योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १४ ] है। पीठविषयक विचार प्रस्तुत करते हुए लेखक ने बौद्ध चतुष्पीठ तन्त्र का उल्लेख किया है, किन्तु इस ग्रन्थ का प्रस्तुत पीठ विभाग से कोई संबन्ध नहीं है। उनके द्वारा उद्धृत (पृ० ११) आत्मपीठ, परपीठ आदि नामों से ही यह स्पष्ट हो जाता है। डॉ० सरकार द्वारा उद्धृत ज्ञानार्णव, कुब्जिकातन्त्र, तन्त्रसार आदि ग्रन्थ कालिक दृष्टि से योगिनीहृदय से अर्वाचीन हैं। अतः प्रस्तुत पीठविषयक विचार हमारी दृष्टि में योगिनी- हृदय को केन्द्रबिन्दु मानकर किया जाना चाहिये। डॉ० सरकार का प्रयास अपने आप में महत्त्वपूर्ण होते हुए भी नूतन सामग्रियों की उपलब्धि के कारण अब कुछ पिछड़ गया है। यहाँ तन्त्रालोक और उसकी टीका में संगृहीत सामग्री का उपयोग नहीं किया गया। पीठों के सही नाम का निर्णय करना भी एक समस्या है। प्राचीन शैव, शाक्त तथा बौद्ध तन्त्रों की नामावलियों के सहारे ही इनका सही स्वरूप निश्चित किया जा सकता है। पीठविषयक सबसे बड़ी समस्या है, उनकी वर्तमान भौगोलिक स्थिति। कौन पीठ भारत के किस प्रदेश में किस स्थान पर है, इसका निर्णय करने के लिये भी अनेक प्रयास किये गये हैं, किन्तु यह कार्य इतना सरल नहीं है। मुख्य चार पीठों—कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओडियान—की अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थिति के विषय में भी हम कोई निर्विवाद समाधान नहीं प्रस्तुत कर पाये हैं। जालन्धर पीठ की भौगोलिक स्थिति को सुनिश्चित करने के लिये हालैण्ड की उचट्रेष्ट युनिवर्सिटी योजना बनाने का उपक्रम कर सकती है, किन्तु भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार अथवा विद्यासंस्थाएँ इस तरफ से उदासीन हैं। योगिनीहृदय के तीनों संकेतों का हमने यहाँ संक्षिप्त परिचय दिया है। दीपिका टीका, भाषानुवाद और स्थान स्थान पर दी गई टिप्पणियों के सहारे इनका विस्तृत विवरण जाना जा सकता है। दीपिका के सहारे हमें अनेक लुप्तप्राय विषयों का पता चलता है। अतः उसका अपना महत्त्व है। ऐसे कुछ स्थलों की हम यहाँ चर्चा करना चाहते हैं। नौ आधार वरिवस्यारहस्य की स्वोपज्ञ प्रकाश टीका (पृ० १६) में भास्करराय ने लिखा है कि सुषुम्ना नाडी के मूल और अग्र भाग में दो सहस्रदल कमल हैं और इन दोनों के बीच में अष्टदल, षड्दल आदि तीस पद्म हैं। इनका स्वच्छन्दसंग्रह आदि में विस्तार से वर्णन किया गया है। स्वच्छन्दसंग्रह अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है। भास्करराय को इस विषय की जानकारी दीपिका से ही मिली होगी। "अकुले' विषुसंज्ञे च" (१।२५) १. दीपिकाकार ने दो स्थलों पर (१।२५; २।८) सुषुम्ना मूल स्थित अरुण सहस्रदल कमल को अकुल तथा दो स्थलों पर (३।५, ३।१३७) ब्रह्मरन्ध्र में स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा है। इस प्रसंग में पृ० ३२९ की पहली