भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ ३७ ] सौभाग्यसुधोदय (१।१८-१९) में सत्ता को शिव का तथा उद्रेक को शक्ति का प्रतीक माना है। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियां सत्ता के अंश हैं। इनसे क्रमशः अकार, इकार और उकार की अभिव्यक्ति होती है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियां उद्रेक के अंश हैं। इनसे क्रमशः आकार, ईकार और ऊकार का आविर्भाव होता है। परापंचाशिका में भी यही क्रम वर्णित है। वहाँ इच्छा, ज्ञान और क्रिया शब्द से उप- लक्षण के रूप में वामा, ज्येष्ठा और रौद्री का भी ग्रहण कर लेना चाहिये। चार षण्ढ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए वहाँ ( १।२०-२१ ) बताया गया है कि प्रकाशात्मक अकार का स्वरूप धारण करने वाला परप्रमाता आदिशिव अपनी विमर्श शक्ति को जगाकर जब इच्छा शक्ति के सहारे सारे जगत् की सृष्टि करना चाहता है, तो उस समय उसमें ईशन शक्ति का उदय होने लगता है। इच्छा शक्ति के उन्मेष के बाद और ईशन शक्ति के उन्मेष से पहले, अर्थात् दोनों की अन्तराल अवस्था में मिश्रित स्वरूप वाले चार स्वरों की निष्पत्ति होती है। इनमें ह्रस्व स्वरों की अभिव्यक्ति में इच्छा ( इकार ) का और दीर्घ स्वरों की अभिव्यक्ति में ईशन ( ईकार ) का योगदान रहता है। शिक्षा ग्रन्थों और व्याकरण शास्त्र में वर्णों के उच्चारण के स्थानों का क्रमिक वर्णन मिलता है। १वहाँ भी इकार और उकार के उच्चारण स्थानों के बीच में ऋकार और ऌकार का उच्चारण-स्थान माना गया है। सन्ध्यक्षरों की उत्पत्ति को बताते हुए कहा गया है कि इच्छा ( इकार ) और अनुत्तर ( अकार ) के संयोग से एकार की, एकार और अनुत्तर के योग से ऐकार की, उन्मेष ( उकार ) और अनुत्तर के संयोग से ओकार की और ओकार तथा अनुत्तर के योग से औकार की निष्पत्ति होती है। बिन्दु के विषय में बताया गया है कि बिन्दु वेद्य जगत् का संस्कार करता है। वेद्य जगत् के संस्कार का अभिप्राय यह है कि यहाँ परम शिव वेदक और वेद्य के रूप में विभक्त होकर अपने स्वरूप का संकोच कर लेता है। ये पन्द्रह स्वर प्रतिपदा आदि पन्द्रह तिथियों के प्रतिनिधि हैं। सूर्य और चन्द्र के संचरण से जैसे तिथियां बनती हैं, उसी तरह रवि और शशि के प्रतिबिम्ब स्वरूप बिन्दुद्वयात्मक आकृति वाले शिवशक्तिमय विसर्ग के संचरण से इन पन्द्रह स्वरों का प्रादुर्भाव होता है। तन्त्रसार ( पृ० १२-१५ ) में अभिनवगुप्त ने इस विषय को संक्षेप में इस तरह से प्रस्तुत किया है—परमेश्वर की तीन मुख्य शक्तियां हैं। ये हैं—अनुत्तर ( अकार ), इच्छा ( इकार ) और उन्मेष ( उकार )। अनुत्तर की आनन्द ( आकार ) में, इच्छा की ईशन ( ईकार ) में और उन्मेष की विश्रान्ति ऊर्मि ( ऊकार ) में होती है। यहाँ प्रथम त्रिक प्रकाशस्वभाव होने से सूर्यात्मक तथा द्वितीय त्रिक विश्रान्तिस्वभाव आह्लाद- १. "इचुयशानां तालु। ऋटुरषाणां मूर्धा। लृतुलसानां दन्ताः। उपूपध्मानीयानामोष्ठौ" (सिद्धान्तकौमुदी, संज्ञाप्रकरण)।