीस पद्म हैं। इनका स्वच्छन्दसंग्रह आदि में विस्तार से वर्णन किया गया है। स्वच्छन्दसंग्रह अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है। भास्करराय को इस विषय की जानकारी दीपिका से ही मिली होगी। "अकुले' विषुसंज्ञे च" (१।२५) १. दीपिकाकार ने दो स्थलों पर (१।२५; २।८) सुषुम्ना मूल स्थित अरुण सहस्रदल कमल को अकुल तथा दो स्थलों पर (३।५, ३।१३७) ब्रह्मरन्ध्र में स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा है। इस प्रसंग में पृ० ३२९ की पहली
[ ३५ ]
इत्यादि श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में अमृतानन्द ने स्वच्छन्दसंग्रह के अनेक वचन उद्धृत किये हैं, जिनसे पता चलता है कि सुषुम्ना नाडी के नीचे और ऊपर रक्त और श्वेत वर्ण के कुल और अकुल नामक दो सहस्रार कमल स्थित हैं तथा इन दोनों के बीच में तीस आधार पंकज विद्यमान हैं। खेद का विषय है कि इन सबका वर्णन करने वाले सभी वचन उद्धृत न होकर केवल योगिनीहृदय द्वारा परिगणित नौ आधारों से संबद्ध वचन ही यहाँ संगृहीत हुए हैं। ये नौ आधार हैं—१. अकुल, २. विषु^१ ( अष्टदल या षड्दल ), ३. वह्नि ( मूलाधार ), ४. शाक्त (स्वाधिष्ठान)। ५. नाभि ( मणिपूर ), ६. अनाहत ( हृदय ), ७. विशुद्ध ( द्वि ), ८. लम्बिकाग्र^३ ( अष्टदल ) और ९. आज्ञा। चक्रसंकेत ( १।२८ ) में सूचित इन नौ आधारों को मन्त्र- संकेत ( २।८ ) में भी स्मरण किया गया है। आगे पूजासंकेत ( ३।१४२ ) में नौ नादों और नौ रन्ध्रों का उल्लेख है। दीपिकाकार ने रन्ध्र पद की आधारपरक व्याख्या कर नौ आधारों के नाम बताये हैं और इसमें स्वच्छन्दसंग्रह के वचन को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। हम पहले ही (पृ० ३८) बता चुके हैं कि इन दोनों में समानता नहीं है। यहाँ ( ३।१४२ ) प्रथम दो स्थलों (१।२८; २।८) में सूचित प्रथम दो आधारों— अकुल और विषु—का उल्लेख नहीं है। बाक़ी के सारे नाम एक सरीखे हैं। तदूर्ध्ववज्र, पद्मण्ठ अथवा मध्यम, वज्रकण्ठ—ये दो नाम नये हैं। यहाँ ( पृ० ३३४ ) उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह की तीसरी पंक्ति में बताया गया है कि इन दो और लम्बिका को छोड़
टिप्पणी देखनी चाहिये। पृ० ३५ पर उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में स्पष्ट ही सुषुम्ना के अधोभाग में स्थित ऊर्ध्वमुख अरुण सहस्रदल कमल को कुल तथा सुषुम्ना के ऊर्ध्वभाग में स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा है। पृ० २२५ पर निर्दिष्ट स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में भी ब्रह्मरन्ध्र स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रार को ही अकुल कहा गया है। तृतीय पटल के उपर्युक्त दो स्थलों की दीपिकाकार ने तदनुसार ही व्याख्या की है। प्रथम और द्वितीय पटल के दो स्थलों पर योगिनी- हृदय के अकुल पद की व्याख्या करते समय वे सुषुम्ना के अधोभाग में स्थित ऊर्ध्व- मुख अरुण सहस्रदल कमल को भी लाक्षणिक रूप से अकुल मान लेते हैं। लक्षणा का प्रयोजन यह दिखाना है कि मूलाधारगत कुल पद्म से यह भिन्न है ( कुलादन्य- दकुलम् — पृ० ३४)। १. योगिनीहृदय में नवचक्रात्मक श्रीयन्त्र से भिन्नता दिखाने के लिये कायगत नौ चक्रों को आधार या रन्ध्र कहा गया है। २. मूल पृ० ३६ की दूसरी तथा पृ० ११३ की टिप्पणी देखिये। ३. सेतुबन्धकार भास्करराय ने लम्बिका के पर्याय के रूप में इन्द्रयोनि शब्द का उल्लेख किया है ( १।२५-२७, २।८, पृ० ४३, ९६)।
