भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 485 में से

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[ ३२ ] हृदय और बिन्दुस्थान (भ्रूमध्य) में तीन कुण्डलिनियां स्थित हैं। वह्नि, सूर्य और सोम कुण्डलिनी के नाम से ये प्रसिद्ध हैं। तीन बीजों के अन्त में विद्यमान हृल्लेखाओं (ह्रींकार) के कामकला नामक अवयव में वर्तमान हार्धकलाओं में ये कुण्डलिनियाँ स्थित हैं। अकुल से ¹भ्रूमध्य पर्यन्त नौ स्थानों में भावित त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में से तीन तीन चक्रों की एक एक बीज और कुण्डलिनी में नाद रूप से भावना ही जप कहलाती है। इस जपविधि में त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों की तथा वाग्भव बीज की मूलाधार स्थित वह्निमण्डल में स्थिति मानी जाती है। वाग्भव बीज के अन्त में स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी वह्निकुण्डलिनी जब हृदय स्थित कामराज बीज तक उठती है, उस समय उसकी ऊपर उठते हुए नाद के रूप में भावना की जाती है। इसी को वाग्भव बीज जप कहा जाता है। इसी तरह से सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों की तथा कामराज बीज की हृदय स्थित सूर्यमण्डल में स्थिति मानी जाती है। कामराज बीज के शिखर पर स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी सूर्यकुण्डलिनी जब भ्रूमध्य स्थित शक्ति बीज तक उठती है, उस समय उसकी भी ऊपर उठते हुए नाद के रूप में भावना की जाती है। इसको कामराज बीज जप कहा जाता है। सर्वरोगहर आदि तीन चक्रों की तथा शक्ति बीज की स्थिति भ्रूमध्य स्थित सोम- (इन्दु)मण्डल में मानी जाती है। शक्ति बीज के शिखर पर स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी सोमकुण्डलिनी जब भ्रूमध्य से उठ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त पहुँचती है, उस समय समना की सीमा को लाँघ कर नाद उन्मना में प्रविष्ट हो रहा है, इस प्रकार की भावना की जाती है। इसी को शक्ति बीज जप कहा जाता है। और अरुणामोदिनी (पृ० ७२) टीका में रुद्ररहस्य के प्रमाण से मूलाधार को पृथिवी-तत्त्वात्मक माना है और उसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है—"मूले गुदस्थाने सर्वाधारभूतं चक्रं मूलाधारमिति" (पृ० ६९), "आ समन्ताद् ध्रियते शरीरमनेने- त्याधारः। मूले गुदस्थाने स्थित आधारो मूलाधारः। अथवा मूलं सर्वेषां चक्राणा- मादिकारणम्, स चासावाधारश्च मूलाधारः, तस्मिन् सर्वचक्राधारे चतुर्दलत्वेन कुण्डलिनीशक्तेर्नित्यनिवासत्वेन प्रसिद्धे मूलाधाराख्ये चक्रे" (पृ० ७२)। यहाँ बताया गया है कि पृथिवी-तत्त्वात्मक मूलाधार के अभाव में या तो देह गिर पड़ेगा अथवा ऊपर उठ जायगा। १. यहाँ (पृ० ३५९) दीपिकाकार ने अकुल से बिन्दु पर्यन्त स्थानों की चर्चा की है। पहले (पृ० ११३) भी उन्होंने यही व्याख्या की है। इसका कारण भी उन्होंने (पृ० ३६-३७) बताया है। इसके लिये पृ० ३६-३७ और पृ० ११३ की टिप्पणी देखिये। श्रीविद्यार्णव में दीपिकाकार के मत का ही अनुकरण है।

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