योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १७ ]
बिन्दु में कामकला की अव्यक्त स्थिति तथा उसके उन्मीलन के प्रकार का वर्णन हम ग्रन्थभाग, पृ. १६-१७ की टिप्पणी में कर चुके हैं। इस कामकला के प्रसार से ही विश्वमय श्रीचक्र की निष्पत्ति होती है। नौ चक्रों की समष्टि को श्रीचक्र की संज्ञा दी गई है। उनमें से प्रथम बैन्दव चक्र में कामकला अव्यक्त रूप से तथा द्वितीय त्रिकोण चक्र में व्यक्त रूप से अवस्थित है। कामकला का यह व्यक्त स्वरूप शारदा लिपि के ईकार में स्पष्ट देखा जा सकता है। इस प्रथम त्रिकोण (मध्य त्र्यश्र) के ऊपर सृष्टि और संहार के क्रम से शक्ति और वह्नि (शिव) त्रिकोण की स्थापना की जाती है, तो उससे नवयोन्यात्मक वसु(अष्ट)कोण चक्र की निष्पत्ति होतो है। इस नवयोनि चक्र में धर्म, अधर्म, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा, माता, मेय और प्रमा की स्थिति मानी जाती है। मध्य त्र्यश्र में प्रमा की तथा उसके चारों तरफ फैले अन्य आठ त्रिकोणों में धर्म आदि की स्थिति रहती है। यह 'नवयोनि चक्र' (बिन्दु, त्रिकोण और वसुकोण की समष्टि) अम्बिका शक्ति का विलास है और यह सोलह स्वरों से आवृत है। नौ त्रिकोण और बैन्दव चक्र की चारों तरफ फैल रही दशविध प्रभा से अन्तर्दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। २यकार से लेकर ळ क्ष पर्यन्त दस वर्ण इसमें स्थित हैं और यह पाँच महाभूत एवं पाँच तन्मात्राओं का आलम्बन है। प्रथम दशार से ही द्वितीय दशार का स्फुरण होता है और यह ककार आदि दस वर्णों तथा ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों
१. "तत्राद्यं नवयोनि स्यात्" (१।७५) यहाँ नवयोनि पद बिन्दु, त्रिकोण और वसु- कोण—इन तीनों चक्रों का बोधक माना गया है। इन तीनों चक्रों की वासना यहाँ एक साथ बताई गई है और यह पूरा प्रकरण नवयोनि चक्र का ही निरूपक है। अतः "चक्रं नवात्मकम्" (१।१३) इस पंक्ति का भी अर्थ तदनुसार ही करना चाहिये। दीपिकाकार ने यहाँ त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों की तथा करशुद्धिकरी आदि नौ चक्रेश्वरों विद्याओं की चर्चा उठाई है। इसके विपरीत भास्करराय ने नवयोन्यात्मक चक्र की नवविध वासना का उल्लेख कर वशिनी आदि आठ विद्याओं को मूलविद्या के साथ मिलाकर उसकी नवमन्त्रात्मकता बताई है और कहा है कि नवयोनि चक्र के प्रकरण में त्रैलोक्यमोहन आदि चक्रों की तथा करशुद्धिकरी आदि विद्याओं की चर्चा अनावश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने प्रकारान्तर से दीपिका व्याख्या की संगति भी बैठा दी है। २. ग्रन्थभाग पृ. २६ की टिप्पणी देखिये। दीपिकाकार (१।४५-४७) ने आदि-अान्त पचास ही वैखरी वर्ण माने हैं। मूल ग्रन्थ (२।७०) में भी वैखरी वाणी के पचास वर्ण ही स्वीकृत हैं। ऐसी स्थिति में दीपिका का प्रस्तुत अंश समाधान-सापेक्ष है।