[ ३६ ] देने से 'छः चक्र रह जाते हैं। आजकल योगशास्त्र के ग्रन्थों में इन छः चक्रों को ही प्रधानता मिली हुई है। इन छः चक्रों का उल्लेख योगिनीहृदय² में भी डाकिनी आदि छः धातुदेवताओं के प्रसंग में मिलता है। सौन्दर्यलहरी³ में भी छः चक्रों को मान्यता मिली है। स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन में छः चक्रों और नौ आधारों की एकजातीयता बताई गई है, किन्तु नेत्रतन्त्र⁴ में षट्चक्र और षोडश आधार की अलग-अलग गणना की गई है और क्षेमराज⁵ ने कुलप्रक्रिया के अनुसार सोलह आधारों का वर्णन भी किया है। तन्त्रालोकविवेक⁶ धृत नन्दिशिखातन्त्र में भी षट्चक्र और षोडश आधार का उल्लेख है। नेत्रतन्त्र के समान ⁷हठयोग के ग्रन्थों में भी षट्चक्र, षोडश आधार, लक्ष्यत्रय और व्योमपंचक का वर्णन मिलता है। इन सबका तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त रुचिकर हो सकता है। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के छठे षट्चक्रनिरूपण प्रकरण में वर्णित षट् चक्रों की प्रक्रिया स्वच्छन्दसंग्रह (दीपिका १।२५-२६ में उद्धृत) के वर्णन से कुछ भिन्न है। ऐसे स्थलों पर अपने-अपने सम्प्रदाय के अनुसार ही भावना की पद्धति शास्त्रकारों ने मान्य की है। वर्णों और तत्त्वों की उत्पत्ति वर्णों की, विशेष कर १६ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया दीपिकाकार ने भूतलिपि की वासना के प्रसंग में (पृ० ३२५-३३०) परापंचाशिका (श्लो० ३२-४४) के आधार पर बताई है। स्वनिर्मित ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय (१।१६-२६) में भी ग्रन्थकार ने इस विषय का वर्णन किया है, किन्तु दीपिका में वह केवल परापंचाशिका का उल्लेख करते हैं, अपने ग्रन्थ का नहीं। इससे परापंचाशिका के प्रति अमृतानन्द का आदरभाव प्रकट होता है। परापंचाशिका का यह वर्णन परात्रिंशिका (श्लो० ५-९) पर आधृत लगता है। यहाँ संक्षेप में उसको प्रस्तुत किया जा रहा है। १. "षट्चक्राणि त्रिहीनकम्” (पृ० ३३४)। २. विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके । आज्ञायां धातुनाथांश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥ (१।३०) ३. महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि । मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वा कुलपथं सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९ ॥ ४. ऋतुचक्रं स्वराधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् (७।१) ५. नेत्रतन्त्र के उक्त श्लोक की व्याख्या देखिये। ६. षट्चक्रं षोडशाधारं कुलं जानाति सुव्रते (१३।१८०)। ७. नित्यनाथ की सिद्धसिद्धान्तपद्धति (पृ० ७-८) में नौ चक्र माने गये हैं।
