योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३३ ] ऊपर बताये गये तीनों बीजों की हृल्लेखायों में हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना-ये बारह कलाएं रहती हैं। द्वादशान्त में जाकर इन सबका लय हो जाता है। वाग्भव बीज स्थित कलाओं का कामराज बीज स्थित नाद में और कामराज बीज की कलाओं का शक्ति बीज स्थित नाद में विलय हो जाता है। अतः इस नाद की बारह कलाओं की स्पष्ट भावना केवल अन्तिम शक्ति बीज में ही की जा सकती है। इस जप में छः शून्यों की, पाँच अवस्थाओं की और सात विषुवों की भी भावना की जाती है। ५० या ५१ पीठ योगिनीहृदय के पूजासंकेत के षोढान्यास प्रकरण में पीठों के नाम ( ३।३४-४०) गिनाये गये हैं। पीठ ५० हैं या ५१, इस विषय में अपनी व्याख्या में भास्करराय ने अन्तिम पक्ष का समर्थन किया है। हम नि० षो० के उपोद्घात (पृ० ७८-८३) में पीठ- विषयक विचार प्रस्तुत कर चुके हैं। वहाँ पीठों की संख्या से संबद्ध विभिन्न पक्षों की भी चर्चा की गई है। इनका उल्लेख शैव और बौद्ध तन्त्रों में भी मिलता है। उनमें चार पीठ प्रायः सर्वत्र मान्य हैं। प्राचीन ग्रन्थों में पीठों के पीठ, उपपीठ, क्षेत्र, उपक्षेत्र, सन्दोह, उपसन्दोह, श्मशान, उपश्मशान आदि विभाग मिलते हैं। तन्त्रालोक तथा कौलज्ञाननिर्णय में भी इनका उल्लेख मिलता है। बौद्ध तन्त्रों में ऊपर के विभागों के अतिरिक्त मेलापक, उपमेलापक को जोड़कर पीठों के, जिनको कि यहां ^१भूमि नाम भी दिया गया है, द स प्रकार वर्णित हैं। हेवज्रतन्त्र में पीलव, उपपीलव विभाग को मिलाकर भूमियों की संख्या ^२बारह मानी गई है। वसन्ततिलक आदि अनेक बौद्ध तन्त्रों में सब मिलाकर पीठों की संख्या २४ तथा हेवज्रतन्त्र में ३२ है। तन्त्रालोक और उसकी टीका में ३४ पीठ परिगणित हैं। ^३अर्बुद को अर्धपीठ माना गया है। तन्त्रालोक की और बौद्ध तन्त्रों की सूचियों के अनेक नाम एक सरीखे हैं। आजकल पीठों के ५१ विभाग वाला पक्ष ही बहुत प्रचलित है। भास्करराय के अनुसार योगिनीहृदय को भी यही पक्ष मान्य है। डॉ० डी० सी० सरकार ने "दी शाक्त पीठाज्" नामक ग्रन्थ में प्रधानतः 'पीठनिर्णय' अथवा 'महापीठनिरूपण' नामक ग्रन्थ के आधार पर पीठविषयक विचार प्रस्तुत किये हैं। यहाँ इस ग्रन्थ का उन्होंने सम्पादन भी किया है। उन्होंने इस ग्रन्थ का जो काल निर्धारित किया है (पृ० २३-२४), उससे ज्ञात होता है कि यह ग्रन्थ योगिनीहृदय से अर्वाचीन १. केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ की शोधपत्रिका 'धीः' का प्रथम अंक, पृ० १४०-१४१ देखिये। २. वहीं, पृ० १४२-१४३ देखिये। ३. "अर्बुदमर्धपीठं तु" (कौलज्ञाननिर्णय, ८।२२)। ३