योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ३६ ] देने से 'छः चक्र रह जाते हैं। आजकल योगशास्त्र के ग्रन्थों में इन छः चक्रों को ही प्रधानता मिली हुई है। इन छः चक्रों का उल्लेख योगिनीहृदय² में भी डाकिनी आदि छः धातुदेवताओं के प्रसंग में मिलता है। सौन्दर्यलहरी³ में भी छः चक्रों को मान्यता मिली है। स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन में छः चक्रों और नौ आधारों की एकजातीयता बताई गई है, किन्तु नेत्रतन्त्र⁴ में षट्चक्र और षोडश आधार की अलग-अलग गणना की गई है और क्षेमराज⁵ ने कुलप्रक्रिया के अनुसार सोलह आधारों का वर्णन भी किया है। तन्त्रालोकविवेक⁶ धृत नन्दिशिखातन्त्र में भी षट्चक्र और षोडश आधार का उल्लेख है। नेत्रतन्त्र के समान ⁷हठयोग के ग्रन्थों में भी षट्चक्र, षोडश आधार, लक्ष्यत्रय और व्योमपंचक का वर्णन मिलता है। इन सबका तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त रुचिकर हो सकता है। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के छठे षट्चक्रनिरूपण प्रकरण में वर्णित षट् चक्रों की प्रक्रिया स्वच्छन्दसंग्रह (दीपिका १।२५-२६ में उद्धृत) के वर्णन से कुछ भिन्न है। ऐसे स्थलों पर अपने-अपने सम्प्रदाय के अनुसार ही भावना की पद्धति शास्त्रकारों ने मान्य की है। वर्णों और तत्त्वों की उत्पत्ति वर्णों की, विशेष कर १६ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया दीपिकाकार ने भूतलिपि की वासना के प्रसंग में (पृ० ३२५-३३०) परापंचाशिका (श्लो० ३२-४४) के आधार पर बताई है। स्वनिर्मित ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय (१।१६-२६) में भी ग्रन्थकार ने इस विषय का वर्णन किया है, किन्तु दीपिका में वह केवल परापंचाशिका का उल्लेख करते हैं, अपने ग्रन्थ का नहीं। इससे परापंचाशिका के प्रति अमृतानन्द का आदरभाव प्रकट होता है। परापंचाशिका का यह वर्णन परात्रिंशिका (श्लो० ५-९) पर आधृत लगता है। यहाँ संक्षेप में उसको प्रस्तुत किया जा रहा है। १. "षट्चक्राणि त्रिहीनकम्” (पृ० ३३४)। २. विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके । आज्ञायां धातुनाथांश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥ (१।३०) ३. महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि । मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वा कुलपथं सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९ ॥ ४. ऋतुचक्रं स्वराधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् (७।१) ५. नेत्रतन्त्र के उक्त श्लोक की व्याख्या देखिये। ६. षट्चक्रं षोडशाधारं कुलं जानाति सुव्रते (१३।१८०)। ७. नित्यनाथ की सिद्धसिद्धान्तपद्धति (पृ० ७-८) में नौ चक्र माने गये हैं।