भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ १६ ] है कि हिन्दू शब्द हम पर आरोपित है और इस आरोपित विभ्रम के सहारे ही हम बाह्य आचारों के घरौंदों में बंटते चले जा रहे हैं। इसके विपरीत बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव, शाक्त आदि शब्द इसी धरती की उपज हैं और इन्होंने कालक्रम से कुछ मानों में अपने में एक समान दृष्टिकोण का उन्मीलन कर लिया है। शाक्त मत की इन सब पर बहुत गहरी छाप है। शाक्त मत की इस व्यापक दृष्टि का योगिनीहृदय में पूर्ण विकास हुआ है। इस व्यापक दृष्टिकोण को ही उजागर करने का अब हम लघु प्रयास कर रहे हैं। चक्रसंकेत क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञाहृदय के आठवें सूत्र की व्याख्या में कहा है कि 'तान्त्रिकों के मत में आत्मतत्त्व विश्वोत्तीर्ण है, कुल आदि आम्नायों के अनुसार वह विश्वमय है और त्रिक आदि दर्शन के ज्ञाताओं के मत से वह विश्वोत्तीर्ण भी है और विश्वमय भी। योगिनीहृदय और दीपिका में इस तृतीय मत को स्वीकार किया गया है। महातत्त्वार्थ का निरूपण करते हुए यहाँ (२।७३-७४) बताया गया है कि निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप, विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर लेना ही महातत्त्वार्थ है। विश्वोत्तीर्ण तत्त्व स्वेच्छा से स्वात्मभित्ति में विश्व का उन्मीलन कर विश्वमय बन जाता है और फिर अपने में ही विश्व को समेट भी लेता है, अतः यह विश्वमय भी है और विश्वोत्तीर्ण भी। यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व विश्वमय बनने के लिए कैसे श्रीचक्र का स्वरूप धारण कर लेता है, परदेवता श्रीचक्र के रूप में कैसे अवतरित होती है, प्रथम चक्रसंकेत प्रकरण में इसी का दार्शनिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। पाँच शक्ति त्रिकोणों और चार वह्नि त्रिकोणों के मिलने से श्रीचक्र का स्वरूप बनता है। यहाँ पाँच शक्ति त्रिकोणों को सृष्टि क्रम से, अर्थात् ऊर्ध्वमुख तथा चार वह्नि त्रिकोणों को लयक्रम से, अर्थात् अधोमुख रखना पड़ता है। श्रीचक्र के उद्धार की दो विधियाँ नित्याषोडशिकार्णव ( १।२९-४१, ५९-७५) में बता दी गई हैं, अतः उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है। यहाँ बताया गया है कि वह (विश्वोत्तीर्ण) आद्या शक्ति जब विश्वमय बनना चाहती है, तो उसमें स्पन्दन (स्फुरत्ता) होता है और इस स्पन्दन का प्रथम परिणाम है श्रीचक्र। यह चक्र कामकलारूप है। यहाँ (१।११) कामकला को प्रकाश-परमार्थ और श्रीचक्र को प्रसार-परमार्थ (१।२४) कहा गया है। प्रकाशविमर्श सामरस्यमय १. "विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वमिति तान्त्रिकाः। विश्वमयमिति कुलाद्याम्नायनिष्ठाः। विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं चेति त्रिकादिदर्शनविदः" (पृ. ५६)। ठाकुर जयदेवसिंह संस्करण, मोतीलाल बनारसीदास, सन् १९६३ (अंग्रेजी अनुवाद)। मूल ग्रन्थ के ३, ४ सूत्र भी द्रष्टव्य हैं।