[ ३७ ] सौभाग्यसुधोदय (१।१८-१९) में सत्ता को शिव का तथा उद्रेक को शक्ति का प्रतीक माना है। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियां सत्ता के अंश हैं। इनसे क्रमशः अकार, इकार और उकार की अभिव्यक्ति होती है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियां उद्रेक के अंश हैं। इनसे क्रमशः आकार, ईकार और ऊकार का आविर्भाव होता है। परापंचाशिका में भी यही क्रम वर्णित है। वहाँ इच्छा, ज्ञान और क्रिया शब्द से उप- लक्षण के रूप में वामा, ज्येष्ठा और रौद्री का भी ग्रहण कर लेना चाहिये। चार षण्ढ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए वहाँ ( १।२०-२१ ) बताया गया है कि प्रकाशात्मक अकार का स्वरूप धारण करने वाला परप्रमाता आदिशिव अपनी विमर्श शक्ति को जगाकर जब इच्छा शक्ति के सहारे सारे जगत् की सृष्टि करना चाहता है, तो उस समय उसमें ईशन शक्ति का उदय होने लगता है। इच्छा शक्ति के उन्मेष के बाद और ईशन शक्ति के उन्मेष से पहले, अर्थात् दोनों की अन्तराल अवस्था में मिश्रित स्वरूप वाले चार स्वरों की निष्पत्ति होती है। इनमें ह्रस्व स्वरों की अभिव्यक्ति में इच्छा ( इकार ) का और दीर्घ स्वरों की अभिव्यक्ति में ईशन ( ईकार ) का योगदान रहता है। शिक्षा ग्रन्थों और व्याकरण शास्त्र में वर्णों के उच्चारण के स्थानों का क्रमिक वर्णन मिलता है। १वहाँ भी इकार और उकार के उच्चारण स्थानों के बीच में ऋकार और ऌकार का उच्चारण-स्थान माना गया है। सन्ध्यक्षरों की उत्पत्ति को बताते हुए कहा गया है कि इच्छा ( इकार ) और अनुत्तर ( अकार ) के संयोग से एकार की, एकार और अनुत्तर के योग से ऐकार की, उन्मेष ( उकार ) और अनुत्तर के संयोग से ओकार की और ओकार तथा अनुत्तर के योग से औकार की निष्पत्ति होती है। बिन्दु के विषय में बताया गया है कि बिन्दु वेद्य जगत् का संस्कार करता है। वेद्य जगत् के संस्कार का अभिप्राय यह है कि यहाँ परम शिव वेदक और वेद्य के रूप में विभक्त होकर अपने स्वरूप का संकोच कर लेता है। ये पन्द्रह स्वर प्रतिपदा आदि पन्द्रह तिथियों के प्रतिनिधि हैं। सूर्य और चन्द्र के संचरण से जैसे तिथियां बनती हैं, उसी तरह रवि और शशि के प्रतिबिम्ब स्वरूप बिन्दुद्वयात्मक आकृति वाले शिवशक्तिमय विसर्ग के संचरण से इन पन्द्रह स्वरों का प्रादुर्भाव होता है। तन्त्रसार ( पृ० १२-१५ ) में अभिनवगुप्त ने इस विषय को संक्षेप में इस तरह से प्रस्तुत किया है—परमेश्वर की तीन मुख्य शक्तियां हैं। ये हैं—अनुत्तर ( अकार ), इच्छा ( इकार ) और उन्मेष ( उकार )। अनुत्तर की आनन्द ( आकार ) में, इच्छा की ईशन ( ईकार ) में और उन्मेष की विश्रान्ति ऊर्मि ( ऊकार ) में होती है। यहाँ प्रथम त्रिक प्रकाशस्वभाव होने से सूर्यात्मक तथा द्वितीय त्रिक विश्रान्तिस्वभाव आह्लाद- १. "इचुयशानां तालु। ऋटुरषाणां मूर्धा। लृतुलसानां दन्ताः। उपूपध्मानीयानामोष्ठौ" (सिद्धान्तकौमुदी, संज्ञाप्रकरण)।