भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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इत्यादि श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में अमृतानन्द ने स्वच्छन्दसंग्रह के अनेक वचन उद्धृत किये हैं, जिनसे पता चलता है कि सुषुम्ना नाडी के नीचे और ऊपर रक्त और श्वेत वर्ण के कुल और अकुल नामक दो सहस्रार कमल स्थित हैं तथा इन दोनों के बीच में तीस आधार पंकज विद्यमान हैं। खेद का विषय है कि इन सबका वर्णन करने वाले सभी वचन उद्धृत न होकर केवल योगिनीहृदय द्वारा परिगणित नौ आधारों से संबद्ध वचन ही यहाँ संगृहीत हुए हैं। ये नौ आधार हैं—१. अकुल, २. विषु^१ ( अष्टदल या षड्दल ), ३. वह्नि ( मूलाधार ), ४. शाक्त (स्वाधिष्ठान)। ५. नाभि ( मणिपूर ), ६. अनाहत ( हृदय ), ७. विशुद्ध ( द्वि ), ८. लम्बिकाग्र^३ ( अष्टदल ) और ९. आज्ञा। चक्रसंकेत ( १।२८ ) में सूचित इन नौ आधारों को मन्त्र- संकेत ( २।८ ) में भी स्मरण किया गया है। आगे पूजासंकेत ( ३।१४२ ) में नौ नादों और नौ रन्ध्रों का उल्लेख है। दीपिकाकार ने रन्ध्र पद की आधारपरक व्याख्या कर नौ आधारों के नाम बताये हैं और इसमें स्वच्छन्दसंग्रह के वचन को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। हम पहले ही (पृ० ३८) बता चुके हैं कि इन दोनों में समानता नहीं है। यहाँ ( ३।१४२ ) प्रथम दो स्थलों (१।२८; २।८) में सूचित प्रथम दो आधारों— अकुल और विषु—का उल्लेख नहीं है। बाक़ी के सारे नाम एक सरीखे हैं। तदूर्ध्ववज्र, पद्मण्ठ अथवा मध्यम, वज्रकण्ठ—ये दो नाम नये हैं। यहाँ ( पृ० ३३४ ) उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह की तीसरी पंक्ति में बताया गया है कि इन दो और लम्बिका को छोड़


टिप्पणी देखनी चाहिये। पृ० ३५ पर उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में स्पष्ट ही सुषुम्ना के अधोभाग में स्थित ऊर्ध्वमुख अरुण सहस्रदल कमल को कुल तथा सुषुम्ना के ऊर्ध्वभाग में स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा है। पृ० २२५ पर निर्दिष्ट स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में भी ब्रह्मरन्ध्र स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रार को ही अकुल कहा गया है। तृतीय पटल के उपर्युक्त दो स्थलों की दीपिकाकार ने तदनुसार ही व्याख्या की है। प्रथम और द्वितीय पटल के दो स्थलों पर योगिनी- हृदय के अकुल पद की व्याख्या करते समय वे सुषुम्ना के अधोभाग में स्थित ऊर्ध्व- मुख अरुण सहस्रदल कमल को भी लाक्षणिक रूप से अकुल मान लेते हैं। लक्षणा का प्रयोजन यह दिखाना है कि मूलाधारगत कुल पद्म से यह भिन्न है ( कुलादन्य- दकुलम् — पृ० ३४)। १. योगिनीहृदय में नवचक्रात्मक श्रीयन्त्र से भिन्नता दिखाने के लिये कायगत नौ चक्रों को आधार या रन्ध्र कहा गया है। २. मूल पृ० ३६ की दूसरी तथा पृ० ११३ की टिप्पणी देखिये। ३. सेतुबन्धकार भास्करराय ने लम्बिका के पर्याय के रूप में इन्द्रयोनि शब्द का उल्लेख किया है ( १।२५-२७, २।८, पृ० ४३, ९६)।